अमेरिका में एक नया कानून लाने पर विचार हो रहा है, जो भारत के IT सेक्टर के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है। यह कानून अमेरिकी कंपनियों और भारतीय IT इंडस्ट्री के बीच के पुराने और फायदेमंद रिश्ते को पूरी तरह से बदल सकता है। यह प्रस्ताव सीधे तौर पर उस फायदे को निशाना बनाता है, जिसके लिए अमेरिकी कंपनियाँ भारत में काम आउटसोर्स करती हैं। यह एक ऐसा संकट है जो सामान्य आर्थिक उतार-चढ़ाव से बिल्कुल अलग है। इस कानून का नाम ‘हाल्टिंग इंटरनेशनल रिलोकेशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट (HIRE) एक्ट’ है।
आइए समझते हैं कि HIRE एक्ट क्या है और अगर यह लागू होता है तो भारतीय IT सेक्टर कैसे प्रभावित हो सकता है।
क्या है मामला?
HIRE (Halting International Relocation of Employment Act) एक्ट नाम का एक बिल है, जिसे सीनेटर बर्नी मोरेनो (Senator Bernie Moreno) ने पेश किया है। प्रस्तावित HIRE एक्ट आउटसोर्सिंग पर सीधा असर डालने वाला कदम माना जा रहा है। इस कानून के तहत, 31 दिसंबर 2025 के बाद किसी भी अमेरिकी कंपनी या टैक्सपेयर द्वारा विदेशी व्यक्तियों को किए गए भुगतान पर 25% टैक्स लगाया जाएगा, यदि उस काम से US कंस्यूमर्स को लाभ मिल रहा हो।
इस टैक्स का उद्देश्य उन कंपनियों पर दबाव बनाना है जो विदेशी श्रमिकों को रोजगार देती हैं, बजाय इसके कि अमेरिकी वर्कफोर्स को अवसर प्रदान करें। इससे जुटाई गई राशि को डोमेस्टिक वर्कफोर्स फंड में जमा किया जाएगा, जो अप्रेंटिसशिप और मिडिल-क्लास के लिए वर्कफोर्स डेवलपमेंट प्रोग्राम्स को मजबूत करने में काम आएगी।
आउटसोर्सिंग के खिलाफ बढ़ती US राजनीति
HIRE एक्ट अचानक नहीं आया है। यह अमेरिका में चल रही एक राजनीतिक सोच का नतीजा है। आउटसोर्सिंग का विरोध करने वाली भावना अब एक गंभीर नीतिगत बहस बन चुकी है। इसकी शुरुआत दक्षिणपंथी अमेरिकी कमेंटेटर जैक पोसोबिक (American activist Jack Posobiec) से हुई, जिन्होंने फॉरेन रिमोट वर्कर्स और आउटसोर्सिंग पर रोक लगाने की बात की। इस विचार को तब बल मिला जब US राष्ट्रपति के एक व्यापार सलाहकार, पीटर नवारो ने इसका समर्थन किया।
सीनेटर बर्नी मोरेनो का कहना है कि ग्रेजुएट्स नौकरियों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जबकि कंपनियां बेहतर वेतन वाली नौकरियां विदेश भेज रही हैं। उनके मुताबिक, अब समय आ गया है कि कामकाजी वर्ग को सुरक्षित नौकरियां और सम्मानजनक रिटायरमेंट का अधिकार मिले।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
आंकड़े बताते हैं कि भारतीय IT सेक्टर पर इसका कितना बड़ा असर पड़ सकता है। भारत के IT सेक्टर की 50–60% से ज्यादा कमाई अमेरिका से आती है, और सैकड़ों ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) अमेरिकी क्लाइंट्स के लिए सेवाएं प्रदान करते हैं। इसके अलावा, बड़ी संख्या में स्टार्टअप्स और फ्रीलांसर भी US क्लाइंट्स को सर्विसेज देते हैं। यही निर्भरता इस सेक्टर की सबसे बड़ी चिंता का कारण है।
