भारतीय शेयर मार्केट वर्तमान में एक बेहद संवेदनशील मोड़ पर खड़ा है, जहाँ डोमेस्टिक फैक्टर्स के बजाय ग्लोबल इवेंट्स मार्केट की दिशा तय कर रहे हैं। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच अचानक बढ़े जियोपॉलिटिकल टेंशन ने पूरी दुनिया के फाइनेंशियल मार्केट्स में हलचल मचा दी है। अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के मारे जाने की खबर ने ग्लोबल एनर्जी सिक्योरिटी और आर्थिक स्थिरता पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। इस अप्रत्याशित घटनाक्रम के कारण निवेशकों का ध्यान डोमेस्टिक ट्रिगर्स से हटकर पूरी तरह से ग्लोबल संकेतों पर केंद्रित हो गया है।
आइए समझते है कि यह युद्ध जैसी स्थिति भारत की अर्थव्यवस्था और स्टॉक मार्केट पर क्या असर हो सकता है।
क्या है मामला?
मध्य पूर्व में हालिया तनाव उस समय अचानक भड़क उठा जब वीकेंड पर अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर एक बड़े पैमाने की सैन्य कार्रवाई की। इस हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत हो गई, जो तीन दशकों से अधिक समय तक देश की सर्वोच्च सत्ता रहे थे।
इस कार्रवाई के तुरंत बाद ईरान ने भी कड़ा जवाब दिया और इज़राइल के साथ-साथ सऊदी अरब, बहरीन, क़तर, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात जैसे खाड़ी देश जहाँ अमेरिकी सैन्य बेस मौजूद हैं पर मिसाइलें दागीं। जवाबी हमलों के इस सिलसिले ने पूरे मध्य पूर्व को एक गंभीर युद्ध क्षेत्र में बदल दिया है। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि UAE को अपने दो प्रमुख स्टॉक एक्सचेंज अबू धाबी सिक्योरिटीज एक्सचेंज और दुबई फाइनेंशियल मार्केट को दो दिनों के लिए बंद करने पड़े। इसी के साथ दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट और कई महत्वपूर्ण एयर रूट्स पर उड़ानें निलंबित होने से ग्लोबल एविएशन और लॉजिस्टिक्स सेक्टर भी व्यापक अव्यवस्था में फंस गया है।
यह युद्ध क्यों हो रहा है?
इस युद्ध की शुरुआत लंबे समय से चली आ रही जिओपॉलिटिकल तनाव और सुरक्षा चिंताओं के कारण हुई है, जिसमें अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच मतभेद सालों से बढ़ते रहे हैं। ईरान का परमाणु प्रोग्राम और उसकी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमताएँ अमेरिका और इजराइल के लिए एक सुरक्षा जोखिम के रूप में देखी जा रही हैं, जिससे क्षेत्रीय संतुलन भंग होने का डर बना हुआ है। अमेरिका और इजराइल ने 28 फ़रवरी 2026 को ईरान के कई सैन्य और परमाणु-संबंधित ठिकानों पर संयुक्त सैन्य कार्रवाई शुरू की, जिसे उन्होंने इसी खतरे को पूर्व-निर्धारित रूप से समाप्त करने का प्रयास बताया। इससे पहले कूटनीतिक प्रयास, परमाणु वार्ता और प्रतिबंधों के बावजूद बातचीत में कोई ठोस समाधान नहीं निकला, जिससे तनाव और बढ़ा।
दूसरी ओर, ईरान ने अमेरिका और इजराइल के हमलों का जवाबी हमला किया है, जिसमें मिसाइलें और ड्रोन का इस्तेमाल किया गया। ईरान क्षेत्र में अपने समर्थक प्रॉक्सी मिलिशिया ग्रुप्स का भी समर्थन करता रहा है, जिससे इजराइल और उसके सहयोगियों को नियमित सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। यह संघर्ष केवल वर्तमान घटनाओं का परिणाम नहीं है, बल्कि दशकों से चली आ रही क्षेत्रीय शक्ति संघर्ष, विश्वास की कमी और वैचारिक टकराव का नतीजा है, जिसमें हर पक्ष अपनी रणनीतिक सुरक्षा और प्रभुत्व को लेकर सक्रिय रहा है।
सेफ हेवन डिमांड और कमोडिटी मार्केट पर असर
