भारतीय स्टील इंडस्ट्री: 2030-31 तक 300 MT उत्पादन लक्ष्य

भारतीय स्टील इंडस्ट्री: 2030-31 तक 300 MT उत्पादन लक्ष्य
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भारत का स्टील सेक्टर न केवल देश की इंडस्ट्रियल प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, बल्कि ग्लोबल स्तर पर भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। यह सेक्टर नीतिगत समर्थन, बढ़ती डिमांड और तकनीकी प्रगति के साथ तेजी से विकसित हो रहा है। हालांकि, इसे कुछ चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है।

इस आर्टिकल में हम भारत के स्टील सेक्टर के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करेंगे, जिसमें स्टील सेक्टर की वर्तमान स्थिति, चुनौतियां, सरकार की पहल और भविष्य की संभावनाएं शामिल है।

स्टील सेक्टर की मौजूदा स्थिति

भारत स्टील उत्पादन में दुनिया में दूसरे स्थान पर है। IBEF के अनुसार, FY24 में, भारत का क्रूड स्टील उत्पादन 143.6 मिलियन टन (MT) और फिनिश्ड स्टील उत्पादन 138.5 MT रहा, जो FY23 के 125.32 MT और 121.29 MT की तुलना में उल्लेखनीय वृद्धि दर्शाता है। बीते 10-12 वर्षों में स्टील सेक्टर में भारी विस्तार हुआ है, जहां 2008 से अब तक उत्पादन 75% और घरेलू डिमांड 80% तक बढ़ी है।

हालांकि, चीन जैसे देशों से बढ़ती प्रतिस्पर्धा और आयात के बढ़ते स्तर ने भारत के स्टील सेक्टर के सामने चुनौतियां खड़ी की हैं। FY24 में भारत ने 8.32 MT स्टील का आयात किया, जो FY23 के 6.02 MT की तुलना में बढ़ोतरी को दर्शाता है।

भारतीय स्टील सेक्टर का विकास

भारत में स्टील उत्पादन क्षमता बीते वर्षों में तेज़ी से बढ़ी है, जो FY13 में 97 मिलियन टन (MT) से बढ़कर 4.84% की CAGR दर से FY24 (दिसंबर 2023 तक) में 171 MT तक पहुंच गई। राष्ट्रीय स्टील नीति 2017 के तहत, 2030-31 तक इस क्षमता को 300 MT तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है, जिसके लिए ₹10 लाख करोड़ (~US$ 156.08 बिलियन) का अतिरिक्त निवेश होगा।

भारतीय स्टील सेक्टर का विकास

इसके साथ ही, 2025-26 तक भारत में 40 MT प्रति वर्ष की नई स्टील मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स शुरू होंगी, जहां 65% उत्पादन BF-BOF प्रक्रिया से और 35% EAF एवं IF प्रक्रियाओं से होगा। साथ ही, स्टील कंपनियां बढ़ती प्राइस के चलते 29 MT की क्षमता विस्तार प्रोजेक्ट्स को फिर से शुरू करने की तैयारी में हैं। यह वृद्धि देश के इंफ्रास्ट्रक्चर और आर्थिक विकास को और तेज़ी से आगे बढ़ाने में मदद करेगी।

भारतीय स्टील सेक्टर में चुनौतियां

हालांकि भारत के स्टील सेक्टर में विकास की संभावनाएं अपार हैं, लेकिन इसे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है:

  1. क्रूड माल की उपलब्धता: स्टील उत्पादन के लिए उच्च गुणवत्ता वाले लौह अयस्क और कोकिंग कोल की आवश्यकता होती है। हालांकि, भारत लौह अयस्क के मामले में समृद्ध है, लेकिन कोकिंग कोल के लिए आयात पर निर्भरता इसकी उत्पादन लागत बढ़ा देती है।
  2. पर्यावरणीय प्रभाव: स्टील उत्पादन प्रक्रिया से कार्बन उत्सर्जन की समस्या गंभीर है। भारत ने 2050 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है, जिसके लिए ग्रीन स्टील उत्पादन को बढ़ावा देना आवश्यक है।
  3. ग्लोबल प्रतिस्पर्धा: भारतीय स्टील इंडस्ट्री के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक चीन से सस्ते स्टील का आयात है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा स्टील उत्पादक है और अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी से दोगुने से अधिक स्टील का निर्यात करता है।
  4. अमेरिकी टैरिफ का प्रभाव: भारतीय स्टील इंडस्ट्री ग्लोबल मार्केट में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हाल ही में, अमेरिका ने स्टील आयात पर 25% टैरिफ लगाया है, लेकिन स्टील सचिव संदीप पौंड्रिक के अनुसार, इसका भारत पर बड़ा प्रभाव नहीं होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि पिछले साल भारत ने 145 मिलियन टन स्टील का उत्पादन किया, जिसमें से केवल 95,000 टन स्टील ही अमेरिका को निर्यात किया गया। यह वॉल्यूम भारत के कुल उत्पादन का एक छोटा हिस्सा है।