अगर यह बिल पास होता है, तो US कंपनियों के लिए ऑफशोर सर्विसेज काफी महंगी हो जाएंगी। उदाहरण के तौर पर, $100 की आउटसोर्सिंग पेमेंट पर न सिर्फ $25 का एक्साइज टैक्स लगेगा, बल्कि यह खर्च इनकम टैक्स में डिडक्ट नहीं होगा। इसका मतलब है कि कंपनियों को लगभग $21 का अतिरिक्त कॉरपोरेट टैक्स (21% रेट पर) भी देना होगा। इस तरह राज्य स्तर के टैक्स को छोड़कर कुल टैक्स बोझ 46% के करीब पहुँच सकता है।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
HIRE एक्ट के प्रस्ताव की खबर के बाद, सोमवार यानि 08 सितंबर 2025 को भारत के IT सेक्टर के मुख्य इंडेक्स, निफ्टी IT और BSE IT, दोनों में लगभग 1% की गिरावट आई। जबकि निफ्टी और सेंसेक्स लगभग फ्लैट थे।

डेटा दिखाता है कि भारतीय IT कंपनियों की कमाई का बड़ा हिस्सा लगातार US मार्केट पर निर्भर रहा है।
भारत की बड़ी IT कंपनियां जैसे TCS, इन्फोसिस, विप्रो, HCL टेक और टेक महिंद्रा अपनी आधी से ज्यादा अर्निंग्स US क्लाइंट्स से करती हैं। इसी तरह, फॉर्च्यून 500 कंपनियों के GCCs भी फाइनेंस, बीमा, हेल्थकेयर, रिटेल और टेक सेक्टर में भारतीय टैलेंट पर निर्भर हैं। ऐसे में 25% सरचार्ज और डिडक्टिबिलिटी खत्म होने से US कंपनियों के लिए ऑफशोर सर्विसेज की लागत काफी बढ़ जाएगी, जिससे नए प्रोजेक्ट्स मिलना कम हो सकता है।
हालांकि भारतीय IT कंपनियां अब एशिया, जापान, ऑस्ट्रेलिया, नॉर्डिक्स और मिडिल ईस्ट में नए क्लाइंट्स तलाश रही हैं, लेकिन फिलहाल उनकी सबसे बड़ी निर्भरता अभी भी अमेरिका पर ही है।
भविष्य की बातें
HIRE एक्ट भारत के $283 बिलियन के टेक्नोलॉजी आउटसोर्सिंग इंडस्ट्री के लिए एक बड़ा खतरा है, क्योंकि यह इंडस्ट्री अपनी कमाई का 60% से अधिक हिस्सा अमेरिकी मार्केट से आता है। 2024-25 में भारत ने लगभग $224 बिलियन की IT सर्विसेज निर्यात कीं, जिससे पता चलता है कि दांव पर कितना कुछ लगा है।
यदि यह कानून लागू होता है, तो US कंपनियों के लिए ऑफशोर IT और बैक-ऑफिस काम की लागत काफी बढ़ जाएगी। नतीजतन, भारतीय IT और BPM प्रोवाइडर्स को अपनी US-फेसिंग डिलीवरी स्ट्रेटजी पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है।
इसी बीच, US राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी US कंपनियों को भारतीय फर्म्स को काम आउटसोर्स करने से रोकने पर विचार कर रहे हैं। US एक्टिविस्ट लौरा लूमर ने इस रुख का समर्थन करते हुए कहा है कि अब समय आ गया है कि “कॉल सेंटर्स को फिर से अमेरिकन बनाया जाए।
*आर्टिकल में शामिल कंपनियों के नाम केवल सूचना के उद्देश्य के लिए है। यह निवेश सलाह नहीं है।
*डिस्क्लेमर: तेजी मंदी डिस्क्लेमर