NSE ने शुरू की EGR (इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स) ट्रेडिंग, जानें!

NSE ने शुरू की EGR (इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स) ट्रेडिंग, जानें!
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भारत में गोल्ड इन्वेस्टमेंट की दुनिया में एक नया अध्याय शुरू हो गया है। NSE ने 18 मई 2026 से इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स (EGRs) का ट्रेडिंग शुरू कर दिया है, जो निवेशकों को फिजिकल गोल्ड के बिना डिजिटल रूप में गोल्ड ओनरशिप का मौका देता है। यह कदम भारत के संगठित गोल्ड मार्केट में बड़े स्ट्रक्चरल बदलाव का प्रतीक है। EGRs फिजिकल गोल्ड की पारंपरिक समस्याओं जैसे प्यूरिटी, स्टोरेज और सिक्योरिटी को हल करते हुए गोल्ड प्राइस एक्सपोजर प्रदान करते हैं।

आइए समझते है कि इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स (EGRs) क्या है कैसे काम करते है और यह निवेशकों के लिए क्या मायने रखते है।

क्या है मामला?

NSE पर EGRs ट्रेडिंग 18 मई 2026 से शुरू हो गई है और इसमें ट्रेडिंग के लिए मार्केट सोमवार से शुक्रवार सुबह 9 बजे से रात 11:30 बजे तक काम करेगा, जो US डे लाइट सेविंग समय में रात 11:55 तक बढ़ सकता है। सेटलमेंट T+1 साइकिल पर होगा। इसमें रिटेल इन्वेस्टर्स, ज्वेलर्स, बुलियन ट्रेडर्स, रिफाइनरीज और अन्य स्टेकहोल्डर्स शामिल होंगे।

इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स मूल रूप से फिजिकल गोल्ड का डिजिटल प्रतिनिधित्व है। प्रत्येक EGR SEBI-रेगुलेटेड वॉल्ट्स में स्टोर किए गए स्टैंडर्डाइज्ड और सर्टिफाइड फिजिकल गोल्ड पर आधारित होता है। एक्सचेंज, क्लियरिंग कॉर्पोरेशन, डिपॉजिटरीज और लाइसेंस्ड वॉल्ट मैनेजर्स के फ्रेमवर्क के तहत यह सिस्टम काम करता है। ओनरशिप शेयर्स की तरह डीमैट अकाउंट में दिखाई देती है।

EGRs विभिन्न डिनॉमिनेशन्स में उपलब्ध हैं – 1 किलोग्राम, 100 ग्राम, 10 ग्राम, 1 ग्राम और 100 मिलीग्राम। इससे छोटे-बड़े सभी निवेशक आसानी से भाग ले सकते हैं। यह लॉन्च भारत के गोल्ड मार्केट को अधिक ट्रांसपेरेंट, सिक्योर और एक्सेसिबल बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, जहां पारंपरिक फिजिकल गोल्ड में प्यूरिटी चिंता, स्टोरेज कॉस्ट, चोरी का खतरा और रिसेल पर डिडक्शन्स जैसी समस्याएं बनी रहती हैं।

EGRs कैसे काम करते हैं?

इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स (EGRs) सिस्टम में निवेशक एक्सचेंज के माध्यम से EGR खरीदते हैं, जो वास्तविक फिजिकल गोल्ड द्वारा बैक्ड होता है। गोल्ड लाइसेंस्ड वॉल्ट मैनेजर्स के पास सुरक्षित रूप से रखा जाता है। ट्रेडिंग डीमैट अकाउंट के जरिए होती है, जिससे आसान खरीद-बिक्री संभव है।

यह प्रोडक्ट निवेशकों को बिना फिजिकल हैंडलिंग के गोल्ड की प्राइस में भागीदारी देता है। एक्सचेंज प्लेटफॉर्म पर EGR ट्रेड्स पर GST नहीं लगता, लेकिन EGR को फिजिकल गोल्ड में कन्वर्ट करने पर 3% GST लागू होता है। NSE का मानना है कि यह सिस्टम निवेशकों, ज्वेलर्स, ट्रेडर्स और रिफाइनर्स को एक प्लेटफॉर्म पर लाएगा, जिससे शहर-आधारित फ्रैगमेंटेड प्राइसिंग की जगह यूनिफॉर्म मार्केट-ड्रिवन प्राइसिंग आएगी।

EGRs की अन्य गोल्ड इन्वेस्टमेंट ऑप्शन्स से तुलना

भारत में गोल्ड इन्वेस्टमेंट के कई विकल्प पहले से मौजूद हैं। फिजिकल गोल्ड में ज्वेलरी, कॉइन्स या बार्स के रूप में डायरेक्ट ओनरशिप होती है। गोल्ड ETFs स्टॉक एक्सचेंज पर ट्रेड होते हैं और गोल्ड प्राइस एक्सपोजर देते हैं बिना फिजिकल होल्डिंग के। गोल्ड म्यूचुअल फंड्स मुख्य रूप से गोल्ड ETFs और रिलेटेड इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश करते हैं। सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड सरकारी सिक्योरिटीज हैं जो गोल्ड से लिंक्ड रिटर्न देते हैं।

