दुनिया की अर्थव्यवस्था में मैन्युफैक्चरिंग केवल फैक्ट्री मैन्युफैक्चरिंग तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह किसी भी देश की आर्थिक क्षमता, रोजगार सृजन, निर्यात प्रतिस्पर्धा और ग्लोबल सप्लाई चेन में उसकी स्थिति का सबसे बड़ा आधार बन चुकी है। ऐसे समय में जब कंपनियां अपनी सप्लाई चेन को अधिक विविध बनाने की कोशिश कर रही हैं, भारत खुद को एक वैकल्पिक मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में स्थापित करने के प्रयास तेज कर रहा है।
हालांकि, ग्लोबल तस्वीर अभी भी चीन के पक्ष में दिखाई देती है। विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया के कुल मैन्युफैक्चरिंग वैल्यू ऐडेड में भारत की हिस्सेदारी चीन की मुकाबले काफी कम है। इसके बावजूद भारत में लगातार नीतिगत सुधार, मेक इन इंडिया, प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) और चाइना+1 स्ट्रैटेजी जैसे फैक्टर्स ने नई संभावनाएं पैदा की हैं।
आइए विस्तार से समझते हैं कि ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग में भारत की वर्तमान स्थिति क्या है और आगे इसका रास्ता कैसा दिखता है।
क्या है मामला?
विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, चीन ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग वैल्यू ऐडेड का लगभग 28% हिस्सा रखता है। यानी दुनिया में बनने वाली हर चार में से एक से अधिक मैन्युफैक्चर्ड वस्तु चीन में तैयार होती है। वर्ष 2004 में चीन की हिस्सेदारी 10% से भी कम थी, लेकिन दो दशकों में यह तीन गुना से अधिक बढ़ गई है।
चीन का मैन्युफैक्चरिंग वैल्यू ऐडेड लगभग 4.66 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है। यह अमेरिका, जापान और जर्मनी के संयुक्त मैन्युफैक्चरिंग वैल्यू ऐडेड से भी अधिक है। दूसरी ओर अमेरिका की हिस्सेदारी 2004 के लगभग 22% से घटकर 17% रह गई है, जबकि यूरोजोन (Eurozone) लगभग 15% और जापान करीब 5% हिस्सेदारी रखता है।
भारत फिलहाल ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग वैल्यू ऐडेड का लगभग 3% योगदान देता है। आकार के लिहाज से यह चीन से काफी पीछे है, लेकिन दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के कारण भारत अपनी इंडस्ट्रियल क्षमता को तेजी से बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है।
भारत की बढ़ती मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और नए अवसर
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में मैन्युफैक्चरिंग को आर्थिक विकास का प्रमुख आधार बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं। मेक इन इंडिया, PLI स्कीम, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमिकंडक्टर्स, डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग, रिन्यूएबल एनर्जी और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स जैसे सेक्टर्स में निवेश को बढ़ावा दिया जा रहा है।
ASSOCHAM के अनुसार, भारत की औसत मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ वर्ष 2016-19 के दौरान 3.44% थी, जो 2022-25 में बढ़कर 4.15% हो गई। यह ग्लोबल औसत से बेहतर प्रदर्शन माना गया है। रिपोर्ट के अनुसार, मजबूत डोमेस्टिक डिमांड, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, लॉजिस्टिक्स सुधार, इंडस्ट्रियल कॉरिडोर और PM गति शक्ति जैसी पहल भारत को ग्लोबल निवेशकों के लिए आकर्षक मैन्युफैक्चरिंग डेस्टिनेशन बना रही हैं।
IBEF के अनुसार, भारत दुनिया का तीसरा सबसे पसंदीदा मैन्युफैक्चरिंग डेस्टिनेशन है और वर्ष 2030 तक 1 ट्रिलियन डॉलर वैल्यू के गुड्स के निर्यात की क्षमता रखता है।
चाइना+1 स्ट्रैटेजी से भारत को कितना फायदा?
