भारत का स्टील सेक्टर आने वाले दशकों में बड़े बदलाव की ओर बढ़ रहा है। इंफ्रास्ट्रक्चर, हाउसिंग और मैन्युफैक्चरिंग की बढ़ती जरूरतों के बीच सरकार देश की स्टील उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ आयात पर निर्भरता कम करने और पर्यावरण के अनुकूल उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए एक नई स्टील पॉलिसी लेकर आयी है।
आइए इस नई स्टील पॉलिसी को विस्तार से समझें और जानें कि इससे भारतीय स्टील इंडस्ट्री और निवेशकों के लिए कौन-से नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
क्या है मामला?
सरकार की प्रस्तावित नेशनल स्टील पॉलिसी-विजन 2047 का उद्देश्य भारत को एक मजबूत स्टील उत्पादक देश बनाना है। इसके तहत क्रूड स्टील उत्पादन क्षमता को 2047 तक 604 मिलियन टन (MT) पहुंचाने का लक्ष्य है, जो मौजूदा 220 मिलियन टन से लगभग 2.75 गुना अधिक है।
इससे पहले नेशनल स्टील पॉलिसी 2017 में वर्ष 2030-31 तक 300 मिलियन टन क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा गया था। हालांकि, नए ड्राफ्ट में 2030 तक 294 मिलियन टन क्षमता का अनुमान है।
ड्राफ्ट के अनुसार, 2047 तक फिनिश्ड स्टील की डिमांड 2025-26 के 164 मिलियन टन से बढ़कर 505 मिलियन टन हो सकती है। वहीं, प्रति व्यक्ति स्टील खपत 116 किलोग्राम से बढ़कर 302 किलोग्राम और निर्यात 45 मिलियन टन तक पहुंचने का अनुमान है।
सरकार ने 88% कैपेसिटी यूटिलाइजेशन के आधार पर 531 मिलियन टन क्रूड स्टील उत्पादन का अनुमान लगाया है। हालांकि, फिलहाल यह पॉलिसी सार्वजनिक सुझावों के लिए जारी ड्राफ्ट है।
रॉ मटेरियल की बढ़ती डिमांड और सप्लाई की चुनौती
स्टील उत्पादन बढ़ाने के लिए रॉ मटेरियल की उपलब्धता सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक होगी। स्टील बनाने की कुल लागत में रॉ मटेरियल की हिस्सेदारी लगभग 65-70% है।
भारत अपनी कोकिंग कोल जरूरतों का लगभग 92% आयात करता है, मुख्य रूप से ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और रूस से। नई पॉलिसी के अनुसार, कोकिंग कोल की सालाना डिमांड मौजूदा 72 मिलियन टन से बढ़कर 2047 तक 236 मिलियन टन हो सकती है।
देश में लगभग 39 मिलियन टन सालाना कोकिंग कोल वॉशिंग कैपेसिटी मौजूद है, लेकिन करीब 17 मिलियन टन फीड कोल से केवल 6 मिलियन टन उत्पादन होता है।
इसी तरह आयरन ओर की डिमांड 299 मिलियन टन से बढ़कर 772 मिलियन टन होने का अनुमान है। चिंता की बात यह है कि हाई-ग्रेड आयरन ओर का रिजर्व में हिस्सा FY19 के 70% से घटकर FY22 में 46% रह गया।
इस चुनौती से निपटने के लिए सरकार विदेशी खनन संपत्तियों में निवेश, कोल वॉशरीज के विस्तार और स्लरी पाइपलाइन प्रोजेक्ट्स को बढ़ावा देने की योजना बना रही है।
ग्रीन स्टील और कार्बन उत्सर्जन में कमी
नई पॉलिसी का दूसरा महत्वपूर्ण उद्देश्य स्टील उत्पादन को पर्यावरण के अनुकूल बनाना है। सरकार प्रति टन क्रूड स्टील पर कार्बन उत्सर्जन की तीव्रता को मौजूदा 2.54 टन से घटाकर 2047 तक 1.54 टन कार्बन डाइऑक्साइड करने का लक्ष्य रख रही है।
