भारत में सोशल मीडिया अब केवल मनोरंजन या कम्युनिकेशन का माध्यम नहीं रहा, बल्कि निवेश से जुड़े फैसलों को प्रभावित करने वाला एक शक्तिशाली प्लेटफॉर्म बन चुका है। इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब वीडियोज के जरिए फिनफ्लुएंसर्स स्टॉक मार्केट, पर्सनल फाइनेंस और ट्रेडिंग जैसे विषयों को आसान भाषा में लाखों लोगों तक पहुंचा रहे हैं। हालांकि, इस बढ़ते प्रभाव के साथ विश्वसनीयता, योग्यता और रेगुलेटरी जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल भी सामने आए हैं।
आइए भारत के तेजी से बढ़ते फिनफ्लुएंसर इकोसिस्टम को विस्तारपूर्वक समझें और जानें कि सोशल मीडिया से मिलने वाली स्टॉक सलाह निवेशकों के लिए कितनी उपयोगी और कितनी जोखिमपूर्ण हो सकती है।
क्या है मामला?
CFA इंस्टीट्यूट ने भारत में प्रमुख रूप से सक्रिय 48 फिनफ्लुएंसर्स का अध्ययन किया गया। इनमें केवल 3 फिनफ्लुएंसर्स SEBI-रजिस्टर्ड पाए गए, जबकि शेष 45 बिना रजिस्ट्रेशन के काम कर रहे थे। पिछले अध्ययन में रजिस्ट्रेशन का स्तर 2% था, जो अब बढ़कर 6.3% हो गया है। हालांकि, स्टॉक रिकमेंडेशन देने वाले फिनफ्लुएंसर्स का अनुपात 33.3% पर बना रहा।

अध्ययन के अनुसार केवल 6.3% फिनफ्लुएंसर्स SEBI-रजिस्टर्ड हैं, जबकि एक-तिहाई से अधिक निवेश सलाह देते हैं।
जांच में पाया गया कि 48 में से 16 फिनफ्लुएंसर्स सीधे स्टॉक्स पर रिकमेंडेशन दे रहे थे। इनमें केवल 2 रजिस्टर्ड थे, जबकि 14 अनरजिस्टर्ड फिनफ्लुएंसर्स अपने दर्शकों को निवेश से जुड़े सीधे सुझाव दे रहे थे।
सामान्य रूप से कोई व्यक्ति या संस्था यदि नियमित रूप से बाय, सेल या होल्ड रिकमेंडेशन, प्राइस टारगेट, ट्रेडिंग कॉल या इंट्राडे कॉल देती है, तो उसके लिए SEBI के संबंधित रेगुलेटरी फ्रेमवर्क के तहत रजिस्ट्रेशन जरूरी होता है। इसलिए केवल ‘एजुकेशनल कंटेंट’ का लेबल लगा देना हर तरह की स्टॉक सलाह को नियमों से बाहर नहीं करता।
प्रभाव बड़ा, लेकिन जवाबदेही सीमित
रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण संकेत यह है कि डिजिटल प्रभाव और रेगुलेटरी जवाबदेही के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है। अध्ययन में शामिल लगभग 6.3% फिनफ्लुएंसर्स का नाम किसी रेगुलेटरी कार्रवाई या डिस्क्लोजर और कंडक्ट से जुड़े विवाद में आया था। वहीं केवल 4.2% पर SEBI की पेनल्टी दर्ज की गई। दूसरे शब्दों में, लगभग 95.8% फिनफ्लुएंसर्स पर किसी पेनल्टी का उल्लेख नहीं था।
यह आंकड़ा अपने आप में यह साबित नहीं करता कि बाकी सभी फिनफ्लुएंसर्स ने नियम तोड़े हैं। हालांकि, जब केवल 6.3% रजिस्टर्ड हों और एक-तिहाई स्टॉक सलाह दे रहे हों, तो यह रेगुलेटरी निगरानी की सीमा को जरूर सामने लाता है।
SEBI-रजिस्टर्ड रिसर्च एनालिस्ट को सार्वजनिक स्टॉक रिकमेंडेशन देते समय अपना नाम, रजिस्ट्रेशन डिटेल्स, संबंधित सिक्योरिटी में वित्तीय हित, बेनिफिशियल ओनरशिप, मटेरियल कॉन्फ्लिक्ट और संबंधित कंपनी से मिले कम्पनसेशन जैसी जानकारियां स्पष्ट रूप से बतानी होती हैं। अनरजिस्टर्ड कंटेंट क्रिएटर्स के मामले में निवेशकों को ऐसी जानकारी हमेशा उपलब्ध नहीं होती।
डिस्क्लोजर और सोशल मीडिया पहुंच की चुनौती
अध्ययन में 37.5% फिनफ्लुएंसर्स ने स्पॉन्सर्ड कंटेंट, एफिलिएट रिलेशनशिप या अन्य संभावित कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट का पर्याप्त डिस्क्लोजर नहीं दिया। इसके अलावा 27.1% ने फीस, टैक्स इम्प्लिकेशन और लॉक-इन पीरियड जैसी महत्वपूर्ण निवेश जानकारियों का उल्लेख नहीं किया। केवल 62.5% ने कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट और ब्रांड पार्टनरशिप से जुड़ी जानकारी बताई।
