भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने हाल ही में स्वैप नीलामी की घोषणा की है। इसका मुख्य उद्देश्य बैंकिंग सिस्टम में रुपये की लिक्विडिटी बढ़ाना और फॉरेन करेंसी रिज़र्व को मजबूत करना है। क्योंकि भारतीय बैंकिंग सेक्टर इस समय कैश के संकट का सामना कर रहा है, और यह स्वैप वित्तीय स्थिरता लाने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
आइए समझते है कि RBI के कदम का क्या उद्देश्य है और भारतीय बैंकिंग सेक्टर पर इसका क्या प्रभाव हो सकता है।
क्या है मामला?
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 21 फरवरी 2025 को जारी एक स्टेटमेंट में कहा 28 फरवरी 2025 को $10 बिलियन के तीन-वर्षीय डॉलर/रुपया स्वैप नीलामी का आयोजन करने की घोषणा की है। इस नीलामी का पहला सेटलमेंट 4 मार्च को होगा, जिससे बैंकिंग सिस्टम में 870 अरब रुपये ($10 बिलियन) की लिक्विडिटी प्रवाहित होगी।
इस स्वैप के तहत RBI बैंक्स से डॉलर खरीदेगा और उनके बदले में रुपये देगा। साथ ही, RBI भविष्य में एक निर्धारित तारीख पर डॉलर को वापस बेचने का वादा करेगा।
हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब RBI ने इस तरह का स्वैप किया है। इससे पहले भी 31 जनवरी को छह महीने की अवधि के लिए $5.1 बिलियन का स्वैप किया गया था, लेकिन इसके बावजूद कैश संकट बना रहा। वर्तमान में, 20 फरवरी तक भारतीय बैंकिंग सिस्टम में लगभग 1.7 ट्रिलियन रुपये का लिक्विडिटी डेफिसिट है।
फॉरेक्स स्वैप क्या होता है?
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा किया जाने वाला फॉरेक्स स्वैप एक सरल बाय-सेल डील है, जिसमें बैंक RBI को डॉलर बेचते हैं और बदले में रुपये प्राप्त करते हैं। साथ ही, एक तय अवधि के बाद, बैंक उसी डॉलर को वापस खरीदने के लिए प्रतिबद्ध होते हैं।
इस प्रक्रिया में पहले चरण में, बैंक RBI को डॉलर बेचते हैं, और इसके बदले में RBI तय FBIL रेफरेंस रेट पर रुपये ट्रांसफर करता है। इस लेन-देन का सेटलमेंट स्पॉट बेसिस पर किया जाता है, जिससे रुपये की लिक्विडिटी तुरंत बढ़ती है। यह प्रणाली बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी बनाए रखने और रुपये की स्थिरता सुनिश्चित करने में मदद करती है।
RBI इस कदम को क्यों उठा रहा है?
RBI के इस निर्णय के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण हैं। भारतीय बैंकिंग सिस्टम इस समय नकदी संकट से गुजर रही है, क्योंकि जनवरी 2025 में भारतीय बैंकिंग सिस्टम को पिछले 15 वर्षों की सबसे गंभीर कैश संकट का सामना करना पड़ा। 23 जनवरी को लिक्विडिटी डेफिसिट ₹3.15 लाख करोड़ के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया, जो 15 सालों में सबसे निचला स्तर था। जिस वजह से बैंक्स के लिए उधारी की लागत बढ़ रही है और इस स्थिति को सुधारने के लिए RBI ने इस स्वैप का निर्णय लिया है।
इसके साथ ही, डिपॉजिटरी डेटा के अनुसार, फरवरी 2025 में अब 21 फरवरी तक FPIs ने भारतीय शेयर बाजार से ₹23,710 करोड़ की निकासी की है जबकि, 2025 में अब तक कुल FPI ऑउटफ्लो ₹1,01,737 करोड़ तक पहुंच चुका है जिससे रुपये पर दबाव बढ़ रहा है।
इस स्थिति को नियंत्रित करने के लिए RBI यह सुनिश्चित करना चाहता है कि मार्केट में पर्याप्त लिक्विडिटी बनी रहे और रुपया अत्यधिक अस्थिरता का शिकार न हो।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
RBI का यह कदम निवेशकों के लिए भी सकारात्मक संकेत हो सकता है। यह तीन-वर्षीय स्वैप छह महीने की तुलना में अधिक आश्वस्तकारी है, क्योंकि यह लंबे समय तक कैश की उपलब्धता सुनिश्चित करेगा। इससे मार्केट में स्थिरता बनी रहेगी और निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा।
अगर RBI की रणनीति सफल होती है, तो रुपये की अत्यधिक गिरावट की संभावना कम हो जाएगी। इससे विदेशी निवेशकों को भारतीय मार्केट में निवेश करने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा, जिससे भारतीय मार्केट अधिक आकर्षक बन सकता है।
भविष्य की बातें
रॉयटर्स के अनुसार, मार्केट एक्सपर्ट्स का कहना है कि RBI को मार्च के अंत तक बैंकिंग सिस्टम में कम से कम 1 ट्रिलियन रुपये और डालने की आवश्यकता होगी। यह कदम कैश की कमी को दूर करने और बैंकिंग सिस्टम को स्थिर रखने के लिए महत्वपूर्ण है।
निवेशकों का मानना है कि तीन साल की अवधि के लिए लिक्विडिटी इंफ्यूजन छह महीने की तुलना में ज्यादा भरोसेमंद है और दो महीने तक के रेपो इंफ्यूजन से कहीं बेहतर है। यह लॉन्गटर्म समाधान बैंक्स को कैश की कमी से निपटने में मदद करेगा और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देगा।
*यह आर्टिकल केवल जानकारी के उद्देश्य के लिए है। यह कोई निवेश सलाह नहीं है।
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