सिल्वर ने पिछले एक साल में जबरदस्त तेजी दिखाई। जुलाई 2026 तक एक साल में सिल्वर ने 98% का रिटर्न दिया। लेकिन औसत निवेशक का मनी-वेटेड रिटर्न सिर्फ 18% रहा। DSP म्यूच्यूअल फंड की सितंबर 2026 की Netra रिपोर्ट में यह अंतर साफ दिखता है। रिपोर्ट के मुताबिक FOMO यानी Fear of Missing Out ने निवेशकों को सही एसेट में भी गलत समय पर निवेश करने के लिए प्रेरित किया, जिससे उनका रिटर्न काफी कम रहा। आइए विस्तार से समझें कि यह गैप कैसे बना।
सिल्वर की रैली और निवेशकों का रिटर्न
DSP की रिपोर्ट के अनुसार, सिल्वर का मार्केट रिटर्न एक साल में 98% रहा, जबकि सिल्वर ETF में निवेश करने वाले औसत निवेशक का मनी-वेटेड रिटर्न सिर्फ 18% था। मनी-वेटेड रिटर्न यह दिखाता है कि निवेशक ने कितना पैसा और किस समय निवेश किया। पिछले 12 महीनों में सिल्वर ETF में लगाए गए पैसे में से 56% रकम 31 जुलाई 2026 तक नुकसान में थी।
जनवरी 2026 में सिल्वर ETF में रिकॉर्ड 11,761 करोड़ रुपये का नेट इनफ्लो आया। यह एक महीने में अब तक का सबसे बड़ा इनफ्लो था। यह पैसा मंथली प्राइस पीक के आसपास आया। जनवरी का यह इनफ्लो सितंबर 2024 से अगस्त 2025 तक के कुल क्युमुलेटिव इनफ्लो के लगभग बराबर था, जब सिल्वर की प्राइस 1.41 लाख रुपये प्रति किलो से नीचे थी।
FOMO ने गलत समय पर निवेश करवाया
रिपोर्ट का मुख्य संदेश है कि FOMO निवेशकों को गलत एसेट में नहीं ले जाता, बल्कि सही एसेट में भी तब निवेश करवाता है जब उसका बड़ा हिस्सा पहले ही बढ़ चुका होता है। ‘FOMO converts past returns into future expectations’ यानी निवेशक पिछले रिटर्न को भविष्य के रिटर्न की उम्मीद समझने लगते हैं।
जैसे-जैसे सिल्वर की प्राइस बढ़ी, निवेशकों की डिमांड भी बढ़ती गई। प्राइस जितनी ऊपर गई, उतना ही ज्यादा पैसा उसके पीछे आया। निवेशक हाई रिटर्न को देखकर उम्मीद करने लगे कि तेजी आगे भी जारी रहेगी।
इसका नतीजा यह हुआ कि निवेशकों ने कम प्राइस पर खरीदने के बजाय तेजी के बाद ज्यादा पैसा लगाया। इसी वजह से मार्केट का रिटर्न और निवेशक का वास्तविक रिटर्न अलग हो गया।
इनफ्लो का पैटर्न और नुकसान
जनवरी 2026 का रिकॉर्ड इनफ्लो इसका साफ उदाहरण है। उस समय सिल्वर पहले ही काफी ऊपर चढ़ चुकी थी और निवेशकों की डिमांड तेजी के साथ बढ़ रही थी। 56% पूंजी का नुकसान में होना यह नहीं बताता कि सिल्वर ने कुल मिलाकर नुकसान दिया। इसका मतलब है कि कई निवेशकों ने तेजी के दौरान अलग-अलग हाई स्तर पर पैसा लगाया और उनकी खरीद प्राइस बाद के स्तर से ऊपर रही।
अगर कोई निवेशक तेजी शुरू होने से पहले निवेश करता, तो उसे पूरे उछाल का फायदा मिल सकता था। लेकिन हाई स्तर पर निवेश करने वालों के लिए रिटर्न कम रह गया। यही वजह है कि किसी एसेट का मार्केट रिटर्न और निवेशक का वास्तविक रिटर्न हमेशा एक जैसा नहीं होता।
दूसरी कैटेगरीज में भी दिखा यही पैटर्न
DSP रिपोर्ट में दूसरी वोलैटाइल कैटेगरीज में भी ऐसा ही अंतर दिखता है।
फंड का रिटर्न और निवेशक का रिटर्न, ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू नहीं हैं। आंकड़े बताते हैं कि काग़ज़ पर दिखने वाली बढ़त निवेशक तक पहुंचते-पहुंचते कितनी घट जाती है।