फिनफ्लुएंसर्स की पहुंच मुख्य रूप से इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर केंद्रित है। कुल फॉलोअर बेस में इंस्टाग्राम की हिस्सेदारी 46.7% और यूट्यूब की 45.3% थी। दोनों प्लेटफॉर्म मिलकर कुल पहुंच का 90% से अधिक हिस्सा रखते हैं। लगभग 62.5% फिनफ्लुएंसर्स के लिए इंस्टाग्राम प्रमुख प्लेटफॉर्म था और 97.9% रील्स का उपयोग कर रहे थे।
करीब 83% फिनफ्लुएंसर्स सप्ताह में कम से कम दो बार कंटेंट पोस्ट करते थे। अध्ययन में शामिल आधे फिनफ्लुएंसर्स की उम्र 30 वर्ष या उससे कम थी, जबकि औसत उम्र 32 वर्ष रही। लगभग 50% मुंबई और दिल्ली-NCR में स्थित थे तथा 10% से अधिक भारत के बाहर से काम कर रहे थे।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
निवेशकों के लिए सबसे बड़ा सबक यह है कि फॉलोअर्स, व्यूज और आकर्षक प्रेजेंटेशन को विशेषज्ञता का प्रमाण नहीं मानना चाहिए। किसी स्टॉक पर एक्शन लेने से पहले यह जांचना जरूरी है कि सलाह देने वाला व्यक्ति SEBI-रजिस्टर्ड है या नहीं और उसने अपने रजिस्ट्रेशन की जानकारी स्पष्ट रूप से दी है या नहीं।
निवेशकों को यह भी देखना चाहिए कि रिकमेंडेशन के साथ जोखिम, फीस, टैक्स, लॉक-इन, समय सीमा और कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट बताए गए हैं या नहीं। किसी ब्रांड पार्टनरशिप, एफिलिएट लिंक या भुगतान वाले प्रमोशन को सामान्य और निष्पक्ष निवेश सलाह समझना नुकसानदायक हो सकता है।
फाइनेंशियल एजुकेशन और व्यक्तिगत निवेश सलाह में अंतर समझना भी जरूरी है। सामान्य अवधारणाओं को समझाने वाला कंटेंट उपयोगी हो सकता है, लेकिन किसी निश्चित स्टॉक को खरीदने, बेचने या तय प्राइस टारगेट तक रखने की सलाह अलग श्रेणी में आती है। निवेश का अंतिम निर्णय केवल छोटी वीडियो क्लिप या वायरल ट्रेडिंग कॉल पर आधारित नहीं होना चाहिए।
भविष्य की बातें
CFA इंस्टीट्यूट ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि कई मामलों में पेड कोलैबोरेशन्स का स्पष्ट खुलासा नहीं किया जाता, स्पॉन्सर ब्रांड का नाम छिपाया जाता है या वेल्थ एडवाइजरी, टैक्सेशन और लीगल सर्विसेज जैसे जुड़े बिजनेस के कारण कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट पैदा हो सकते हैं। इसके अलावा, कुछ स्टॉक रिकमेंडेशंस ऑफलाइन सेमिनार और बंद निवेशक समूहों में भी साझा किए जाते हैं, जिससे रेगुलेटरी निगरानी और चुनौतीपूर्ण हो जाती है।
रिपोर्ट ने निवेशकों की बेहतर सुरक्षा के लिए स्टैंडर्डाइज्ड डिस्क्लोजर नॉर्म्स, फिनफ्लुएंसर्स के लिए अलग कोड ऑफ कंडक्ट, SEBI और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के बीच बेहतर सहयोग तथा SEBI-रजिस्टर्ड एडवाइजर्स और अनरजिस्टर्ड क्रिएटर्स के बीच स्पष्ट पहचान व्यवस्था की सिफारिश की है। साथ ही, बिना रेगुलेटरी रजिस्ट्रेशन निवेश सलाह देने वाले अकाउंट्स की एल्गोरिदमिक रीच और मोनेटाइजेशन को सीमित करने तथा AI-जनरेटेड फाइनेंशियल कंटेंट और भ्रामक प्रमोशन्स की निगरानी मजबूत करने पर भी जोर दिया गया है।
डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल एजुकेशनल और इंफॉर्मेशनल उद्देश्य के लिए है और यह इन्वेस्टमेंट एडवाइस या किसी भी सिक्योरिटीज को खरीदने या बेचने की रिकमेंडेशन नहीं है। यहाँ जिन कंपनियों का उल्लेख किया गया है, उन्हें मार्केट डेवलपमेंट्स के संदर्भ में केवल उदाहरण के रूप में बताया गया है। इन्वेस्टर्स को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी इन्वेस्टमेंट डिसीजन लेने से पहले अपनी खुद की रिसर्च करें और अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से परामर्श करें।
सिक्योरिटीज मार्केट में किए गए इन्वेस्टमेंट मार्केट जोखिम के अधीन होते हैं। इन्वेस्ट करने से पहले सभी संबंधित डॉक्यूमेंट्स को ध्यानपूर्वक से पढ़ें।