इस साल गर्मियों के सबसे तेज़ महीनों में भारत में जेनरेट हुई सोलर पावर का करीब 11% ग्रिड कर्टेलमेंट की वजह से बर्बाद हो गया, यह तब हुआ जब डिमांड रिकॉर्ड स्तर पर थी। भारत अब सोलर पावर की इस बर्बादी को रोकने के लिए बैटरी स्टोरेज में बढ़ते इन्वेस्टमेंट्स पर दांव लगा रहा है।
आइए भारत के बैटरी स्टोरेज बूम को विस्तारपूर्वक समझें और जानें क्या यह थीम निवेशकों के लिए एक बड़ा निवेश अवसर बन सकता है।
क्या है मामला?
भारत में रिन्यूएबल एनर्जी की क्षमता बढ़ने के साथ सोलर पावर का दबदबा बढ़ा है। लेकिन दिन के समय, खासकर गर्मियों में तेज धूप के दौरान, बिजली की सप्लाई डिमांड से ज्यादा हो रही है। इससे पावर कर्टेलमेंट यानी उपलब्ध बिजली को ग्रिड में पूरी तरह शामिल न कर पाने की समस्या बढ़ रही है।
अप्रैल-जून के दौरान ट्रांसमिशन सिस्टम 63 बिलियन kWh की क्षमता के मुकाबले 8 बिलियन kWh से ज्यादा बिजली को अब्सॉर्ब नहीं कर सका। मई में कर्टेलमेंट सबसे ज्यादा रही, जब गर्मी के कारण बिजली की डिमांड रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई।
इस समस्या का असर नई रिन्यूएबल प्रोजेक्ट्स पर भी पड़ सकता है। मनी कंट्रोल के अनुसार, रिन्यूएबल्स सेक्रेटरी संतोष कुमार सारंगी का कहना है कि, बैटरी स्टोरेज के बिना रिन्यूएबल प्रोजेक्ट्स के लिए खरीदार ढूंढना मुश्किल हो सकता है। करीब 42 GW की प्लान्ड क्षमता के लिए अभी तक ऑफटेक कॉन्ट्रैक्ट साइन नहीं हुए हैं। इनमें 18 GW के सोलर-ओनली प्रोजेक्ट्स और 14-15 GW की हाई-प्राइस पर अवॉर्ड की गई क्षमता सबसे ज्यादा जोखिम में है।
इसके अलावा, करीब 21 GW रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स को ग्रिड की केवल पार्ट-टाइम एक्सेस मिल रही है। खासकर नॉर्दर्न और वेस्टर्न राज्यों में सोलर क्षमता के विस्तार की तुलना में ग्रिड नेटवर्क का विकास पीछे रह गया है। ऐसे में मजबूत ट्रांसमिशन नेटवर्क और बैटरी स्टोरेज के बिना भारत के रिन्यूएबल एनर्जी विस्तार की रफ्तार पर असर पड़ सकता है।
सरकार की ग्रीन एनर्जी स्टोरेज रणनीति क्या है?
भारत सरकार ने लार्ज-स्केल एनर्जी स्टोरेज इन्फ्रा डेवलपमेंट के लिए कंप्रिहेंसिव स्ट्रैटेजी अपनाई है, जिसमें पॉलिसी रिफॉर्म, फाइनेंशियल इन्सेंटिव्स, मार्केट डिजाइन और टेक्नोलॉजिकल इनोवेशन शामिल हैं। सरकार का फोकस बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम्स, पंप्ड स्टोरेज प्रोजेक्ट्स (PSPs), ग्रीन हाइड्रोजन, रेगुलेटरी रिफॉर्म्स और PLI स्कीम पर है।
वायबिलिटी गैप फंडिंग (VGF) स्कीम से लार्ज-स्केल बैटरीज के कैपिटल कॉस्ट को कम करने की कोशिश है, साथ ही एनर्जी स्टोरेज ओब्लिगेशन्स लागू किए गए हैं ताकि डिस्कॉम्स स्टोरेज-बैक्ड रिन्यूएबल से पावर खरीदें। प्राइम मिनिस्टर ने नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन लॉन्च किया है जिसमें करीब ₹19,744 करोड़ का आउटले है, वहीं PLI स्कीम से एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल बैटरी की डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग बढ़ेगी।
भारत की इलेक्ट्रिसिटी डिमांड 2047 तक दोगुनी से ज्यादा होने की उम्मीद है, बिना स्टोरेज के ग्रिड कर्टेलमेंट और फ्रीक्वेंसी इनस्टेबिलिटी झेलेगा। सरकार RTC रिन्यूएबल पावर को बढ़ावा दे रही है जो सोलर, विंड, हाइड्रोपावर, बैटरी और पंप्ड स्टोरेज को मिलाकर निरंतर इलेक्ट्रिसिटी देता है, साथ ही ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर प्रोग्राम से ट्रांसमिशन मॉडर्नाइजेशन हो रहा है।
मैन्युफैक्चरिंग और आयात डिपेंडेंसी का सच
