भारतीय शेयर मार्केट के लिए ग्लोबल फंड मैनेजर्स का नजरिया फिलहाल चुनौतीपूर्ण हो गया है। बैंक ऑफ अमेरिका के अगस्त 2026 के फंड मैनेजर सर्वे में भारत ने इंडोनेशिया की जगह एशिया के सबसे कम पसंदीदा स्टॉक मार्केट का स्थान हासिल किया है। यह बदलाव ऐसे समय आया है जब भारतीय कंपनियों की अर्निंग्स में सुधार के संकेत मिल रहे हैं, लेकिन हाई वैल्यूएशंस, कमजोर ग्रोथ और AI से जुड़ी स्पष्ट एक्सपोजर की कमी जैसे मुद्दे निवेशकों की चिंता बढ़ा रहे हैं। सर्वे में 98 फंड मैनेजर्स ने हिस्सा लिया, जो कुल $272 बिलियन की एसेट्स मैनेज करते हैं।
आइए समझते हैं कि ग्लोबल निवेशक भारतीय इक्विटीज को लेकर सावधान क्यों हैं और इसका भारतीय मार्केट के लिए क्या मतलब है।
क्या है मामला?
बैंक ऑफ अमेरिका (Bank of America) के सर्वे के अनुसार, 32% फंड मैनेजर्स भारतीय इक्विटीज पर नेट अंडरवेट हैं। यानी भारत में निवेश का उनका एक्सपोजर उनके सामान्य या बेंचमार्क वेट से कम है। भारत अब इंडोनेशिया से भी नीचे चला गया है, जबकि ताइवान और जापान एशिया के सबसे पसंदीदा मार्केट बने हुए हैं।
भारत के प्रति कमजोर सेंटीमेंट के पीछे सबसे बड़ी चिंता भारतीय कंपनियों में AI से जुड़ी स्पष्ट एक्सपोजर की कमी है। इसके बाद कमजोर आर्थिक ग्रोथ, सीमित रिफॉर्म्स और हाई वैल्यूएशंस को प्रमुख जोखिम माना गया है। यह खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि ग्लोबल निवेशक फिलहाल ऐसे मार्केट्स की तलाश कर रहे हैं जहां AI थीम से कमाई और ग्रोथ का स्पष्ट फायदा दिखाई देता हो।
फिर भी तस्वीर पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। ग्लोबल फंड्स ने मौजूदा तिमाही में भारतीय इक्विटीज में $4 बिलियन से अधिक निवेश किया है, जो क्षेत्र के इमर्जिंग मार्केट्स में सबसे ज्यादा इनफ्लो है। यह रिकॉर्ड आउटफ्लो के बाद आया है। यानी निवेशकों की चिंता बढ़ी जरूर है, लेकिन भारतीय मार्केट से ग्लोबल कैपिटल पूरी तरह दूर नहीं हुआ है।
अर्निंग्स बेहतर, फिर भी निवेशक सतर्क क्यों?
भारतीय मार्केट की मौजूदा स्थिति में सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि कॉर्पोरेट अर्निंग्स में सुधार के बावजूद निवेशकों का सेंटीमेंट कमजोर है। NSE निफ्टी 50 में शामिल कंपनियों का प्रॉफिट लेटेस्ट तीन महीने की अवधि में 18% YoY बढ़ा। यह 10% की ग्रोथ के अनुमान से भी बेहतर रहा।
इसके बावजूद भारतीय इक्विटीज पिछले दो सप्ताह में कमजोर हुई हैं। इस अवधि में प्रमुख बेंचमार्क्स में 2-3% की गिरावट आई और निफ्टी 50 अपने हालिया मार्च लो से 8% रिकवर कर चुका है, लेकिन 2026 में अब भी करीब 8% नीचे है और एशिया के प्रमुख इक्विटी मार्केट्स में दूसरा सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला मार्केट बना हुआ है।
इस तुलना में ताइवान और कोरिया इक्विटी बेंचमार्क्स 2026 में अब तक 50% से अधिक चढ़ चुके हैं, जबकि जापान में 26% से अधिक की तेजी रही है। ऐसे में भारत की कमजोर रिलेटिव परफॉर्मेंस ग्लोबल फंड मैनेजर्स के लिए एक महत्वपूर्ण फैक्टर बन गई है।
क्रूड और FII फ्लो ने बढ़ाई चिंता
भारत के प्रति निवेशकों की सावधानी केवल इक्विटी वैल्यूएशंस या AI एक्सपोजर तक सीमित नहीं है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और हाई एनर्जी कॉस्ट भी सेंटीमेंट पर दबाव डाल रही है। मई में भी भारत BofA सर्वे में सबसे कम पसंदीदा मार्केट बना था, जब US-ईरान युद्ध के बाद ग्लोबल क्रूड प्राइस में तेजी आई थी। अब संघर्ष के समाधान के स्पष्ट संकेत नहीं होने से एनर्जी प्राइस को लेकर चिंता फिर बढ़ी है।