EGRs इनसे अलग हैं क्योंकि ये डायरेक्ट फिजिकल गोल्ड बैकिंग के साथ डीमैट फॉर्म में ओनरशिप देते हैं। छोटी डिनॉमिनेशन्स से यह अधिक फ्लेक्सिबल है। हालांकि, लिक्विडिटी अभी चुनौती है, मजबूत इंस्टीट्यूशनल पार्टिसिपेशन और मार्केट मेकिंग की जरूरत है। कई ब्रोकर प्लेटफॉर्म्स अभी EGR ट्रेडिंग को पूरी तरह सपोर्ट नहीं करते। व्यवहारिक रूप से भारतीय परिवार फिजिकल पजेशन को ही गोल्ड ओनरशिप से जोड़ते हैं, इसलिए डिजिटल शिफ्ट में समय लग सकता है।

निवेशकों के लिए इसमें क्या है?

EGR उन निवेशकों के लिए एक नया और रेगुलेटेड विकल्प है जो बिना फिजिकल गोल्ड घर में रखे सुरक्षित तरीके से गोल्ड में निवेश करना चाहते हैं। यह असली गोल्ड के बदले जारी होने वाला डिजिटल सर्टिफिकेट है, जो डीमैट अकाउंट में शेयर्स की तरह रखा जाता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि निवेशक इसे शेयर मार्केट में कभी भी खरीद-बेच सकते हैं और जरूरत पड़ने पर इसके बदले असली गोल्ड कॉइन या बार भी ले सकते हैं। साथ ही, इसे खरीदते समय शुरुआत में 3% GST नहीं देना पड़ता, हालांकि ब्रोकरेज, स्टोरेज और एक्सचेंज चार्ज जरूर लगते हैं। टैक्स के लिहाज से 12 महीने से पहले बेचने पर मुनाफा इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्सेबल होगा, जबकि 12 महीने बाद बेचने पर 12.5% टैक्स लागू होगा।

हालांकि EGR मार्केट अभी शुरुआती दौर में है और इसमें ट्रेडिंग वॉल्यूम कम होने की वजह से खरीद और बिक्री के भाव में बड़ा अंतर देखने को मिलता है। इसी कारण यह कई बार सामान्य बाजार भाव से थोड़ा महंगा पड़ सकता है। भारत में ज्यादातर लोग अब भी ज्वेलरी शॉप से फिजिकल गोल्ड खरीदना पसंद करते हैं, जबकि केवल कीमतों के उतार-चढ़ाव से फायदा कमाने वाले निवेशकों के लिए गोल्ड ETF पहले से ही ज्यादा आसान और लिक्विड विकल्प बना हुआ है। कुल मिलाकर, EGR उन निवेशकों के लिए बेहतर विकल्प है जो सुरक्षित, पारदर्शी और भविष्य में फिजिकल डिलीवरी वाले डिजिटल गोल्ड में निवेश करना चाहते हैं।

भविष्य की बातें

भारत में गोल्ड निवेश की मजबूत परंपरा और FY26 में $70 अरब से ज्यादा के गोल्ड इंपोर्ट बिल के बीच EGR एक बड़े बदलाव की शुरुआत हो सकता है। इसका मकसद गोल्ड ट्रेडिंग को पारंपरिक और बिखरे हुए फिजिकल मार्केट से निकालकर रेगुलेटेड, डीमैट और एक्सचेंज आधारित सिस्टम में लाना है। NSE की एंट्री से इसकी पहुंच और भरोसा जरूर बढ़ेगा, लेकिन लिक्विडिटी और निवेशकों की जागरूकता जैसी चुनौतियां अभी भी बनी रहेंगी।

लंबी अवधि में EGR पारदर्शी गोल्ड प्राइस डिस्कवरी और सुरक्षित डिजिटल गोल्ड निवेश को बढ़ावा दे सकता है। फिजिकल गोल्ड के मुकाबले इसमें शुद्धता और स्टोरेज की चिंता कम रहती है, जबकि Gold ETF की तुलना में इसमें फिजिकल डिलीवरी का विकल्प मिलता है। यही वजह है कि EGR को निवेश वाले गोल्ड और असली गोल्ड के बीच एक अहम ‘ब्रिज’ के रूप में देखा जा रहा है।

डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल एजुकेशनल और इंफॉर्मेशनल उद्देश्य के लिए है और यह इन्वेस्टमेंट एडवाइस या किसी भी सिक्योरिटीज को खरीदने या बेचने की रिकमेंडेशन नहीं है। यहाँ जिन कंपनियों का उल्लेख किया गया है, उन्हें मार्केट डेवलपमेंट्स के संदर्भ में केवल उदाहरण के रूप में बताया गया है। इन्वेस्टर्स को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी इन्वेस्टमेंट डिसीजन लेने से पहले अपनी खुद की रिसर्च करें और अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से परामर्श करें।

सिक्योरिटीज मार्केट में किए गए इन्वेस्टमेंट मार्केट जोखिम के अधीन होते हैं। इन्वेस्ट करने से पहले सभी संबंधित डॉक्यूमेंट्स को ध्यानपूर्वक से पढ़ें।

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