भारत का इक्विटी मार्केट इस समय एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां डोमेस्टिक निवेशकों की मजबूत भागीदारी के बावजूद विदेशी निवेशकों का भरोसा लगातार कमजोर होता दिख रहा है। साल 2026 की शुरुआत से ही फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) ने भारतीय इक्विटी मार्केट से रिकॉर्ड स्तर की बिकवाली की है।
यह संकेत देता है कि ग्लोबल कैपिटल फिलहाल भारत जैसे इमर्जिंग मार्केट्स को लेकर सतर्क है। आइए विस्तार से समझते हैं कि यह बिकवाली क्यों हो रही है और इसका आगे क्या असर हो सकता है।
क्या है मामला?
2026 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय शेयर मार्केट से नेट आउटफ्लो के रूप में 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि निकाली है। यह आंकड़ा पूरे वर्ष 2025 के कुल आउटफ्लो (लगभग 1.66 लाख करोड़ रुपये) से भी अधिक है, और यह मात्र शुरुआती महीनों में ही दर्ज किया गया है।

डेटा साफ दिखाता है कि शुरुआती दो महीनों में भारी बिकवाली के बाद थोड़ी स्थिरता आई, लेकिन मई में फिर दबाव बढ़ गया।
जनवरी से मई तक की स्थिति में FPIs लगातार नेट सेलर्स रहे, सिवाय फरवरी के। मार्च में रिकॉर्ड 1.17 लाख करोड़ रुपये की बिकवाली हुई, जो अब तक का सबसे बड़ा मासिक आउटफ्लो है। अप्रैल में यह 60,847 करोड़ रुपये रहा, जबकि मई में (10 मई 2026 तक) 14,231 करोड़ रुपये निकाले गए। कुल मिलाकर, यह निकासी भारतीय इक्विटी में FIIs की ओनरशिप को 14 साल के निचले स्तर 14.7% तक ले आई है, जबकि डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशंस की ओनरशिप 18.9% है।
सेक्टर रोटेशन और AI का असर
ग्लोबल मैक्रो इकोनॉमिक अनिश्चितताएं, इन्फ्लेशन, ब्याज दरें और जियोपॉलिटिकल तनाव ने इमर्जिंग मार्केट्स से पूंजी निकासी को बढ़ावा दिया। FPIs ने भारत की तुलना में नॉर्थ एशियन मार्केट्स जैसे साउथ कोरिया और ताइवान को प्राथमिकता दी, जहां AI बूम से मजबूत अर्निंग्स ग्रोथ दिख रही है। भारत में उच्च वैल्यूएशंस और AI के संभावित प्रभाव ने भी रिस्क-रिवॉर्ड को कम आकर्षक बनाया।
दूसरी ओर, FPIs ने पावर, कंस्ट्रक्शन और कैपिटल गुड्स जैसे सेक्टर्स में सिलेक्टिव खरीदारी दिखाई। मिड-कैप और चुनिंदा स्मॉल-कैप स्टॉक्स में भी दिलचस्पी बढ़ी, जहां ग्रोथ पोटेंशियल मजबूत है। यह सेक्टर रोटेशन DIIs (डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स) द्वारा भारी खरीदारी से संतुलित हुआ, जिन्होंने FII आउटफ्लो का बड़ा हिस्सा अब्जॉर्ब किया।
गोल्डमैन सैक्स की रिपोर्ट में क्या संकेत मिले?
