भारत का फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री एक नए युग में प्रवेश कर रहा है, जिसमें कॉन्ट्रैक्ट डेवलपमेंट एंड मैन्युफैक्चरिंग आर्गेनाईजेशन (CDMO) सेक्टर इस बदलाव का केंद्र है। जैसे-जैसे जिओपॉलिटिकल तनाव बढ़ रहे हैं और ग्लोबल व्यापार नीतियाँ बदल रही हैं, खासकर अमेरिका और चीन के बीच, कई फार्मास्यूटिकल कंपनियाँ अपनी सप्लाई चेन को डाइवर्सिफाइड बनाने की कोशिश कर रही हैं। इस बदलते परिदृश्य में, भारत ड्रग डेवलपमेंट और मैन्युफैक्चरिंग सर्विसेज के लिए एक विश्वसनीय और प्रतिस्पर्धी स्थान के रूप में मजबूत ध्यान आकर्षित कर रहा है। देश सिर्फ अंतर को भरने की कोशिश नहीं कर रहा है, बल्कि खुद को फार्मा आउटसोर्सिंग में ग्लोबल लीडर के रूप में स्थापित कर रहा है।
भारत का CDMO सेक्टर पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। आइए विस्तार से समझते हैं कि यह बदलाव कैसे हो रहा है और क्यों भारत जल्द ही दुनिया का पसंदीदा फार्मास्यूटिकल मैन्युफैक्चरिंग हब बन सकता है।
भारत के CDMO सेक्टर की वर्तमान स्थिति
भारत का CDMO सेक्टर ग्लोबल स्तर पर तेजी से ध्यान खींच रहा है, खासकर जब अमेरिका जैसे देश चीन से दूर हो रहे हैं। जेनेरिक दवाओं, APIs (एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रेडिएंट्स) और बायोलॉजिक्स में मजबूत आधार के साथ, भारत फार्मास्यूटिकल आउटसोर्सिंग के लिए एक पसंदीदा डेस्टिनेशन बन रहा है।
2024 तक, भारत का CDMO मार्केट 18,800 करोड़ रुपये का है और इसके 14.7% CAGR की दर से बढ़कर 2029 तक 37,200 करोड़ रुपये तक पहुँचने की उम्मीद है। यह ग्लोबल CDMO मार्केट की वार्षिक वृद्धि दर (6-7%) से दोगुना से अधिक है।
भारत की ताकत इसके पैमाने और विश्वसनीयता में है। यहाँ 2,000 से अधिक USFDA-अप्रूव्ड मैन्युफैक्चरिंग प्लांट्स हैं, जो ग्लोबल फार्मा कंपनियों का भरोसा जीतने में एक अहम फैक्टर है। देश की बढ़ती बायोटेक क्षमताएँ भी हाई-एंड ड्रग डेवलपमेंट की बढ़ती डिमांड से मेल खाती हैं।
इसके अलावा, 2024 में कुछ भारतीय CDMOs को रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (RFP) में 50% सालाना वृद्धि देखी गई है, क्योंकि ग्लोबल कंपनियाँ चीन पर निर्भरता कम करना चाहती हैं।
CDMO को समझें
अगर आप अभी भी CDMO को लेकर थोड़ा कन्फ्यूज्ड हैं, तो चिंता न करें — यह सेक्शन आपकी समझ को स्पष्ट कर देगा।
मान लीजिए कि एक दवा कंपनी एक नई दवा बनाना चाहती है, लेकिन उसके पास फैक्ट्री या मशीनरी जैसे संसाधन नहीं हैं। तो वह एक दूसरी कंपनी को हायर करती है जो उनके लिए दवा बनाती है — और यही CDMO है।
CDMOs सही सामग्री को मिलाकर दवा बनाते हैं, लैब में जाँच करके इसकी सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं, फैक्ट्रियों में बड़ी मात्रा में उत्पादन करते हैं, और पैकिंग व डिलीवरी का काम करते हैं। इस तरह, CDMOs पर्दे के पीछे के खिलाड़ी हैं जो यह सुनिश्चित करते हैं कि दवाएँ सही, सुरक्षित और तेजी से बनें।
भारत एक ग्लोबल CDMO हब के रूप में उभर रहा है
भारत ग्लोबल फार्मास्यूटिकल कंपनियों के लिए एक प्रमुख विकल्प बनता जा रहा है। यहाँ इस ग्रोथ के प्रमुख कारण हैं:
