भारतीय शेयर मार्केट में पिछले कुछ वर्षों में ऑप्शंस ट्रेडिंग में जबरदस्त उछाल देखा गया है। आंकड़े बताते हैं कि एक्सचेंज पर ऑप्शंस का वॉल्यूम तेजी से बढ़ा है, और इसका एक बड़ा हिस्सा साप्ताहिक एक्सपायरी के कॉन्ट्रैक्ट्स से आता है। हालांकि, इस असमान वृद्धि ने रेग्युलेटर SEBI को चिंतित कर दिया है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, SEBI अब साप्ताहिक ऑप्शंस एक्सपायरी को हटाकर लंबी अवधि के विकल्पों को लागू करने पर विचार कर रहा है, ताकि अत्यधिक स्पेक्युलेटिव ट्रेडिंग पर रोक लगाई जा सके और कैश मार्केट की भागीदारी को बढ़ावा दिया जा सके।
आइए समझते हैं कि SEBI और वित्त मंत्रालय साप्ताहिक ऑप्शंस एक्सपायरी को हटाने के बारे में क्या विचार कर रहे हैं और यह आपके लिए समझना क्यों आवश्यक है।
क्या है मामला?
SEBI ऑप्शंस मार्केट में तेजी से बढ़ रही स्पेक्युलेटिव गतिविधियों को नियंत्रण में लाने के लिए गंभीर कदम उठाने की तैयारी में है। क्योंकि SEBI के अनुसार, भले ही कुछ हालिया बदलाव के बाद इंडेक्स ऑप्शंस में एक्सपायरी डे की ट्रेडिंग में रिटेल भागीदारी थोड़ी कम हुई है, लेकिन फिर भी ट्रेडिंग गतिविधियां अत्यधिक रूप से शॉर्ट टर्म एक्सपायरी पर केंद्रित हैं। इसलिए रेगुलेटर अब साप्ताहिक एक्सपायरी को हटाकर मासिक या द्विमासिक एक्सपायरी लागू करने पर विचार कर रहा है। इससे मार्केट में अधिक स्थिरता आ सकती है और अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोका जा सकता है।
इसके अलावा, SEBI मार्जिन फ्रेमवर्क में भी बदलाव की योजना बना रहा है। इसमें ऑप्शन ट्रेडिंग के लिए मार्जिन की आवश्यकताओं को बढ़ाना और कैश मार्केट ट्रेड्स के लिए मार्जिन दायित्वों को कम करना शामिल है।
SEBI को क्यों आया यह विचार?
SEBI का यह प्रस्ताव कई चिंताजनक तथ्यों की बाद आया है। SEBI की 7 जुलाई को जारी स्टडी के अनुसार, फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) में ट्रेड करने वाले रिटेल इन्वेस्टर्स में से 91% यानी 10 में से 9 को नुकसान हो रहा है। FY2025 में इंडिविजुअल ट्रेडर्स का शुद्ध घाटा 41% बढ़कर ₹1,05,603 करोड़ हो गया है, जो पिछले साल ₹74,812 करोड़ था। हालांकि F&O में यूनिक इंडिविजुअल इन्वेस्टर्स की संख्या सालाना आधार पर 20% गिरी है, फिर भी यह दो साल पहले की तुलना में 24% अधिक है।
SEBI के वरिष्ठ सदस्य अनंत नारायण ने पिछले महीने कोलकाता में CII के 11वें कैपिटल मार्केट्स कॉन्क्लेव में चिंता जताते हुए कहा था कि एक्सपायरी के दिन इंडेक्स ऑप्शंस में टर्नओवर अंडरलाइंग कैश मार्केट के टर्नओवर से कभी-कभी 350 गुना या इससे भी अधिक हो जाता है। उन्होंने इसे एक अस्वस्थ असंतुलन बताया और कहा की इसके कई नकारात्मक परिणाम हो सकते हैं।
सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स में संभावित बदलाव
एक अन्य महत्वपूर्ण प्रस्ताव सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) में संशोधन का है। अधिकारी कथित तौर पर ऑप्शन ट्रेडिंग पर STT बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं ताकि अत्यधिक स्पेकुलेशन को रोका जा सके, और साथ ही कैश मार्केट ट्रेड्स पर STT कम करके अधिक स्थिर भागीदारी को प्रोत्साहित किया जा सके। लेकिन, ज़ी बिज़नेस का कहना है कि STT में कोई भी बदलाव केवल अगले साल के यूनियन बजट के बाद ही संभव हो सकता है।
हालांकि, ज़ी बिज़नेस के अनुसार, STT में कोई भी बड़ा बदलाव अब अगले यूनियन बजट के बाद ही संभव है। इससे पहले, SEBI इस विषय पर डिस्कशन पेपर जारी करेगा, जिसमें सभी संभावित विकल्पों पर चर्चा की जा सके। इसके बाद, SEBI का बोर्ड इस पर अंतिम निर्णय लेगा।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
इन प्रस्तावित बदलावों की खबर सामने आते ही 5 अगस्त 2025 को कैपिटल मार्केट से जुड़े शेयरों में तेज गिरावट देखने को मिली। सबसे ज्यादा गिरावट BSE के शेयर में देखी गई, जो लगभग 5% टूटकर ₹2,367 के दिन के निचले स्तर पर बंद हुआ। इसके अलावा एंजेल वन, CDSL और मोतीलाल ओसवाल के शेयरों में भी दबाव देखने को मिला।
ये कदम कैपिटल मार्केट स्टॉक्स के लिए नुकसानदायक साबित हो सकते हैं क्योंकि इससे ऑप्शन वॉल्यूम में कमी आ सकती है, एक्सपायरी डे की वोलेटिलिटी कम हो सकती है और परिणामस्वरूप रेवेन्यू में गिरावट हो सकती है।
हालांकि, रिटेल इन्वेस्टर्स के लिए यह एक सकारात्मक कदम हो सकता है क्योंकि एक्सपायरी जैसे-जैसे नजदीक आती है इंडेक्स संबधित स्टॉक्स में वोलैटिलिटी बढ़ जाती है। SEBI का उद्देश्य रिटेलर्स को स्पेकुलेटिव इनकम से दूर रखकर अधिक उचित निर्णय लेने की दिशा में प्रेरित करना है।
भविष्य की बातें
बिज़नेस टुडे के अनुसार, SEBI द्वारा प्रस्तावित बदलावों को अंतिम रूप देने से पहले, 19 अगस्त को सेकेंडरी मार्केट से जुड़े स्टेकहोल्डर्स के साथ एक अहम बैठक आयोजित की जाएगी। सूत्रों के अनुसार, इस बैठक में इंडस्ट्री प्रतिनिधियों से सुझाव लिए जाएंगे और उनकी सिफारिशों को SEBI के अंतिम प्रस्तावों में शामिल किया जाएगा।
अगर यह प्रस्ताव लागू होते है तो रिटेल इन्वेस्टर्स को भारी वोलैटिलिटी में कमी देखने को मिल सकती है, जबकि स्टॉक ब्रोकर्स और एक्सचेंज की प्रोफिटेबिलिटी काफी हद तक प्रभावित हो सकती है।
*आर्टिकल में शामिल कंपनियों के नाम केवल सूचना के उद्देश्य के लिए है। यह निवेश सलाह नहीं है।
*डिस्क्लेमर: तेजी मंदी डिस्क्लेमर