सरकारी पहल

भारतीय स्टील सेक्टर में 100% FDI की अनुमति है, जिससे यह विदेशी निवेश के लिए एक आकर्षक सेक्टर बनता जा रहा है। साथ ही, सरकार ने लौह अयस्क के निर्यात शुल्क को 50% (एड वेलोरम) तक बढ़ा दिया है (पेलेट्स को छोड़कर), जिससे घरेलू स्टील उत्पादन को बढ़ावा मिल सके।

इसके अलावा, सरकार स्टील सेक्टर के लिए PLI योजना 2.0 में रिफ्रैक्टरीज़ को शामिल करने पर विचार कर रही है, जिससे 2030 तक 300 मिलियन टन उत्पादन क्षमता का लक्ष्य हासिल किया जा सके। नवंबर 2020 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 10 प्रमुख सेक्टर्स में PLI योजना को मंजूरी दी थी।

स्टील सेक्टर को प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए सरकार ने कई टैक्स सुधार किए हैं। लौह अयस्क पेलेट और बेनेफिसिएशन प्लांट्स की स्थापना या विस्तार के लिए आवश्यक उपकरणों पर कस्टम ड्यूटी 7.5% / 5% से घटाकर 2.5% कर दी गई है। वहीं, इम्पोर्टेड फ्लैट-रोल्ड स्टेनलेस स्टील प्रोडक्ट्स पर कस्टम ड्यूटी 7.5% से बढ़ाकर 15% कर दी गई है, ताकि डोमेस्टिक इंडस्ट्री को मजबूती मिले। इसके अलावा, स्टील ग्रेड डोलोमाइट और स्टील ग्रेड चूना पत्थर पर कस्टम ड्यूटी 5% से घटाकर 2.5% और विंड एनर्जी जनरेटर के बियरिंग्स में उपयोग होने वाले फोर्ज्ड स्टील रिंग्स पर कस्टम ड्यूटी 10% से घटाकर 5% कर दी गई है।

निवेशकों के लिए इसमें क्या है?

भारतीय स्टील इंडस्ट्री तेजी से विकास कर रही है, जो निवेशकों के लिए आकर्षक अवसर प्रस्तुत करता है, लेकिन इसमें कुछ चुनौतियां भी है जिन्हें ध्यान में रखना आवश्यक है। इसके साथ ही, हालांकि, निवेश से पहले कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन, मार्केट की स्थिति और व्यक्तिगत निवेश लक्ष्यों का सावधानीपूर्वक विश्लेषण करना आवश्यक है।

भारतीय स्टील इंडस्ट्री

भविष्य की दिशा और संभावनाएँ

भारतीय स्टील इंडस्ट्री एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है। एक ओर, इसमें विकास की अपार संभावनाएं हैं, जैसा कि उत्पादन में वृद्धि और सरकार के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों से स्पष्ट है। दूसरी ओर, इसे चीनी आयात और ग्लोबल मार्केट से प्रतिस्पर्धा जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। सरकार द्वारा उठाए गए स्टेप्स, विशेष रूप से PLI योजना, से डोमेस्टिक इंडस्ट्री को कुछ राहत मिलने की उम्मीद है।

IBEF के अनुसार, भारत का वार्षिक स्टील उत्पादन 2030-31 तक 300 मिलियन टन से अधिक होने की उम्मीद है। अनुमान के अनुसार, 85% क्षमता उपयोग के साथ क्रूड स्टील उत्पादन 255 मिलियन टन तक पहुंचेगा, जिससे 230 मिलियन टन फिनिश्ड स्टील तैयार होगा। क्रूड स्टील से तैयार स्टील में 90% रूपांतरण दर और 10% उत्पादन हानि मानी जा रही है। इस अवधि में, भारत का नेट निर्यात 24 मिलियन टन तक पहुंचने की संभावना है, जबकि घरेलू खपत 206 मिलियन टन तक हो सकती है। इस वृद्धि के साथ, प्रति व्यक्ति स्टील खपत बढ़कर 160 किलोग्राम होने का अनुमान है, जो इंफ्रास्ट्रक्चर और इंडस्ट्रियल विकास की दिशा में एक बड़ा इंडिकेटर है।

*आर्टिकल में शामिल कंपनियों के नाम केवल सूचना के उद्देश्य के लिए है। यह निवेश सलाह नहीं है।
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