ग्लोबल कंपनियां अब केवल एक देश पर निर्भर रहने के बजाय अपनी सप्लाई चेन को डाइवर्सिफाइड बना रही हैं। इसी कारण चाइना+1 स्ट्रैटेजी के तहत भारत को एक महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
सरकार का लक्ष्य भारत को केवल डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग केंद्र नहीं बल्कि ग्लोबल सप्लाई चेन का अहम हिस्सा बनाना है। इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमिकंडक्टर्स, डिफेंस, ऑटोमोबाइल्स और रिन्यूएबल एनर्जी जैसे सेक्टर्स में बढ़ते निवेश इसी दिशा की ओर संकेत करते हैं।
फिर भी चीन की बढ़त अभी काफी बड़ी है। उसकी इंडस्ट्रियल सफलता दशकों तक किए गए बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश, इंटीग्रेटेड सप्लाई चेन, बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग और हाई वैल्यू इंडस्ट्रीज जैसे इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, बैटरीज, कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स और इंडस्ट्रियल इक्विपमेंट में मजबूत क्षमता का परिणाम है। यही वह अंतर है जिसे कम करना भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती रहेगा।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
भारत की ग्लोबल हिस्सेदारी अभी केवल 3% है, लेकिन तेजी से बदलती ग्लोबल सप्लाई चेन इसे एक लॉन्गटर्म अवसर में बदल सकती है। सरकार की मैन्युफैक्चरिंग आधारित नीतियां और मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाने पर जोर आने वाले वर्षों में कई इंडस्ट्रीज को लाभ पहुंचा सकते हैं।
विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमिकंडक्टर्स, डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग, रिन्यूएबल एनर्जी और ऑटोमोबाइल सप्लाई चेन से जुड़े सेक्टर्स में निवेश गतिविधियां बढ़ने की संभावना दिखाई देती है। यदि भारत ग्लोबल कंपनियों के लिए विश्वसनीय मैन्युफैक्चरिंग केंद्र बनता है, तो इसका सकारात्मक प्रभाव निर्यात, रोजगार और इंडस्ट्रियल विकास पर भी देखने को मिल सकता है।
हालांकि, निवेशकों के लिए यह भी समझना जरूरी है कि चीन और भारत के बीच मैन्युफैक्चरिंग क्षमता का अंतर अभी काफी बड़ा है। इसलिए यह बदलाव एक लंबी अवधि की प्रक्रिया होगी, न कि त्वरित परिवर्तन।
भविष्य की बातें
भारत का लक्ष्य केवल अपनी ग्लोबल हिस्सेदारी बढ़ाना नहीं, बल्कि ग्लोबल सप्लाई चेन में अधिक रणनीतिक भूमिका हासिल करना भी है। मजबूत डोमेस्टिक डिमांड, लगातार सुधार, इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश और मैन्युफैक्चरिंग को प्रोत्साहन देने वाली नीतियां इस दिशा में आधार तैयार कर रही हैं।
दूसरी ओर, चीन अभी भी दुनिया का सबसे बड़ा मैन्युफैक्चरिंग केंद्र बना हुआ है और उसकी इंडस्ट्रियल क्षमता कई दशकों के निवेश का परिणाम है। ऐसे में भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती तेज गति से मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ाने, ग्लोबल प्रतिस्पर्धा मजबूत करने और अधिक निवेश आकर्षित करने की होगी।
यदि वर्तमान सुधारों की गति बनी रहती है और चाइना+1 स्ट्रैटेजी का लाभ मिलता है, तो आने वाले वर्षों में भारत ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग वैल्यू चेन में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की बेहतर स्थिति में हो सकता है।
डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल एजुकेशनल और इंफॉर्मेशनल उद्देश्य के लिए है और यह इन्वेस्टमेंट एडवाइस या किसी भी सिक्योरिटीज को खरीदने या बेचने की रिकमेंडेशन नहीं है। यहाँ जिन कंपनियों का उल्लेख किया गया है, उन्हें मार्केट डेवलपमेंट्स के संदर्भ में केवल उदाहरण के रूप में बताया गया है। इन्वेस्टर्स को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी इन्वेस्टमेंट डिसीजन लेने से पहले अपनी खुद की रिसर्च करें और अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से परामर्श करें।
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