2013 से 2020 के बीच स्मॉल-कैप फंड्स ने हर साल औसतन 14.8% रिटर्न दिया। मगर आम निवेशक का अनुभव इससे कोसों दूर रहा, उनका रिटर्न सालाना नेगेटिव 1.6% रहा। दोनों के बीच 16.4 पॉइंट्स का फासला इसलिए बना, क्योंकि निवेशको ने गलत समय पर निवेश किया। दिसंबर 2017 तक सात साल में सिर्फ ₹17,000 करोड़ आया, और अगले ढाई साल (जनवरी 2018-जून 2020) में अचानक ₹27,000 करोड़ का इनफ्लो हुआ।
इंफ्रा फंडों की कहानी और भी चौंकाने वाली है। 2004-09 में 33.8% सालाना का रिटर्न देने वाली इस कैटेगरी से निवेशको सिर्फ 6.2% रिटर्न दिया। वजह? कुल निवेश का तीन-चौथाई हिस्सा मार्च 2007-मार्च 2008 के एक साल में आया, यानी शिखर के ठीक आसपास, उछाल खत्म होने से पहले।
सिर्फ इतना ही नहीं, पिछले सात सालों (2019-2026) में टेक फंड्स का 17% CAGR रिटर्न निवेशकों के लिए 7.6% में बदल गया। मोमेंटम फंड्स में तो हालत और खराब रहे, क्योंकि 2021 से 2026 तक 15.1% के फंड रिटर्न के मुकाबले निवेशक को केवल 3.2% मिला।
सबक एक ही है: पैसा बनाने में फंड की क्षमता से ज़्यादा मायने रखता है निवेशक का समय और धैर्य।
निवेश व्यवहार से क्या सीख मिलती है?
फंड का रिपोर्टेड रिटर्न NAV पर आधारित होता है और पोर्टफोलियो के प्रदर्शन को दिखाता है। वहीं, निवेशक रिटर्न में यह भी शामिल होता है कि पैसा कब निवेश किया गया और कब निकाला गया। यह अंतर उन कैटेगरीज में ज्यादा दिखता है जहां रिटर्न वोलैटाइल और लम्पी होते हैं। निवेशक अक्सर एक साल के रिटर्न पर ज्यादा ध्यान देते हैं और अच्छा हालिया प्रदर्शन ज्यादा फ्लो में बदल जाता है।
मनी कंट्रोल के अनुसार, बजाज AMC के गणेश मोहन ने Morningstar डेटा का हवाला देते हुए कहा कि निवेशक तीन, पांच और दस साल की अवधि में फंड रिटर्न से 2.5 से 5% कम कमाते हैं।
सिस्टमैटिक इनवेस्टिंग एंट्री पॉइंट के गलत होने का जोखिम कम कर सकती है, लेकिन SIP व्यवहारिक जोखिम को पूरी तरह खत्म नहीं करती। नियमित निवेश से कम प्राइस पर ज्यादा यूनिट्स और हाई प्राइस पर कम यूनिट्स मिलती हैं। बड़ी चुनौती यह है कि मार्केट में असहज स्थिति आने पर भी रणनीति जारी रखी जाए।
सिल्वर का यह उदाहरण दिखाता है कि सिर्फ पिछला रिटर्न देखकर जल्दबाजी में निवेश करने से वास्तविक कमाई काफी कम हो सकती है। मार्केट का रिटर्न और निवेशक का रिटर्न अलग हो सकता है, क्योंकि निवेश का समय भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।
डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल एजुकेशनल और इंफॉर्मेशनल उद्देश्य के लिए है और यह इन्वेस्टमेंट एडवाइस या किसी भी सिक्योरिटीज को खरीदने या बेचने की रिकमेंडेशन नहीं है। यहाँ जिन कंपनियों का उल्लेख किया गया है, उन्हें मार्केट डेवलपमेंट्स के संदर्भ में केवल उदाहरण के रूप में बताया गया है। इन्वेस्टर्स को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी इन्वेस्टमेंट डिसीजन लेने से पहले अपनी खुद की रिसर्च करें और अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से परामर्श करें।
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