इसके लिए एनर्जी एफिशिएंसी, रिन्यूएबल एनर्जी, कोल गैसीफिकेशन, ग्रीन हाइड्रोजन और कार्बन कैप्चर जैसी तकनीकों को बढ़ावा दिया जाएगा। हालांकि, यहां एक महत्वपूर्ण चुनौती भी है। उत्पादन बढ़ने के कारण कुल सालाना कार्बन उत्सर्जन मौजूदा लगभग 432 मिलियन टन से बढ़कर 2047 तक करीब 818 मिलियन टन हो सकता है।
इसका मतलब है कि प्रति टन स्टील उत्सर्जन कम होने के बावजूद कुल प्रदूषण बढ़ सकता है। इसलिए ग्रीन टेक्नोलॉजी का प्रभावी इस्तेमाल इंडस्ट्री के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण होगा।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
नई स्टील पॉलिसी से डोमेस्टिक स्टील उत्पादकों के अलावा माइनिंग, ट्रांसपोर्टेशन और ग्रीन टेक्नोलॉजी से जुड़ी कंपनियों के लिए नए अवसर बन सकते हैं। पॉलिसी की घोषणा के बाद 12 अक्टूबर को निफ्टी मेटल इंडेक्स 1.05% बढ़कर 12,127.15 पर पहुंच गया। वहीं, SAIL, APL Apollo Tubes, Jindal Steel, Tata Steel, JSW Steel और अन्य मेटल शेयर्स में करीब 0.07% से 2.15% तक की तेजी दर्ज हुई।
सरकार का लक्ष्य फिनिश्ड स्टील ट्रांसपोर्टेशन में रेलवे की हिस्सेदारी 62% तक बढ़ाना और आयरन ओर ट्रांसपोर्टेशन में इसे 42% से बढ़ाकर 49% करना है। साथ ही, स्लरी पाइपलाइन कैपेसिटी 299 मिलियन टन सालाना से अधिक करने की योजना है।
इससे स्टील और लॉजिस्टिक्स सेक्टर में लंबी अवधि के अवसर बन सकते हैं। हालांकि, निवेशकों को कंपनियों की उत्पादन लागत, रॉ मटेरियल की उपलब्धता और कैपेसिटी एक्सपेंशन पर नजर रखनी चाहिए।
भविष्य की बातें
आने वाले वर्षों में भारत का स्टील सेक्टर डोमेस्टिक डिमांड, निर्यात और नई तकनीकों के आधार पर विस्तार कर सकता है। सरकार का फोकस स्टील उत्पादन बढ़ाने के साथ डोमेस्टिक कंपनियों को कम गुणवत्ता वाले आयात से बचाने पर भी है।
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत फिनिश्ड स्टील का नेट निर्यातक बना। इस दौरान आयात लगभग 32% घटकर 6.5 मिलियन टन रहा, जबकि निर्यात करीब 36% बढ़कर 6.6 मिलियन टन पहुंच गया। नई पॉलिसी में लगभग 2,550 सेकेंडरी स्टील उत्पादकों को भी समर्थन देने का प्रस्ताव है, जिनकी कुल उत्पादन क्षमता में हिस्सेदारी लगभग 47% है।
सरकार लगभग हर पांच साल में स्टील की डिमांड के अनुमानों की समीक्षा करेगी। ऐसे में इस पॉलिसी की सफलता उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ रॉ मटेरियल की सुरक्षा, लागत नियंत्रण और स्वच्छ तकनीकों को अपनाने पर निर्भर करेगी।
डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल एजुकेशनल और इंफॉर्मेशनल उद्देश्य के लिए है और यह इन्वेस्टमेंट एडवाइस या किसी भी सिक्योरिटीज को खरीदने या बेचने की रिकमेंडेशन नहीं है। यहाँ जिन कंपनियों का उल्लेख किया गया है, उन्हें मार्केट डेवलपमेंट्स के संदर्भ में केवल उदाहरण के रूप में बताया गया है। इन्वेस्टर्स को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी इन्वेस्टमेंट डिसीजन लेने से पहले अपनी खुद की रिसर्च करें और अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से परामर्श करें।
सिक्योरिटीज मार्केट में किए गए इन्वेस्टमेंट मार्केट जोखिम के अधीन होते हैं। इन्वेस्ट करने से पहले सभी संबंधित डॉक्यूमेंट्स को ध्यानपूर्वक से पढ़ें।