भारत अपनी एनर्जी सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। क्रूड ऑइल और प्राकृतिक गैस की बढ़ती डिमांड के बीच आयात पर निर्भरता को कम करने की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक स्पष्ट हो गई है। समुद्र मंथन – नेशनल ऑफशोर एक्सप्लोरेशन स्कीम इसी चुनौती का जवाब है। यह योजना भारत के विशाल ऑफशोर हाइड्रोकार्बन संसाधनों को अनलॉक करने और डोमेस्टिक उत्पादन बढ़ाने की दिशा में मिशन मोड में काम करने का प्रयास है।
आइए विस्तार से समझें कि यह योजना कैसे भारत की एनर्जी सिक्योरिटी को नया आकार दे सकती है।
क्या है मामला?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा क्रूड ऑइल का उपभोक्ता है। इसका वार्षिक आयात बिल लगभग 144 बिलियन अमेरिकी डॉलर यानि करीब 13 लाख करोड़ रुपये है। मौजूदा ऑइल और गैस फील्ड्स में हर साल 6 से 7% की नैचुरल डिक्लाइन होती है। ऐसे में नई खोजें जरूरी हो जाती हैं। भारत के पूर्वी और पश्चिमी ऑफशोर बेसिन में 3,000 मीटर तक की गहराई वाले सेक्टर्स में 5,600 मिलियन मीट्रिक टन ऑइल इक्विवेलेंट (MMTOE) से अधिक हाइड्रोकार्बन क्षमता का अनुमान है। कावेरी, महानदी और अंडमान बेसिन में हालिया खोजों ने इस संभावना को और मजबूत किया है।
समुद्र मंथन योजना को 31 जुलाई 2026 को मंजूरी मिली। यह सेंट्रल सेक्टर स्कीम है, जिसका फेज-1 आउटले 84,084 करोड़ रुपये है और इसे वित्त वर्ष 2030-31 तक लागू किया जाएगा। एक्सप्लोरेशन ब्लॉक के अवॉर्ड से कमर्शियल प्रोडक्शन तक आमतौर पर 5 से 10 साल लगते हैं। एक डीपवाटर एक्सप्लोरेटरी वेल की लागत लगभग 125 से 150 मिलियन अमेरिकी डॉलर होती है। उच्च जोखिम और लंबी अवधि के कारण प्राइवेट निवेश आकर्षित करना चुनौतीपूर्ण रहा है। योजना रिस्क-शेयरिंग अप्रोच अपनाकर इस बाधा को दूर करने का प्रयास करती है।
समुद्र मंथन के प्रमुख कंपोनेंट्स
योजना चार मुख्य कंपोनेंट्स पर आधारित है।
- पहला कंपोनेंट सीस्मिक डेटा एक्विजिशन, प्रोसेसिंग और इंटरप्रिटेशन है, जिसके लिए 28,534 करोड़ रुपये आवंटित हैं। इसमें बेसिन-वाइड कवरेज के लिए 2D सीस्मिक सर्वे पर 12,000 करोड़, 3D और अन्य तकनीकों पर 12,534 करोड़ तथा नेशनल डेटा रिपॉजिटरी के पुराने डेटा को AI टूल्स से री-प्रोसेस करने पर 4,000 करोड़ शामिल हैं।
- दूसरा प्रमुख कंपोनेंट ऑफशोर एक्सप्लोरेशन एक्सेलेरेशन है। 60 डीपवाटर और अल्ट्रा-डीपवाटर वेल्स की ड्रिलिंग के लिए 43,200 करोड़ रुपये रखे गए हैं। सरकार पात्र ड्रिलिंग लागत का 50% या प्रति वेल 675 करोड़ रुपये (जो भी कम हो) तक वित्तीय सहायता देगी। यह सहायता पब्लिक और प्राइवेट दोनों E&P ऑपरेटर्स के लिए उपलब्ध है।
- तीसरा कंपोनेंट कॉमन ऑफशोर इंफ्रास्ट्रक्चर है, जिसके लिए 10,000 करोड़ रुपये आवंटित हैं। महानदी और कच्छ जैसे बेसिन में कई खोजें इंफ्रास्ट्रक्चर की उच्च लागत के कारण उत्पादित नहीं हो पातीं। साझा उत्पादन और निकासी सुविधाएं इन खोजों को व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य बना सकती हैं।
- चौथा कंपोनेंट ऑयल एंड गैस मैन्युफैक्चरिंगएंड सर्विसेज जोन है, जिसमें 2,000 करोड़ रुपये लगाए जाएंगे। यह डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग, मरम्मत, वेयरहाउसिंग और सेवाओं की क्षमता बढ़ाएगा। निगरानी, डिजिटल हस्तक्षेप और जागरूकता गतिविधियों के लिए 350 करोड़ रुपये अलग से रखे गए हैं।