FII फ्लो भी दबाव का एक अहम हिस्सा है। 2026 में अब तक FIIs भारतीय इक्विटीज के करीब ₹2.40 लाख करोड़ के नेट सेलर्स रहे हैं। यह 2025 में उनके ₹1.66 लाख करोड़ के आउटफ्लो के बाद आया है। हालांकि, मौजूदा तिमाही में ग्लोबल फंड्स ने $4 बिलियन से अधिक की खरीदारी की है, जिससे संकेत मिलता है कि ग्लोबल निवेशकों का व्यवहार पूरी तरह एकतरफा नहीं है।
इसी दौरान इंडोनेशिया में सेंटीमेंट बेहतर हुआ है। वहां नेट अंडरवेट फंड मैनेजर्स की हिस्सेदारी जुलाई के 32% से घटकर 27% हो गई। जकार्ता कम्पोजिट इंडेक्स भी जून के लो से 20% से अधिक ऊपर आया है।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
इस सर्वे का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि मजबूत अर्निंग्स अपने आप में ग्लोबल निवेशकों को भारतीय मार्केट की ओर आकर्षित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। निवेशक ग्रोथ की गति, वैल्यूएशन, रिफॉर्म्स और AI जैसी नई ग्रोथ थीम्स में भारतीय कंपनियों की स्थिति को भी देख रहे हैं।
भारत की 32% नेट अंडरवेट पोजिशनिंग बताती है कि ग्लोबल फंड मैनेजर्स फिलहाल भारतीय इक्विटीज में आक्रामक तरीके से एक्सपोजर बढ़ाने के बजाय सावधानी बरत रहे हैं। वहीं, $4 बिलियन से अधिक का मौजूदा तिमाही इनफ्लो और 18% निफ्टी 50 प्रॉफिट ग्रोथ यह भी दिखाते हैं कि मार्केट की फंडामेंटल तस्वीर पूरी तरह कमजोर नहीं हुई है।
इसलिए निवेशकों के लिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि मार्केट गिर रहा है या बढ़ रहा है। यह समझना ज्यादा जरूरी होगा कि अर्निंग्स ग्रोथ, वैल्यूएशन और ग्लोबल फंड फ्लो एक-दूसरे के साथ किस दिशा में जा रहे हैं।
भविष्य की बातें
आने वाले समय में भारतीय मार्केट का सेंटीमेंट इस बात पर निर्भर करेगा कि कॉर्पोरेट अर्निंग्स में सुधार कितना सस्टेनेबल रहता है और निवेशकों की प्रमुख चिंताएं कितनी कम होती हैं। AI एक्सपोजर, आर्थिक ग्रोथ, रिफॉर्म्स और वैल्यूएशंस फिलहाल ग्लोबल फंड मैनेजर्स के प्रमुख फोकस एरिया हैं।
इसके साथ ही पश्चिम एशिया का तनाव और एनर्जी प्राइस भी महत्वपूर्ण रहेंगे। यदि एनर्जी कॉस्ट पर दबाव बना रहता है, तो निवेशकों की सावधानी जारी रह सकती है। दूसरी ओर, अर्निंग्स में सुधार और ग्लोबल फंड्स की मौजूदा खरीदारी मार्केट के लिए सकारात्मक संकेत दे सकती है।
निफ्टी 50 का मार्च लो से 8% रिकवर होने के बावजूद 2026 में करीब 8% नीचे रहना और लगातार 10 वर्षों की वार्षिक बढ़त की स्ट्रीक टूटने की संभावना यह बताती है कि भारतीय मार्केट के सामने चुनौती सिर्फ शॉर्ट-टर्म वोलैटिलिटी की नहीं है। फिलहाल ग्लोबल निवेशकों के लिए भारत की कहानी में ग्रोथ और वैल्यूएशन के बीच संतुलन सबसे महत्वपूर्ण सवाल बना हुआ है।
डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल एजुकेशनल और इंफॉर्मेशनल उद्देश्य के लिए है और यह इन्वेस्टमेंट एडवाइस या किसी भी सिक्योरिटीज को खरीदने या बेचने की रिकमेंडेशन नहीं है। यहाँ जिन कंपनियों का उल्लेख किया गया है, उन्हें मार्केट डेवलपमेंट्स के संदर्भ में केवल उदाहरण के रूप में बताया गया है। इन्वेस्टर्स को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी इन्वेस्टमेंट डिसीजन लेने से पहले अपनी खुद की रिसर्च करें और अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से परामर्श करें।
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