मध्य पूर्व में अमेरिका और इज़राइल के ईरान पर सैन्य हमलों के बाद कमोडिटी मार्केट में वोलैटिलिटी और तेज़ी देखने को मिली है, क्योंकि निवेशक ग्लोबल अनिश्चितता के बीच सेफ-हेवन एसेट्स की ओर शिफ्ट हो रहे हैं। ब्रेंट क्रूड ऑइल चार साल के उच्च स्तर तक बढ़कर लगभग $82.37 प्रति बैरल तक पहुंच गया और कई सेशन में 8-13% की उछाल दर्ज की गई है, जिससे एनर्जी सुरक्षा और सप्लाई रूट्स पर चिंता बढ़ गई है। यह उछाल खासकर Strait of Hormuz के संभावित व्यवधान के कारण है, जो ग्लोबल तेल सप्लाई का लगभग 20% संभालता है। इससे ऑइल की सप्लाई निवेशकों के लिए प्राथमिक चिंता बन गई है और एनर्जी लागत बढ़ने पर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएँ प्रभावित हो सकती हैं।
इस ग्लोबल ट्रेंड का असर भारत के MCX पर भी साफ दिखा, जहाँ गोल्ड और सिल्वर दोनों में तेज़ उछाल देखने को मिला। गोल्ड सोमवार को 4% की तेजी के साथ ₹1,68,793 प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया। इसी प्रकार, सिल्वर 5% बढ़ते हुए ₹2,96,400 प्रति किलो पर पहुंच गयी।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
मध्य पूर्व में तनाव के नए दौर और ग्लोबल मार्केट्स में बढ़ती बेचैनी ने सोमवार यानि मार्च 02, 2026 की शुरुआत में ही भारतीय शेयर बाजार को जोरदार झटका दिया। मार्केट खुलते ही निफ्टी 50 तेजी से नीचे फिसलता हुआ 24,900 के स्तर के नीचे चला गया, जबकि BSE सेंसेक्स 1,000 पॉइंट्स से ज्यादा टूट गया। सुबह 11:04 बजे तक निफ्टी 50 24,862.75 पर था यानी 316 पॉइंट्स (1.25%) की गिरावट और सेंसेक्स 80,246.75 पर, लगभग 1,040 पॉइंट्स (1.28%) नीचे आ गया। यह तस्वीर बताती है कि जिओपॉलिटिकल उथल-पुथल ने निवेशकों के सेंटीमेंट को गहराई से प्रभावित किया है और मार्केट में व्यापक जोखिम से बचने का रुख दिखाई दे रहा है।
ऑइल प्राइस में तेज़ उछाल के कारण अब दबाव उन सेक्टर्स पर सबसे ज्यादा पड़ेगा जहाँ लागत संरचना ऑइल प्राइस से सीधे जुड़ी रहती है। पेंट, टायर, एविएशन, केमिकल्स और OMCs जैसे सेक्टर्स की कंपनियों के मार्जिन पर अतिरिक्त बोझ आने की आशंका है। इसी के साथ, बढ़ती जिओपॉलिटिकल चिंताओं ने डिफेंस स्टॉक्स को निवेशकों के लिए संभावित सुरक्षित विकल्प बना दिया है, जिससे HAL और BEL जैसी कंपनियों में सकारात्मक रुझान देखने की संभावना बढ़ रही है।
भविष्य की बातें
द टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट वीके विजयकुमार का मानना है कि किसी भी संकट के समय पैनिक सेलिंग यानी घबराहट में बिकवाली करना एक गलत रणनीति होती है। पिछले कई दशकों का ऐतिहासिक डेटा यह साफ बताता है कि कोविड संकट, रूस और यूक्रेन युद्ध या गाजा संघर्ष जैसे बड़े इवेंट्स का भी 6 महीने बाद मार्केट पर कोई खास नकारात्मक असर नहीं रहा। मौजूदा संकट भी संभवतः इसी पैटर्न का पालन करेगा।
हालांकि, युद्ध कभी भी अप्रत्याशित मोड़ ले सकता है, इसलिए निवेशकों को सतर्क जरूर रहना चाहिए। साथ ही मार्केट में आने वाली इस कमजोरी का उपयोग जल्दबाजी में बाहर निकलने के बजाय एक अवसर के रूप में किया जाना बेहतर हो सकता है मजबूत फंडामेंटल रिसर्च को नकारना सबसे बड़ी गलतियों में से एक हो सकती है।
डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल एजुकेशनल और इंफॉर्मेशनल उद्देश्य के लिए है और यह इन्वेस्टमेंट एडवाइस या किसी भी सिक्योरिटीज को खरीदने या बेचने की रिकमेंडेशन नहीं है। यहाँ जिन कंपनियों का उल्लेख किया गया है, उन्हें मार्केट डेवलपमेंट्स के संदर्भ में केवल उदाहरण के रूप में बताया गया है। इन्वेस्टर्स को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी इन्वेस्टमेंट डिसीजन लेने से पहले अपनी खुद की रिसर्च करें और अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से परामर्श करें।
सिक्योरिटीज मार्केट में किए गए इन्वेस्टमेंट मार्केट जोखिम के अधीन होते हैं। इन्वेस्ट करने से पहले सभी संबंधित डॉक्यूमेंट्स को ध्यानपूर्वक से पढ़ें।