वुड मैकेंजी की रिपोर्ट के मुताबिक 2026 में भारत की कमीशन्ड सेल मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी सिर्फ 2 GWh है, जबकि चाइना की कुल कैपेसिटी 2,695 GWh है। चाइना ग्लोबल कैपेसिटी का 85% से 98% हिस्सा कंट्रोल करता है, चाहे कैथोड हो, एनोड, सेपरेटर या इलेक्ट्रोलाइट, हर मेजर सप्लाई चेन कंपोनेंट में।
भारत का डोमेस्टिक बैटरी मैन्युफैक्चरिंग 2026 में करीब 260 GWh डिमांड पाइपलाइन का 1% से कम (2 GWh) है, जिससे आयात पर स्ट्रक्चरल डिपेंडेंसी बनी हुई है। 226 GWh से ज्यादा सेल मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी 2035 तक बनाने का प्लान है, पर एक्जीक्यूशन डिले और चाइनीज-कोरियन लाइसेंसर्स पर टेक डिपेंडेंस की वजह से सेलफ-सफिशिएंट इंडस्ट्री बनने में भारत को 10-15 साल लगेंगे।
लोकली मैन्युफैक्चर्ड सेल्स लिमिटेड स्केल और हाई फाइनेंसिंग कॉस्ट की वजह से आयात से 25-40% महंगे आएंगे, हालांकि भारत का अंडरलाइंग कॉस्ट पोजीशन जापान से 154% और साउथ कोरिया से 9% बेहतर है। नई टेंडर्स में ग्रिड-स्केल BESS प्रोजेक्ट्स पर 20% डोमेस्टिक कंटेंट रिक्वायरमेंट लगा है, जिससे कंटेनर्स और बैटरी पैक्स जैसे डाउनस्ट्रीम कंपोनेंट्स की लोकलाइजेशन बढ़ेगी।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
रिन्यूएबल सेक्टर में बढ़ती कर्टेलमेंट और ग्रिड कनेक्टिविटी की समस्या का असर सोलर कंपनियों की आय और मुनाफे पर पड़ सकता है। करीब 42 GW की प्लान्ड क्षमता में जिन प्रोजेक्ट्स के साथ बैटरी स्टोरेज नहीं जुड़ा है, उन्हें ऑफटेक कॉन्ट्रैक्ट मिलने में दिक्कत हो सकती है। वहीं, 21 GW के पार्ट-टाइम ग्रिड एक्सेस वाले प्रोजेक्ट्स में कर्टेलमेंट का जोखिम कंपनियों के रेवेन्यू और इक्विटी रिटर्न्स पर दबाव डाल सकता है।
रिटेल निवेशकों के लिए इसका मतलब है कि सिर्फ रिन्यूएबल क्षमता बढ़ाने वाली कंपनियों के बजाय स्टोरेज, ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर और एडवांस्ड बैटरी टेक्नोलॉजी से जुड़ी कंपनियों पर नजर रखना ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है। बैटरी स्टोरेज वैल्यू चेन में कंटेनर्स, बैटरी पैक्स, EMS और SCADA जैसे सेगमेंट्स को फायदा मिल सकता है।
भविष्य की बातें
वुड मैकेंजी के मुताबिक भारत को सेल्फ-सफिशिएंट सेल इंडस्ट्री बनने में 10-15 साल लगेंगे, पर अगले 2-3 साल में डाउनस्ट्रीम कंपोनेंट्स की लोकलाइजेशन प्रायरिटी रहेगी और 2-5 साल में आयात इनपुट्स के साथ सेल मैन्युफैक्चरिंग डेवलप होगी। फुल रिफाइनिंग कैपेबिलिटीज बनने में 10 साल से ज्यादा का समय लगेगा, यानी आयात डिपेंडेंसी मेडियम टर्म तक बनी रहेगी।
सरकार का ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर और राउंड द क्लॉक (RTC) पावर प्लान 2047 तक डबल डिमांड को संभालने के लिए जरूरी है, साथ ही ISA और बिलैटरल कोलैबोरेशन्स से टेक ट्रांसफर होगा। निवेशकों को यह समझना होगा कि बैटरी स्टोरेज बूम पॉलिसी-ड्रिवन है और एक्जीक्यूशन डिले या फाइनेंशियल वियाबिलिटी के झटके शॉर्ट टर्म में वॉलेटिलिटी ला सकते हैं।
डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल एजुकेशनल और इंफॉर्मेशनल उद्देश्य के लिए है और यह इन्वेस्टमेंट एडवाइस या किसी भी सिक्योरिटीज को खरीदने या बेचने की रिकमेंडेशन नहीं है। यहाँ जिन कंपनियों का उल्लेख किया गया है, उन्हें मार्केट डेवलपमेंट्स के संदर्भ में केवल उदाहरण के रूप में बताया गया है। इन्वेस्टर्स को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी इन्वेस्टमेंट डिसीजन लेने से पहले अपनी खुद की रिसर्च करें और अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से परामर्श करें।
सिक्योरिटीज मार्केट में किए गए इन्वेस्टमेंट मार्केट जोखिम के अधीन होते हैं। इन्वेस्ट करने से पहले सभी संबंधित डॉक्यूमेंट्स को ध्यानपूर्वक से पढ़ें।