भारतीय शेयर मार्केट में ट्रेडिंग और शेयर्स की क्लोजिंग प्राइस तय करने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण बदलाव होने जा रहे हैं। मार्केट रेगुलेटर SEBI लगातार ऐसे कदम उठा रहा है, जिनसे मार्केट में पारदर्शिता बढ़े, प्राइस का निर्धारण बेहतर हो और निवेशकों को अधिक भरोसेमंद ट्रेडिंग व्यवस्था मिल सके।
इसी दिशा में SEBI ने क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) के नियमों में बदलाव किया है। नए फ्रेमवर्क में ट्रेडिंग टाइमिंग, ऑर्डर के प्रकार और डेरिवेटिव्स की सेटलमेंट प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण बदलाव शामिल हैं। इसका असर कैश मार्केट के साथ फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) सेगमेंट पर भी पड़ेगा।
आइए SEBI के नए क्लोजिंग ऑक्शन नियमों को विस्तार से समझें और जानें कि इन बदलावों से ट्रेडर्स, निवेशकों और भारतीय शेयर मार्केट पर क्या असर पड़ सकता है।
क्या है मामला?
SEBI ने 15 अक्टूबर 2026 को क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) का संशोधित फ्रेमवर्क जारी किया है। इसके तहत शेयर मार्केट में क्लोजिंग प्राइस तय करने की प्रक्रिया, ऑर्डर प्लेसमेंट और डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग के समय में बदलाव किए गए हैं। नए नियम 7 दिसंबर 2026 से लागू होंगे, जबकि कुछ पेंडिंग ऑर्डर्स से जुड़े प्रावधान 8 फरवरी 2027 से प्रभावी होंगे।
CAS एक विशेष ट्रेडिंग प्रक्रिया है, जिसके जरिए शेयर्स की दिन की अंतिम प्राइस निर्धारित की जाती है। इसका उद्देश्य दिन के अंत में होने वाले बड़े डील्स के बीच प्राइस का बेहतर और पारदर्शी निर्धारण सुनिश्चित करना है। इससे पहले 3 अगस्त को फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस से जुड़े शेयर्स के लिए CAS लागू किया गया था। हालांकि, सीमित भागीदारी और एक्सपायरी के दौरान प्राइस में अचानक उतार-चढ़ाव जैसी चिंताओं के बाद इसकी समीक्षा की गई। नए नियम जारी करने से पहले SEBI को कंसल्टेशन प्रक्रिया में 20,000 से अधिक सुझाव मिले थे।
क्लोजिंग ऑक्शन की नई टाइमिंग और ऑर्डर नियम
नए फ्रेमवर्क के तहत CAS अब दोपहर 3:30 बजे से 3:40 बजे तक चलेगा। इसमें शुरुआती 3:30 से 3:31 बजे तक रेफरेंस प्राइस कैलकुलेशन और ट्रांजिशन की प्रक्रिया होगी। इसके बाद 3:31 से 3:36 बजे तक निवेशक लिमिट और मार्केट ऑर्डर दोनों लगा सकेंगे। हालांकि, 3:36 बजे के बाद केवल लिमिट ऑर्डर की अनुमति होगी। ऑर्डर एंट्री 3:38 से 3:40 बजे के बीच किसी भी समय रैंडम तरीके से बंद होगी।
SEBI ने CAS में नए स्टॉप-लॉस और आइसबर्ग ऑर्डर्स लगाने की अनुमति नहीं दी है। हालांकि, कंटीन्यूअस ट्रेडिंग सेशन के पात्र पेंडिंग लिमिट ऑर्डर्स CAS में आगे बढ़ सकेंगे। इसी तरह पेंडिंग आइसबर्ग ऑर्डर्स पूरी क्वांटिटी दिखाने वाले लिमिट ऑर्डर्स में बदल जाएंगे, जब तक निवेशक इन्हें आगे न बढ़ाने का विकल्प नहीं चुनता।
इन बदलावों का उद्देश्य ऑर्डर बुक में पारदर्शिता बढ़ाना और क्लोजिंग प्राइस पर अचानक बड़े ऑर्डर्स के संभावित प्रभाव को सीमित करना है।
डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग और सेटलमेंट में क्या बदलेगा?
