भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) एक नया टोल कलेक्शन सिस्टम लाने की योजना बना रहा है। यह सिस्टम ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (GNSS) पर आधारित होगा, और इसकी मदद से गाड़ियों को टोल पर रुकने की आवश्यकता नही होगी।
आइए देखें कि यह नया टोल कलेक्शन सिस्टम कैसे काम करता है और यह भारत के लिए कैसे फायदेमंद साबित हो सकता है।
क्या है ये नया टोल सिस्टम?
इस नए ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (GNSS) के तहत आपको टोल नाकों पर रुकने की जरूरत नहीं होगी। गाड़ी जैसे ही हाइवे पर प्रवेश करेगी और निकलेगी, तो सेटेलाइट के जरिए लोकेशन का पता चल जाएगा, क्योंकि गाड़ियों में एक ऑन-बोर्ड यूनिट (OBU) लगा होगा जो सेटेलाइट के साथ कम्युनिकेशन कर गाड़ी की लोकेशन का पता लगाएगा और उसी के हिसाब से टोल की राशि खुद ही कट जाएगी। जिससे फ्यूल की बचत होगी और लंबे जाम से भी छुटकारा मिल जाएगा।
सिर्फ इतना ही नहीं, इसमें भारतीय सेटेलाइट नेविगेशन सिस्टम GAGAN (GPS Aided GEO Augmented Navigation) भी शामिल है।
कैसे बढ़ेगा टोल कलेक्शन?
भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) देशभर में हाईवे पर टोल वसूली करती है। अभी तक NHAI को टोल से करीब 40,000 करोड़ रुपये की सालाना आमदनी होती है। लेकिन आने वाले समय में ये आंकड़ा काफी तेजी से बढ़ सकता है, जबकि जानकारों का मानना है कि इस नए सिस्टम के लागू होने के बाद अगले 2-3 सालों में टोल रेवेन्यू बढ़कर 1.40 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
नए टोल सिस्टम के साथ चुनौतियां
भारत की GNSS आधारित हाईवे टोल कलेक्शन सिस्टम भले ही आधुनिकीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम है, लेकिन रास्ते में कुछ चुनौतियां भी हैं जिन पर ध्यान देना जरूरी है।
पहली चुनौती है कलेक्शन: क्या होगा अगर किसी यूजर के डिजिटल वॉलेट में पर्याप्त पैसा न हो, या कोई गाड़ी नंबर प्लेट से छेड़छाड़ कर के टोल से बचने की कोशिश करे? इन परिस्थितियों में कलेक्शन सुनिश्चित करना मुश्किल है।
दूसरी चुनौती है भारी निवेश: पूरे देश में ANPR कैमरों का नेटवर्क बिछाने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश की जरूरत है ये कैमरे ही गाड़ियों की पहचान कर पाएंगे।
तीसरी चुनौती है भरोसे कायम रखना: डेटा सुरक्षा और यूजर की प्राइवेसी के बारे में चिंताओं को दूर करना जरूरी है। आखिरकार, GPS तकनीक गाड़ियों को ट्रैक करती है, जिससे डेटा उल्लंघन का खतरा रहता है।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
यह नया टोल कलेक्शन सिस्टम निवेशकों के लिए कई अवसर लेकर आ सकता है। इसे बनाने और लागू करने के लिए कई तरह की कंपनियों की जरूरत होगी। जैसे कि इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी, ANPR कैमरें बनाने वाली कंपनियां आदि। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने इस सिस्टम को विकसित करने के लिए ग्लोबल कंपनियों से भी बिड्स आमंत्रित की हैं।
भविष्य की बातें
भारत में टोल नाके पर लोगो को लंबी लाइनों से गुजरना पड़ता है और GPS आधारित टोल कलेक्शन इसी समस्या का समाधान है, लेकिन इतने विशाल देश में यह बदलाव इतना आसान नहीं होगा। वर्तमान समय में भारत दुनिया के सबसे बड़े सड़क नेटवर्क में से एक है।
साथ ही, इस बदलाव के बाद FASTag को अलविदा कहना होगा और हो सकता है कस्टमर्स के लिए ज्यादा टोल टैक्स देने की आवश्यकता पड़े।
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*यह आर्टिकल केवल जानकारी के उद्देश्य के लिए है। यह कोई निवेश सलाह नहीं है।
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