भारत में पर्सनल कंप्यूटिंग डिवाइसेज का मार्केट पिछले कुछ वर्षों में तेजी से विकसित हो रहा है। शिक्षा, कामकाज और मनोरंजन के लिए लैपटॉप और डेस्कटॉप की डिमांड लगातार बढ़ रही है। लेकिन अब एक नई चुनौती सामने आ रही है। कंपोनेंट प्राइस में तेज उछाल के कारण 2026 में लैपटॉप और डेस्कटॉप की प्राइस 35% तक बढ़ सकती हैं। यह बदलाव उपभोक्ताओं की पहुंच और सेक्टर दोनों को प्रभावित कर सकता है।
आइए विस्तार से समझें और जानें कि इससे उपभोक्ता और मार्केट पर क्या असर पड़ सकता है।
क्या है मामला?
2026 में लैपटॉप और डेस्कटॉप की प्राइस 35% तक बढ़ने की आशंका है। मुख्य कारण क्रिटिकल कंपोनेंट्स जैसे प्रोसेसर, ग्राफिक्स यूनिट और मेमोरी की बढ़ती लागत है। मनी कंट्रोल की रिपोर्ट के अनुसार, DDR RAM की प्राइस पहले ही 2.5 से 3 गुना बढ़ चुकी हैं, जिससे अभी तक प्राइस में 10-12% की वृद्धि हो चुकी है। मार्च में और 8-10% बढ़ोतरी की उम्मीद है, जबकि अगले कुछ महीनों में 10% और इजाफा हो सकता है।
जिन डिवाइसेज की प्राइस पहले 30,000 से 35,000 रुपये के बीच थी, वे अब 45,000 रुपये के करीब पहुंच रही हैं। प्राइस अगले 6 से 7 तिमाही तक बढ़ती रह सकती हैं और 2027 के दूसरे हिस्से तक ही राहत मिलने की संभावना है।
2025 में भारतीय PC मार्केट ने रिकॉर्ड प्रदर्शन किया। IDC के अनुसार, डेस्कटॉप, नोटबुक और वर्कस्टेशन सहित कुल 15.9 मिलियन यूनिट्स की शिपमेंट हुई, जो पिछले वर्ष से 10.2% ज्यादा है। यह पहली बार है जब सालाना शिपमेंट 15 मिलियन के पार गई। दिसंबर तिमाही में 4.1 मिलियन यूनिट्स की शिपमेंट हुई, जो 18.5% की सालाना वृद्धि दर्शाती है।
कंपोनेंट प्राइस में उछाल के पीछे वजह
DDR RAM और अन्य मेमोरी कंपोनेंट्स पर सबसे ज्यादा दबाव है। AI इंफ्रास्ट्रक्चर की डिमांड के कारण DRAM और NAND की प्राइस तेजी से बढ़ी हैं। सप्लाई हाई-मार्जिन सर्वर और हाई-बैंडविथ मेमोरी सेगमेंट की ओर खिंच रही है, जिससे PC मैन्युफैक्चरर्स की बिल-ऑफ-मटेरियल कॉस्ट बढ़ गई है।
एंट्री-लेवल इंटेल प्रोसेसर की कमी भी बड़ी समस्या है। इससे उत्पादन पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है। GPU और अन्य कंपोनेंट्स की लागत भी बढ़ रही है। इसके अलावा, डॉलर की अस्थिरता, इन्फ्लेशन और पश्चिम एशिया संघर्ष का असर भी दिख रहा है।
एक और संभावित जोखिम स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में व्यवधान है। यह एनर्जी और पेट्रोकेमिकल सप्लाई का महत्वपूर्ण रूट है। अगर यहां कोई समस्या हुई तो सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग की इनपुट कॉस्ट बढ़ सकती है, हालांकि असर अप्रत्यक्ष और विलंबित होगा। ब्लैक मार्केट और ग्रे मार्केट भी असेंबल्ड कंप्यूटर की प्राइस को प्रभावित कर रहे हैं।
भारतीय PC मार्केट पर संभावित असर
2025 का वर्ष भारतीय PC मार्केट के लिए शानदार रहा, लेकिन 2026 में स्थिति बदल सकती है। मनी कंट्रोल के अनुसार, IDC और काउंटरपॉइंट का अनुमान है कि PC वॉल्यूम में 8% तक की गिरावट आ सकती है। दोनों कंज्यूमर और कमर्शियल सेगमेंट में हाई सिंगल-डिजिट यानी 7-8% की सालाना गिरावट संभव है।
