भारत की आर्थिक स्थिति में ग्लोबल ट्रेड और डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर की भूमिका बढ़ रही है। ब्रिक्स के 11 देशों तक विस्तार से यह ग्रुप ग्लोबल मर्चेंडाइज ट्रेड का बड़ा हिस्सा बन गया है। हालांकि, भारत के लिए इसके साथ बढ़ता ट्रेड डेफिसिट एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है।
पिछले पांच वर्षों में भारत ने UPI के जरिए डिजिटल ट्रांजैक्शन में बड़ा स्केल हासिल किया है, लेकिन गुड्स ट्रेड में आयात की रफ्तार निर्यात से काफी ज्यादा रही है। आइए भारत के ब्रिक्स ट्रेड की स्थिति और बढ़ते ट्रेड डेफिसिट को समझते हैं।
क्या है मामला?
FY2026 में ब्रिक्स के साथ भारत का मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिट बढ़कर $226.1 बिलियन हो गया, जो FY2021 के $74.5 बिलियन से तीन गुना से अधिक है। इस दौरान भारत ने ब्रिक्स देशों से $321.8 बिलियन के गुड्स आयात किए, जबकि निर्यात केवल $95.7 बिलियन रहे।
कुल गुड्स ट्रेड $203.1 बिलियन से बढ़कर $417.5 बिलियन हो गया। इसमें निर्यात 48.8% बढ़कर $64.3 बिलियन से $95.7 बिलियन हुए, जबकि आयात 131.8% बढ़कर $138.8 बिलियन से $321.8 बिलियन हो गए।
ब्रिक्स का भारत के कुल मर्चेंडाइज आयात में हिस्सा FY2021 के 35.2% से बढ़कर 41.5% हो गया। वहीं, निर्यात में इसका हिस्सा 22% से मामूली घटकर 21.7% रह गया। इसके मुकाबले नॉन-ब्रिक्स देशों से आयात 77.6% बढ़कर $453.9 बिलियन हुए, जबकि रेस्ट ऑफ वर्ल्ड को निर्यात 52% बढ़कर $345.8 बिलियन रहे।
सबसे बड़ा असंतुलन चीन, रूस और UAE के साथ
भारत के ब्रिक्स ट्रेड डेफिसिट का करीब 84% हिस्सा केवल चीन, रूस और UAE से आता है। इसमें अकेले चीन की हिस्सेदारी करीब 41% है। चीन से भारत के आयात $65.2 बिलियन से बढ़कर $131.6 बिलियन हो गए, जबकि निर्यात 8.1% घटकर $21.2 बिलियन से $19.5 बिलियन रह गए। इससे चीन के साथ ट्रेड डेफिसिट $112.16 बिलियन हो गया।
रूस से आयात $5.5 बिलियन से बढ़कर $55.4 बिलियन हो गए। यह वृद्धि मुख्य रूप से एनर्जी आयात के कारण हुई। रूस को भारत के निर्यात $2.7 बिलियन से बढ़कर केवल $4.5 बिलियन हुए। इससे रूस के साथ डेफिसिट $50 बिलियन से अधिक रहा।
UAE भारत का ब्रिक्स के भीतर सबसे बड़ा निर्यात डेस्टिनेशन रहा। यहां निर्यात 124% बढ़कर $37.4 बिलियन हुए, जबकि आयात 140% बढ़कर $63.9 बिलियन हो गए। इससे डेफिसिट $26.53 बिलियन रहा। सऊदी अरब के साथ डेफिसिट $20 बिलियन से अधिक और इंडोनेशिया के साथ $15.8 बिलियन रहा।
भारत का कुल ग्लोबल मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिट भी FY2021 के $102.6 बिलियन से बढ़कर FY2026 में $334.3 बिलियन हो गया। इसमें ब्रिक्स का डेफिसिट करीब 68% है।
ब्रिक्स ट्रेड में चीन का दबदबा