कॉस्ट एडवांटेज: भारत चीन की तुलना में लगभग 20% कम लागत पर फार्मा सर्विसेज प्रदान करता है, जिससे यह ड्रग डेवलपमेंट और मैन्युफैक्चरिंग के लिए एक किफायती विकल्प बन जाता है।
मजबूत नियामक रिकॉर्ड: 2,000 से अधिक USFDA-अप्रूव्ड प्लांट्स के साथ, भारत के पास अमेरिका के बाहर सबसे अधिक ऐसी सुविधाएँ हैं, जो ग्लोबल मानकों के अनुपालन को दर्शाता है।
सरकारी समर्थन: प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) और नेशनल पॉलिसी ऑन फार्मास्युटिकल्स जैसे प्रोजेक्ट्स डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग को प्रोत्साहित कर रही हैं।
डाइवर्सिफाइड फार्मा इंडस्ट्री: भारत में जेनेरिक्स, बायोटेक और बायोसिमिलर्स में मजबूत उपस्थिति है, जो चीन के फार्मा बेस की तुलना में अधिक डाइवर्सिफाइड है।
ग्लोबल बदलाव: चल रहे व्यापार तनाव के कारण, कई कंपनियाँ अब मैन्युफैक्चरिंग के लिए भारत की ओर देख रही हैं।
भारत के CDMO सेक्टर में चुनौतियाँ
हालाँकि भारत का CDMO सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन कुछ प्रमुख चुनौतियों पर ध्यान देने की आवश्यकता है:
उच्च इंफ्रास्ट्रक्चर लागत: एडवांस्ड ड्रग मैन्युफैक्चरिंग के लिए महंगे उपकरण और क्लीन रूम सुविधाओं की आवश्यकता होती है। इन्हें ग्लोबल गुणवत्ता मानकों पर चलाना और बनाए रखना महंगा है।
कठोर नियामक एनवायरनमेंट: बायोलॉजिक्स, सेल और जीन थेरेपीज़ के लिए मंजूरी में सख्त और जटिल ग्लोबल नियम शामिल हैं। भारतीय कंपनियों को अक्सर लंबी और विस्तृत मंजूरी प्रक्रियाओं से जूझना पड़ता है।
कुशल कर्मचारियों की कमी: बायोलॉजिक्स और एडवांस्ड थेरेपीज़ के उत्पादन के लिए अत्यधिक प्रशिक्षित प्रोफेशनल्स की आवश्यकता होती है, लेकिन भारत में बढ़ती डिमांड को पूरा करने के लिए पर्याप्त विशेषज्ञ नहीं हैं।
अधिक R&D सुविधाओं की आवश्यकता: ग्लोबल स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए, भारत को रिसर्च में अधिक निवेश करना होगा और जटिल दवाओं को संभालने की क्षमता का विस्तार करना होगा।
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भविष्य की बातें
भारत का CDMO सेक्टर आने वाले वर्षों में मजबूत विकास के लिए तैयार है। बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (BCG) की रिपोर्ट के अनुसार, यह मार्केट 2028 तक दोगुना हो सकता है, जो ग्लोबल हिस्सेदारी का 4-5% कब्जा करेगा। जैसे-जैसे अधिक ग्लोबल फार्मास्यूटिकल कंपनियाँ लागत-प्रभावी और विश्वसनीय मैन्युफैक्चरिंग पार्टनर्स की तलाश कर रही हैं, भारत एक शीर्ष विकल्प के रूप में उभर रहा है।
जैसा कि मनीकंट्रोल में उल्लेख किया गया है, विकास खेमानी (Carnelian Asset Advisors के संस्थापक) का कहना है कि भारत का कॉन्ट्रैक्ट ड्रग मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर 1990 के दशक के मध्य में IT सर्विस इंडस्ट्री जैसे मोड़ पर था। उन्होंने कहा कि कोविड के बाद ग्लोबल सप्लाई चेन में बदलाव और आउटसोर्सिंग के नए तरीकों ने भारतीय फार्मा कंपनियों के लिए ग्लोबल स्तर पर बढ़ने और नेतृत्व करने का 10 से 15 साल का अवसर पैदा किया है।
*आर्टिकल में शामिल कंपनियों के नाम केवल सूचना के उद्देश्य के लिए है। यह निवेश सलाह नहीं है।
*डिस्क्लेमर: तेजी मंदी डिस्क्लेमर