उच्च प्राइस उपभोक्ता डिमांड को प्रभावित करेंगी। एंट्री-लेवल खरीदार खरीदारी टाल सकते हैं या कम स्पेक्स वाले मॉडल चुन सकते हैं। छात्र, होम यूजर्स और फर्स्ट-टाइम बायर्स पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा। बड़े एंटरप्राइजेस ने 2025 में ही कई अपग्रेड पूरे कर लिए थे, जबकि SMBs अब जल्दी खरीदारी कर रहे हैं।
प्रिमियम और प्रोफेशनल सेगमेंट जैसे गेमिंग, क्रिएटर्स और एंटरप्राइज यूजर्स प्राइस के प्रति कम संवेदनशील हैं। ये सेगमेंट डिमांड बनाए रखेंगे। ब्रांड्स अब प्रोडक्ट कॉन्फिगरेशन बदल रहे हैं, प्रमोशनल कैंपेन चला रहे हैं और फाइनेंसिंग स्कीम्स दे रहे हैं ताकि डिमांड बनी रहे।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
यह स्थिति PC सेक्टर में निवेश करने वालों के लिए मिश्रित संकेत देती है। 2025 में 15.9 मिलियन यूनिट्स की रिकॉर्ड शिपमेंट के बाद 2026 में 8% की गिरावट से वॉल्यूम-आधारित कंपनियों पर दबाव पड़ सकता है। लेकिन प्रिमियम सेगमेंट की मजबूती और एंटरप्राइज अपग्रेड साइकल से कुछ ब्रांड्स को फायदा हो सकता है।
HP, लेनोवो, डेल, एसर और आसुस जैसे प्रमुख वेंडर्स 2025 में सभी ने ग्रोथ दर्ज की थी। अब वे प्रमोशन और फाइनेंसिंग से डिमांड संभाल रहे हैं। SMBs और मिड-मार्केट कंपनियां पहले से ज्यादा जल्दी खरीदारी कर रही हैं, जो इन्वेंट्री मैनेजमेंट अच्छा रखने वाली कंपनियों के लिए सकारात्मक है।
कुल मिलाकर, शॉर्ट टर्म में मार्जिन पर दबाव रहेगा, लेकिन जो ब्रांड्स प्राइस बढ़ोतरी को स्मार्ट तरीके से हैंडल करेंगे और प्रिमियम सेगमेंट पर फोकस रखेंगे, वे लंबे समय में मजबूत रह सकते हैं।
भविष्य की बातें
मनी कंट्रोल के अनुसार, अगले 6 से 7 तिमाही तक प्राइस बढ़ती रहेंगी और 2027 के दूसरे हिस्से में ही स्थिरता आने की उम्मीद है। तब तक AI डिमांड से मेमोरी सप्लाई पर दबाव बना रहेगा। अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसी जिओपॉलिटिकल घटनाएं हुईं तो असर और बढ़ सकता है।
मार्केट में गिरावट के बावजूद प्रिमियम सेगमेंट डिमांड बनाए रखेगा। ब्रांड्स को नए कॉन्फिगरेशन और फाइनेंसिंग पर ध्यान देना होगा। उपभोक्ताओं के लिए अभी खरीदारी का अच्छा समय है, क्योंकि आगे और बढ़ोतरी संभव है।
कुल मिलाकर, 2026 चुनौतीपूर्ण रहेगा, लेकिन 2027 से रिकवरी की संभावना है। निवेशकों को लंबी अवधि में सोचना चाहिए और ब्रांड्स की इन्वेंट्री और प्राइसिंग स्ट्रैटजी पर नजर रखनी चाहिए।
डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल एजुकेशनल और इंफॉर्मेशनल उद्देश्य के लिए है और यह इन्वेस्टमेंट एडवाइस या किसी भी सिक्योरिटीज को खरीदने या बेचने की रिकमेंडेशन नहीं है। यहाँ जिन कंपनियों का उल्लेख किया गया है, उन्हें मार्केट डेवलपमेंट्स के संदर्भ में केवल उदाहरण के रूप में बताया गया है। इन्वेस्टर्स को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी इन्वेस्टमेंट डिसीजन लेने से पहले अपनी खुद की रिसर्च करें और अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से परामर्श करें।
सिक्योरिटीज मार्केट में किए गए इन्वेस्टमेंट मार्केट जोखिम के अधीन होते हैं। इन्वेस्ट करने से पहले सभी संबंधित डॉक्यूमेंट्स को ध्यानपूर्वक से पढ़ें।