2025 में 11 ब्रिक्स देशों ने $5.67 ट्रिलियन का निर्यात किया, जो ग्लोबल मर्चेंडाइज निर्यात का 21.6% है। वहीं, इनके आयात $4.58 ट्रिलियन रहे, जिससे ब्रिक्स को करीब $1.09 ट्रिलियन का सरप्लस मिला। इसके बावजूद ब्रिक्स देशों के बीच आपसी ट्रेड सीमित है। इंट्रा-ब्रिक्स निर्यात उनके कुल निर्यात का 18.8% और आयात 29.5% रहे। ग्लोबल ट्रेड में इंट्रा-ब्रिक्स निर्यात केवल 4.1% और आयात 5.4% हैं।
इस नेटवर्क में चीन की भूमिका सबसे बड़ी है। चीन ने दूसरे ब्रिक्स सदस्यों को $550.8 बिलियन का निर्यात किया और उनसे $464.9 बिलियन का आयात किया। वहीं, भारत का ब्लॉक के भीतर सबसे बड़ा ट्रेड डेफिसिट $226.1 बिलियन रहा। यह पैटर्न चीन-केंद्रित हब-एंड-स्पोक जैसा दिखता है।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
बढ़ता ट्रेड डेफिसिट केवल एक ट्रेड आंकड़ा नहीं है, बल्कि भारत की ट्रेड और पेमेंट पॉलिसी के लिए भी महत्वपूर्ण है। भारत ने 12-13 सितंबर की नई दिल्ली समिट में CBDC ब्रिज का प्रस्ताव रखा था। इसका उद्देश्य क्रॉस-बॉर्डर ट्रांजैक्शन्स को तेज और सस्ता बनाना है। इसका लक्ष्य कॉमन करेंसी बनाना नहीं, बल्कि अतिरिक्त पेमेंट ऑप्शन्स उपलब्ध कराना है।
हालांकि, तेज पेमेंट सिस्टम अपने आप निर्यात नहीं बढ़ा सकता। अगर आयात लगातार निर्यात से ज्यादा रहते हैं, तो बायलेटरल सेटलमेंट में करेंसी बैलेंस का मुद्दा सामने आ सकता है। इसके लिए करेंसी-स्वैप अरेंजमेंट्स और डीपर फाइनेंशियल मार्केट्स जरूरी होंगे।
भारत का UPI इस डिजिटल क्षमता का उदाहरण है। अगस्त 2026 में UPI ने 24.51 बिलियन ट्रांजैक्शन्स के जरिए करीब $314 बिलियन का लेनदेन प्रोसेस किया।
भारत बेहतर मार्केट एक्सेस, प्रेडिक्टेबल रूल्स और डिजिटल ट्रेड डॉक्यूमेंटेशन पर भी जोर दे रहा है। फार्मास्यूटिकल्स, ऑटोमोबाइल्स, इंजीनियरिंग गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, एग्रीकल्चरल प्रोडक्ट्स और सर्विसेज के लिए बेहतर मार्केट पहुंच जरूरी बताई गई है। न्यू डेवलपमेंट बैंक, जिसका ऑथराइज्ड कैपिटल $100 बिलियन है, इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस में भूमिका निभा सकता है।
भविष्य की बातें
BRICS का प्रस्तावित CBDC ब्रिज व्यापार भुगतान को आसान बनाने में मदद कर सकता है, लेकिन भारत के लिए इसकी असली अहमियत तभी होगी जब इससे व्यापार संबंधों में बेहतर संतुलन बने। केवल भुगतान का तरीका बदलने से भारत का $226.1 बिलियन का व्यापार घाटा कम नहीं होगा।
आगे की दिशा भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता, निर्यात क्षमता, बाजार पहुंच और BRICS देशों के साथ दोतरफा व्यापार पर निर्भर करेगी। इसलिए CBDC जैसे नए भुगतान माध्यम अवसर पैदा कर सकते हैं, लेकिन भारत के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण यह होगा कि वह क्या निर्यात करता है, कितना निर्यात करता है और BRICS के साथ व्यापार में संतुलन कितना बेहतर होता है।
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