भारत और विश्व व्यापार संगठन (WTO) के बीच कृषि सब्सिडी को लेकर काफी तनाव है, जाने क्या है इसके पीछे की असल वजह।
भारत में, कृषि (खासकर गाँवों में) मुख्य और सबसे बड़ा आजीविका का स्रोत है क्योंकि लगभग 70% भारतीय जनसंख्या कृषि पर आधारित है और वर्तमान में भारत विश्व कृषि निर्यात में महत्वपूर्ण योगदान रखता है। लेकिन भारत को विश्व व्यापार संगठन (WTO) में अपनी कृषि सब्सिडी के लिए बार-बार डाँट पड़ती है। इसलिए भारत ने WTO को कहा कि हम नए कृषि कार्यक्रम की चर्चा नहीं करेंगे जब तक यह सब्सिडी मामला हल नहीं हो जाता।
वर्तमान में, भारतीय कृषि को विश्व व्यापार संगठन के कारण समस्याएं आ रही हैं इसलिए इस आर्टिकल में हम समझते है कि आखिर भारतीय कृषि और विश्व व्यापार संगठन के बीच क्या मामला है?
क्या है मामला?
आज़ादी के बाद हमारे देश में इतनी बड़ी आबादी को खिलाने के लिए पर्याप्त भोजन नहीं था इसलिए हमें अपनी खाने की जरूरतों को पूरा करने के लिए अन्य देशो से अनाज निर्यात करना पड़ता था। जिसके लिए भारी रकम चुकानी पड़ती थी या फिर अन्य देशो से सहायता पर निर्भर रहना पड़ता था।
फिर, 1960 में सरकार ने अंत में तय किया कि आत्मनिर्भर बनेंगे, जिसके लिए सरकार ने कृषि के लिए उच्च उत्पादक बीजों को लाए, खेती में आवश्यक उर्वरको का प्रयोग किया और खेती में सहायता के लिए विभिन्न मशीनरी को सुधारने पर काम शुरू कर दिया।
साथ ही, सरकार ने धान और गेंहू की खेती बोने को प्रोत्साहित करने के लिए किसानों को एक न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) प्रदान किया। इसका मतलब है कि सरकार किसानों को गारंटी देती है कि अगर उन्हें बाजार में कहीं और बेहतर कीमत नहीं मिलती है तो सरकार उनसे उनका अनाज अच्छी कीमत में खरीदेंगी। लेकिन अभी इस सब्सिडी को लेकर भारत और WTO के बीच तनाव का माहौल है।
हरित क्रांति की शुरुआत
यह एक आंदोलन था जिसका उद्देश्य कृषि उत्पादकता बढ़ाना और देश की अर्थव्यवस्था में सुधार करना था, जो कि 1960 के दशक से शुरू हुआ। जिसके दौरान भारत में कृषि को तकनीकी औद्योगिक प्रणाली में बदल दिया गया था। इसमें कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए उच्च उत्पादकता वाले बीज, खेती के उपकरण, सिंचाई सुविधाएँ, कीटनाशक, और उर्वरकों का उपयोग जैसी तकनीकों को अपनाया गया।
भारत और WTO के बीच टेंशन की वजह
भारत की यह प्रगति अन्य देशो को निराश कर रही थी, उनका मानना था कि भारत अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिस का सहारा लेता था। क्योंकि भारत सरकार किसानों से फसलें कृत्रिम रूप से कम कीमत पर खरीद रही थी, और फिर दुनिया भर के बाजारों में कम कीमत पर निर्यात कर रही थी।
विकसित देशों की शिकायत है कि भारत ने कई बार नियमों को तोड़ा है। उनका कहना है कि भारत ने कई बार कुल मूल्य के 60-70% के सब्सिडी प्रदान की है।
लेकिन अभी आप सोच रहे होंगे कि, ये नियम क्या हैं?
WTO सरकारों को किसानों को सब्सिडी प्रदान करने की अनुमति देता है लेकिन इसकी एक सीमा है।
- 5%: विकसित देशो के लिए
- 10%: विकासशील देशो के लिए
भविष्य की बातें
भारत ने WTO को जवाब दिया है कि हम दशकों से इन सवालों का जवाब दे रहे है और हम इस खेल से थक गए हैं और हमने तय किया है कि जब तक यह समस्या हल नहीं हो जाती, हम नए कृषि कार्यक्रम करेंगे और उन देशों से समर्थन प्राप्त करने की कोशिश कर रहे हैं जो इसी स्थिति में हैं और हम मिलकर इन नियमों को बदलना चाहते है।
अब देखते है कि आगे क्या होता है, ऐसा लगता है कि भारत को अपनी मांग को साबित करने के लिए कुछ अन्य देशों का भी समर्थन है। साथ ही अब हमें यह देखना होगा कि क्या WTO के सदस्य इन नियमों में बदलाव को लेकर सहमत होते हैं या नहीं।
आज के लिए इतना ही। हमें उम्मीद है कि आपको यह जानकारी रोचक लगी होगी। इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर करना न भूलें।
*आर्टिकल केवल सूचना के उद्देश्य से है। यह निवेश सलाह नहीं है।
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