गोल्डमैन सैक्स की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय मार्केट में विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली का बड़ा हिस्सा अब पूरा हो चुका है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले कुछ महीनों के रिकॉर्ड आउटफ्लो के बाद अब अतिरिक्त बिकवाली का जोखिम सीमित दिखाई देता है, जो लगभग $4-5 बिलियन यानी करीब ₹50,000 करोड़ तक रह सकता है। फ्लो, पोजिशनिंग और ओनरशिप ट्रेंड्स के आधार पर रिपोर्ट का मानना है कि विदेशी निवेश अब अपने डाउनसाइड सीनारियो के करीब पहुंच चुका है।
हालांकि, रिपोर्ट यह भी संकेत देती है कि विदेशी निवेशकों की वापसी तुरंत होने की संभावना कम है। क्रूड ऑयल की प्राइस में गिरावट के बावजूद अप्रैल में विदेशी पूंजी भारतीय मार्केट में वापस नहीं लौटी। इसके अलावा, कमजोर अर्निंग्स विजिबिलिटी, संभावित डाउनग्रेड साइकिल और भारत के ऊंचे ग्रोथ-एडजस्टेड वैल्यूएशंस विदेशी निवेशकों को सतर्क बनाए हुए हैं। इसके साथ ही, AI के संभावित प्रभाव और नॉर्थ एशियन मार्केट्स की तुलना में कम आकर्षक रिस्क-रिवॉर्ड को भी प्रमुख चिंता बताया गया है।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि FPI बिकवाली हमेशा भारतीय बाजार की बुनियादी कमजोरी का संकेत नहीं होती। कई बार यह केवल ग्लोबल एसेट एलोकेशन और सेक्टर रोटेशन का हिस्सा होती है। हाल के महीनों में विदेशी निवेशकों की सबसे ज्यादा बिकवाली IT, FMCG और BFSI सेक्टर्स में देखने को मिली है।
IT सेक्टर में फरवरी के दौरान विदेशी निवेशकों ने अकेले ₹16,949 करोड़ निकाले, क्योंकि ग्लोबल मार्केट फिलहाल AI थीम पर फोकस कर रहा है। भारतीय IT कंपनियों को AI से लाभार्थी के बजाय संभावित जोखिम वाले सेक्टर के रूप में देखा जा रहा है। FMCG सेक्टर में लंबे समय से ऊंचे वैल्यूएशंस और कमजोर कंजम्पशन के कारण दबाव बना हुआ है, जबकि BFSI सेक्टर में मार्च में ₹60,655 करोड़ और अप्रैल के पहले आधे हिस्से में ₹19,152 करोड़ की बिकवाली दर्ज की गई। चूंकि BFSI का निफ्टी में सबसे बड़ा वेटेज है, इसलिए विदेशी निवेशकों की बिकवाली का सबसे ज्यादा असर इसी सेक्टर पर दिखाई देता है।
भविष्य की बातें
द इकोनॉमिक टाइम्स के अनुसार, ट्रस्टलाइन होल्डिंग्स के CEO N अरुणागिरि का कहना है कि, सितंबर 2024 से अब तक लगभग $50 बिलियन की विदेशी बिकवाली के बावजूद भारत को इमर्जिंग मार्केट एलोकेशन में अपेक्षित हिस्सेदारी नहीं मिल रही है। इसी दौरान दक्षिण कोरिया में करीब $4 बिलियन और ताइवान में लगभग $5.5 बिलियन का निवेश फ्लो देखने को मिला। यह संकेत देता है कि फिलहाल विदेशी निवेशकों के लिए भारत अन्य एशियाई बाजारों की तुलना में कम आकर्षक दिखाई दे रहा है।
आने वाले समय में मार्केट की दिशा बड़े इंडेक्स-आधारित रैली के बजाय स्टॉक-स्पेसिफिक मूवमेंट्स पर अधिक निर्भर रह सकती है। बड़े शेयर्स में दबाव बना रह सकता है, जबकि मजबूत डोमेस्टिक निवेश फ्लो स्मॉलकैप और मिडकैप सेगमेंट को सपोर्ट देता रह सकता है। ऐसे माहौल में निवेशकों का फोकस केवल मोमेंटम के बजाय मजबूत अर्निंग्स विजिबिलिटी और बॉटम-अप अवसरों वाली कंपनियों पर अधिक रहने की संभावना है।
डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल एजुकेशनल और इंफॉर्मेशनल उद्देश्य के लिए है और यह इन्वेस्टमेंट एडवाइस या किसी भी सिक्योरिटीज को खरीदने या बेचने की रिकमेंडेशन नहीं है। यहाँ जिन कंपनियों का उल्लेख किया गया है, उन्हें मार्केट डेवलपमेंट्स के संदर्भ में केवल उदाहरण के रूप में बताया गया है। इन्वेस्टर्स को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी इन्वेस्टमेंट डिसीजन लेने से पहले अपनी खुद की रिसर्च करें और अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से परामर्श करें।
सिक्योरिटीज मार्केट में किए गए इन्वेस्टमेंट मार्केट जोखिम के अधीन होते हैं। इन्वेस्ट करने से पहले सभी संबंधित डॉक्यूमेंट्स को ध्यानपूर्वक से पढ़ें।