निवेश की दुनिया में ₹1 करोड़ का आंकड़ा सिर्फ एक संख्या नहीं है, बल्कि यह एक मानसिक और वित्तीय माइलस्टोन है। कई निवेशकों के लिए यह सबसे कठिन लक्ष्य होता है। दिलचस्प बात यह है कि एक बार यह लक्ष्य हासिल हो जाए, तो आगे की वेल्थ अपेक्षाकृत तेजी से बनती दिखती है। आखिर ऐसा क्यों होता है? आइए समझते है।
शुरुआत क्यों होती है सबसे कठिन?
पहले ₹1 करोड़ तक पहुंचने में सबसे ज्यादा समय इसलिए लगता है क्योंकि शुरुआती वर्षों में आपका निवेश छोटा होता है और रिटर्न भी उसी अनुपात में छोटा दिखता है। उदाहरण के तौर पर, यदि कोई व्यक्ति हर महीने ₹10,000 का SIP 12% वार्षिक रिटर्न पर करता है, तो लगभग 15 साल में ₹1 करोड़ का कॉर्पस बन सकता है।
यहां समझने वाली बात यह है कि शुरुआती 5-7 वर्षों में आपके निवेश का बड़ा हिस्सा आपका खुद का डाला हुआ पैसा होता है, जबकि रिटर्न का हिस्सा अपेक्षाकृत कम रहता है। यानी इस दौर में कंपाउंडिंग का असर बहुत सीमित दिखता है। यही वजह है कि शुरुआती चरण में प्रगति धीमी लगती है और धैर्य की सबसे ज्यादा जरूरत होती है।
कंपाउंडिंग की असली ताकत कब दिखती है?
कंपाउंडिंग की असली ताकत तब दिखती है जब आपका कॉर्पस बड़ा हो जाता है। उदाहरण के तौर पर, यदि 12% रिटर्न मानें, तो ₹1 करोड़ पर एक साल में लगभग ₹12 लाख का रिटर्न मिल सकता है। लेकिन यदि आपका निवेश सिर्फ ₹5 लाख है, तो उसी 12% पर सालाना रिटर्न ₹60,000 ही होगा।
यही अंतर बताता है कि शुरुआत में रफ्तार धीमी क्यों रहती है। जब आपका फंड छोटा होता है, तो प्रतिशत भले समान हो, लेकिन वास्तविक वैल्यू छोटी होती है। जैसे-जैसे कॉर्पस बढ़ता है, रिटर्न की वैल्यू भी तेजी से बढ़ने लगती है।
पहला करोड़: एक मनोवैज्ञानिक बाधा
₹1 करोड़ का आंकड़ा एक मनोवैज्ञानिक दीवार भी है। जब निवेशक इस स्तर तक पहुंचते हैं, तो उन्हें आत्मविश्वास मिलता है कि उनका निवेश सही दिशा में है। NDTV प्रॉफिट के अनुसार, यह माइलस्टोन ‘गेटवे टू एक्सेलरेटेड वेल्थ क्रिएशन’ यानी तेज वेल्थ निर्माण का द्वार माना जाता है।
इस स्तर पर पहुंचने के बाद, निवेशक आमतौर पर अधिक अनुशासित और लॉन्गटर्म दृष्टिकोण अपनाते हैं। उन्हें यह समझ आने लगता है कि समय और धैर्य ही सबसे बड़े सहयोगी हैं। यही मानसिक बदलाव आगे की वेल्थ को तेजी से बढ़ाने में मदद करता है।
समय बनाम रिटर्न: असली खेल क्या है?
अक्सर निवेशक हाई रिटर्न के पीछे भागते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि ‘समय’ रिटर्न से ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जैसे कि अगर कोई व्यक्ति जल्दी शुरुआत करता है और लगातार निवेश जारी रखता है, तो वह कंपाउंडिंग का पूरा लाभ उठा सकता है।
मान लीजिए कोई 25 साल की उम्र में निवेश शुरू करता है और 15 साल में ₹1 करोड़ बना लेता है। यदि वह निवेश जारी रखे, तो अगला करोड़ बनने में सिर्फ 5 साल का समय लगेगा, क्योंकि अब उसके पास बड़ा बेस है।
इसलिए पहला करोड़ कठिन इसलिए नहीं है कि लक्ष्य बहुत बड़ा है, बल्कि इसलिए कि शुरुआत में समय और अनुशासन की परीक्षा होती है। जो निवेशक बीच में रुक जाते हैं या मार्केट की गिरावट में घबरा जाते हैं, वे कंपाउंडिंग के असली लाभ से वंचित रह जाते हैं।
क्या पहला करोड़ ही असली टर्निंग पॉइंट है?
डेटा यह संकेत देता है कि पहला ₹1 करोड़ वास्तव में एक टर्निंग पॉइंट है। इसके बाद रिटर्न की गति तेज दिखने लगती है। उदाहरण के तौर पर, यदि 12% रिटर्न जारी रहे, तो ₹1 करोड़ से ₹2 करोड़ बनने में पहले जितना समय नहीं लगेगा, क्योंकि अब हर साल का रिटर्न ही लाखों में होता है।
यह एक स्नोबॉल इफेक्ट जैसा है। शुरुआत में बर्फ का गोला छोटा होता है और धीरे-धीरे बढ़ता है। लेकिन जब वह बड़ा हो जाता है, तो हर चक्कर में ज्यादा बर्फ इकट्ठा करता है। निवेश में भी यही सिद्धांत काम करता है।
निष्कर्ष
पहले ₹1 करोड़ तक पहुंचना कठिन इसलिए लगता है क्योंकि यह चरण धैर्य, अनुशासन और निरंतरता की डिमांड करता है। शुरुआती वर्षों में रिटर्न कम दिखते हैं, लेकिन यही समय नींव मजबूत करने का होता है।
जैसे-जैसे कॉर्पस बढ़ता है, कंपाउंडिंग अपनी असली ताकत दिखाती है। इसलिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि निवेश की शुरुआत जल्दी की जाए, नियमितता बनाए रखी जाए और मार्केट की वोलैटिलिटी से घबराकर रणनीति न बदली जाए।
अंततः, पहला करोड़ सिर्फ एक वित्तीय लक्ष्य नहीं, बल्कि यह उस प्रक्रिया का प्रमाण है जिसमें समय, धैर्य और अनुशासन मिलकर वेल्थ क्रिएशन का रास्ता बनाते हैं।
*यह आर्टिकल केवल जानकारी के उद्देश्य के लिए है। यह कोई निवेश सलाह नहीं है।
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