योजना से अपेक्षित लाभ
खोज की सफलता पर निर्भर करते हुए योजना 600 MMTOE से अधिक हाइड्रोकार्बन रिजर्व जोड़ने का लक्ष्य रखती है। इससे देश का रिसोर्स बेस 1.6 बिलियन TOE से बढ़कर 2.2 बिलियन TOE हो सकता है। डोमेस्टिक वार्षिक उत्पादन लगभग 62 MMTOE से बढ़ाकर 80 MMTOE करने का लक्ष्य है। अतिरिक्त उत्पादन 10 से 15 MMTOE और पीक क्षमता 20 MMTOE तक पहुंच सकती है। इससे क्रूड ऑइल के आयात में लगभग 1 लाख करोड़ रुपये प्रति वर्ष की बचत होने की संभावना है।
योजना वैल्यू चेन में निवेश को बढ़ावा देगी, रोजगार सृजन करेगी और मेक इन इंडिया तथा आत्मनिर्भर भारत के अंतर्गत डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत करेगी। ऑफशोर टेक्नोलॉजीज के लिए एक ग्लोबल प्रतिस्पर्धी इकोसिस्टम बनाने में भी मदद मिलेगी।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
शेयर बाजार के निवेशकों के लिए यह पहल ऑयल एंड गैस सेक्टर की कंपनियों पर नजर रखने का संकेत देती है। यदि एक्सप्लोरेशन गतिविधियां बढ़ती हैं और नए ब्लॉक्स में सफल खोज होती है, तो इससे इस सेक्टर की कंपनियों के लिए लंबी अवधि में नए बिजनेस अवसर पैदा हो सकते हैं।
सरकार के अनुसार, ओपन एकरेज लाइसेंसिंग प्रोग्राम (OALP) के तहत 172 ब्लॉक्स में करीब 3.8 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र आवंटित किया जा चुका है, जहां 4.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक की कमिटेड इन्वेस्टमेंट है। इसके अलावा, 99% से अधिक पुराने ‘नो-गो’ सेक्टर्स को भी खोल दिया गया है। इससे आने वाले वर्षों में एक्सप्लोरेशन और संबंधित इंफ्रास्ट्रक्चर गतिविधियों में तेजी देखने को मिल सकती है, जिस पर निवेशकों की नजर रहेगी।
भविष्य की बातें
25 जुलाई 2026 को सरकार ने महानदी ऑफशोर बेसिन में MN-DWN18-1-HD एप्रेज़ल वेल की ड्रिलिंग शुरू कर एक महत्वपूर्ण पड़ाव हासिल किया। यह प्रस्तावित चार डीपवॉटर वेल्स में पहला है, जिसके जरिए हाइड्रोकार्बन खोजों की कमर्शियल व्यवहार्यता का आकलन किया जाएगा।
सरकार का मानना है कि समुद्र मंथन मिशन साइंटिफिक डेटा, टेक्नोलॉजिकल इनोवेशन, शेयर्ड इंफ्रास्ट्रक्चर और इंडिजिनस मैन्युफैक्चरिंग के जरिए भारत की एनर्जी सिक्योरिटी मजबूत करेगा। अतिरिक्त उत्पादन से हर साल करीब ₹1 लाख करोड़ के क्रूड ऑयल आयात को कम करने की क्षमता विकसित हो सकती है, जिससे इम्पोर्ट डिपेंडेंस घटेगी और दीर्घकालिक आर्थिक विकास को समर्थन मिलेगा।
डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल एजुकेशनल और इंफॉर्मेशनल उद्देश्य के लिए है और यह इन्वेस्टमेंट एडवाइस या किसी भी सिक्योरिटीज को खरीदने या बेचने की रिकमेंडेशन नहीं है। यहाँ जिन कंपनियों का उल्लेख किया गया है, उन्हें मार्केट डेवलपमेंट्स के संदर्भ में केवल उदाहरण के रूप में बताया गया है। इन्वेस्टर्स को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी इन्वेस्टमेंट डिसीजन लेने से पहले अपनी खुद की रिसर्च करें और अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से परामर्श करें।
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