SEBI ने F&O कॉन्ट्रैक्ट्स के एक्सपायरी सेटलमेंट के लिए मौजूदा 30 मिनट की वॉल्यूम वेटेड एवरेज प्राइस (VWAP) पद्धति जारी रखने का फैसला किया है। इसका मतलब है कि इंडेक्स डेरिवेटिव्स का सेटलमेंट अंडरलाइंग शेयर्स के अंतिम 30 मिनट के VWAP से निकाले गए इंडेक्स प्राइस पर आधारित होगा। वहीं, स्टॉक डेरिवेटिव्स में संबंधित शेयर के सभी एक्सचेंज के VWAP का इस्तेमाल होगा।
सामान्य दिनों में इंडेक्स डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग 3:45 बजे तक चलेगी, लेकिन एक्सपायरी वाले दिन एक्सपायर होने वाले इंडेक्स कॉन्ट्रैक्ट्स में ट्रेडिंग 3:30 बजे बंद होगी। स्टॉक डेरिवेटिव्स में एक्सपायरी के दिन भी 3:45 बजे तक ट्रेडिंग जारी रहेगी। वहीं, कैश मार्केट का पोस्ट-क्लोज सेशन 3:50 से 4:00 बजे तक चलेगा।
CAS का रेफरेंस प्राइस अंतिम 15 मिनट के VWAP से तय होगा। यदि इस दौरान कोई ट्रेड नहीं होता, तो उस दिन का अंतिम ट्रेडेड प्राइस इस्तेमाल किया जाएगा।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
SEBI के नए नियमों का सबसे महत्वपूर्ण असर डेरिवेटिव्स ट्रेडर्स और क्लोजिंग सेशन में कारोबार करने वाले निवेशकों पर पड़ सकता है। VWAP आधारित सेटलमेंट जारी रहने से एक्सपायरी प्राइस को CAS के अंतिम ऑक्शन प्राइस से अलग रखा गया है। इससे क्लोजिंग ऑक्शन में अचानक होने वाले उतार-चढ़ाव का सेटलमेंट पर सीधा प्रभाव सीमित रहेगा।
नियमों की घोषणा के बाद 16 अक्टूबर को कैपिटल मार्केट से जुड़ी कंपनियों के शेयर्स में मिला-जुला रुख दिखा। शुरुआती ट्रेडिंग में BSE लगभग 0.8% नीचे था, जबकि Angel One शुरुआती 2% की बढ़त गंवा चुका था। दूसरी ओर, Groww की पैरेंट कंपनी Billionbrains Garage Ventures लगभग 2.5% ऊपर ट्रेड कर रही थी।
निवेशकों को नई ट्रेडिंग टाइमिंग, ऑर्डर प्रतिबंध और एक्सपायरी सेटलमेंट की प्रक्रिया समझना जरूरी होगा, खासकर यदि वे दिन के अंतिम समय में सक्रिय ट्रेडिंग करते हैं।
भविष्य की बातें
SEBI के संशोधित CAS फ्रेमवर्क से भारतीय शेयर मार्केट में क्लोजिंग प्राइस तय करने की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित और पारदर्शी बन सकती है। खास तौर पर रैंडम ऑर्डर क्लोजिंग, आइसबर्ग ऑर्डर्स के पूर्ण डिस्क्लोजर और VWAP आधारित सेटलमेंट से प्राइस में संभावित हेरफेर से जुड़ी चिंताओं को कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, वास्तविक प्रभाव ट्रेडिंग वॉल्यूम, निवेशकों की भागीदारी और नए नियमों के लागू होने के बाद मार्केट के व्यवहार पर निर्भर करेगा।
SEBI ने एक्सचेंज और क्लियरिंग कॉरपोरेशंस को सर्कुलर जारी होने के 7 दिनों के भीतर अपनी स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर्स अपडेट करने का निर्देश दिया है। आने वाले समय में नई व्यवस्था की सफलता इस बात से तय होगी कि यह क्लोजिंग प्राइस में स्थिरता और ट्रेडिंग प्रक्रिया में कितना सुधार लाती है।
डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल एजुकेशनल और इंफॉर्मेशनल उद्देश्य के लिए है और यह इन्वेस्टमेंट एडवाइस या किसी भी सिक्योरिटीज को खरीदने या बेचने की रिकमेंडेशन नहीं है। यहाँ जिन कंपनियों का उल्लेख किया गया है, उन्हें मार्केट डेवलपमेंट्स के संदर्भ में केवल उदाहरण के रूप में बताया गया है। इन्वेस्टर्स को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी इन्वेस्टमेंट डिसीजन लेने से पहले अपनी खुद की रिसर्च करें और अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से परामर्श करें।
सिक्योरिटीज मार्केट में किए गए इन्वेस्टमेंट मार्केट जोखिम के अधीन होते हैं। इन्वेस्ट करने से पहले सभी संबंधित डॉक्यूमेंट्स को ध्यानपूर्वक से पढ़ें।