भारत का समुद्री क्षेत्र बना आर्थिक विकास की नई लहर, जानें कैसे?

भारत का समुद्री क्षेत्र बना आर्थिक विकास की नई लहर, जानें कैसे?
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भारत की विशाल अर्थव्यवस्था को गति देने में समुद्री क्षेत्र की भूमिका को कम नहीं आंका जा सकता है क्योंकि आंकड़े बताते हैं कि देश का लगभग 95% व्यापार समुद्री मार्गों से (वॉल्यूम के हिसाब से) होता है। यह न केवल हमारे निर्यात-आयात का आधार है, बल्कि भारत को ग्लोबल सप्लाई चेन में एक मजबूत प्लेयर भी बनाता है।

सरकार ने मैरीटाइम इंडिया विजन 2030 और मैरीटाइम अमृतकाल विज़न 2047 जैसे दूरदर्शी रोडमैप के जरिये इस सेक्टर को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। आइए समझते हैं कि भारतीय मैरीटाइम सेक्टर अर्थव्यवस्था को कैसे गति दे रहा है।

क्या है मामला?

चाहे क्रूड ऑयल हो या कपड़ा, इलेक्ट्रॉनिक्स या कृषि प्रोडक्ट, भारत का अधिकांश व्यापार पोर्ट्स के रास्ते ही देश और विदेश पहुंचता है। भारत के पास 7,500 किलोमीटर लंबी तटीय रेखा, 12 प्रमुख पोर्ट्स और 200 से अधिक नॉन-मेजर पोर्ट्स हैं, जो देश को अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए एक रणनीतिक लाभ प्रदान करते हैं। पिछले एक दशक में इस सेक्टर में तेजी से बदलाव हुआ है।

सरकार ने इस सेक्टर को आगे बढ़ाने के लिए MAKV 2047 के तहत लगभग ₹80 लाख करोड़ निवेश का लक्ष्य रखा है। इसके साथ ही, मैरीटाइम इंडिया विजन 2030 के तहत लगभग 150 रणनीतिक पहल और ₹3–3.5 लाख करोड़ के निवेश से यह विज़न पोर्ट्स के आधुनिकीकरण, शिपिंग क्षमता विस्तार और इनलैंड वाटरवेज़ के स्ट्रेंथ पर केंद्रित है एंव ₹69,725 करोड़ के हालिया शिपबिल्डिंग पैकेज ने इस सेक्टर को और गति दी है।

वर्तमान स्थिति और क्षमता विस्तार

भारत में करीब 95% व्यापार वॉल्यूम के हिसाब से और लगभग 70% मूल्य के हिसाब से समुद्री मार्गों द्वारा होता है यह आंकड़ा इस क्षेत्र की आर्थिक अहमियत को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।

आकड़ो के अनुसार, पोर्ट्स की क्षमता 1,400 मिलियन टन वार्षिक से दोगुनी होकर अब 2,762 मिलियन टन तक हो गई है, जबकि कार्गो हैंडलिंग वॉल्यूम 972 MMT से बढ़कर 1,594 MMT पहुंच गया है। FY 2024-25 में मुख्य पोर्ट्स ने 855 मिलियन टन कार्गो संभाला, जो पिछले वर्ष के 819 मिलियन टन से अधिक है।

इसी अवधि में प्रमुख सुधार हुए वेसल टर्नअराउंड टाइम 93 घंटे से घटकर 48 घंटे रह गया, ऑपरेटिंग रेशियो 73% से 43% तक आ गया, और नेट सालाना सरप्लस ₹1,026 करोड़ से बढ़कर ₹9,352 करोड़ तक पहुंच गया है।

तेज़ी से बदलता भारत शिपबिल्डिंग सेक्टर

2024 तक भारत की शिपबिल्डिंग इंडस्ट्री 1.12 बिलियन डॉलर तक पहुंच गयी है। फिर भी, भारत ग्लोबल शिपबिल्डिंग इंडस्ट्री में 22वें स्थान पर है और इसका हिस्सा 1% से भी कम है। वहीं, चीन, दक्षिण कोरिया और जापान मिलकर ग्लोबल मार्केट का लगभग 93% नियंत्रित करते हैं।

ग्लोबल शिपबिल्डिंग मार्केट के 2030 तक $146 बिलियन से बढ़कर $195 बिलियन होने का अनुमान है, जिससे भारत के शिपबिल्डिंग सेक्टर के लिए एक बड़ा मौका बनेगा।

सरकार ने इसके लिए मैरीटाइम इंडिया विजन 2030 और अमृतकाल विज़न 2047 के तहत स्पष्ट रोडमैप तैयार किया है 2030 तक शीर्ष 10 और 2047 तक शीर्ष 5 में स्थान हासिल करने का लक्ष्य। इस दिशा में 2025 के बजट में घोषित ₹25,000 करोड़ का मैरीटाइम डेवलपमेंट फंड एक महत्वपूर्ण कदम है, जो शिपबिल्डिंग और इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए सस्ते और लॉन्गटर्म वित्तीय सहयोग प्रदान करेगा।

निवेशकों के लिए इसमें क्या है?

मैरीटाइम सेक्टर में निवेश के कई स्पष्ट अवसर मौजूद हैं। पहला, सरकार के लगभग ₹80 लाख करोड़ के निवेश का प्रस्ताव इन्फ्रास्ट्रक्चर, पोर्ट्स, शिपबिल्डिंग, और इनलैंड वाटरवेज़ से जुड़ी कंपनियों की संभावना बढ़ जाती है। दूसरा, शिपबिल्डिंग की दिशा में भारत की वर्तमान हिस्सेदारी बहुत कम है, लेकिन लक्ष्य तय है कि 2047 तक भारत शीर्ष 5 शिपबिल्डिंग देशों में शामिल हो जाए।

इस प्रकार, निवेशक पहले से मजबूत आधार पर काम कर रही कंपनियों के साथ-साथ इन सेक्टर से संबधित कंपनियों में भी निवेश के अवसर तलाश सकते है।

भविष्य की बातें

भारत का समुद्री क्षेत्र अब पोर्ट्स से आगे बढ़कर अंतर्देशीय जलमार्गों (Inland Waterways) के विकास की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। देश में 111 राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किए गए हैं, जिनसे लॉजिस्टिक्स में जलमार्गों का हिस्सा वर्तमान 2% से बढ़ाकर 5% करने का लक्ष्य है। सरकार का उद्देश्य 2047 तक 500 MTPA कार्गो अंतर्देशीय मार्गों से संभालने का है, जिससे परिवहन सस्ता और पर्यावरण-अनुकूल बन सके।

इस दिशा में सागरमाला प्रोग्राम के तहत 2035 तक ₹5.8 लाख करोड़ की लागत से 840 प्रोजेक्ट्स विकसित किए जा रहे हैं। साथ ही, मैरीटाइम अमृतकाल विज़न 2047 के तहत लगभग ₹80 लाख करोड़ का निवेश पोर्ट्स, जहाज निर्माण, ग्रीन शिपिंग और जलमार्गों के लिए निर्धारित है। यह पहल भारत को ग्लोबल समुद्री व्यापार में अग्रणी बनाने और ब्लू इकोनॉमी को नई गति देने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

*यह आर्टिकल केवल जानकारी के उद्देश्य के लिए है। यह कोई निवेश सलाह नहीं है।
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