स्टॉक इन्वेस्टिंग के लिए रिस्क मैनेजमेंट: बेसिक एवं एडवांस तकनीकें

स्टॉक इन्वेस्टिंग के लिए रिस्क मैनेजमेंट: बेसिक एवं एडवांस तकनीकें
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निवेश करने से पहले, निवेशकों को सबसे पहले रिस्क मैनेजमेंट के बारे में सीखना चाहिए कि रिस्क कैसे मैनेज करते है क्योंकि स्टॉक मार्केट अपने वोलैटाइल स्वभाव के लिए जाना जाता है। इसलिए कुछ निवेशक इस मार्केट वोलैटिलिटी का फायदा उठाते हैं, जबकि कुछ इसके साथ संघर्ष करते हैं। उन लोगों के लिए जो स्टॉक मार्केट के रोलर-कोस्टर राइड के साथ संघर्ष कर रहे हैं, मार्केट एक्सपर्ट अक्सर उन्हें रिस्क को कम करने के एक तरीके के रूप में डायवर्सिफिकेशन करने की सलाह देते हैं। लेकिन क्या डायवर्सिफिकेशन ही एकमात्र समाधान है? जवाब है ‘नहीं’।

इसमें कोई शक नहीं है कि डायवर्सिफिकेशन काफी हद तक रिस्क को मैनेज में मदद कर सकता है, लेकिन यह केवल एक मात्र तरीका नहीं है। कुछ अन्य रणनीतियाँ और टूल्स भी है जिनकी मदद से रिस्क को मैनेज किया जा सकता है। 

हम कौन-कौन से टूल्स की बात कर रहे हैं? आज के इस आर्टिकल में समझेंगे। लेकिन उससे पहले, आइए समझें कि रिस्क मैनेजमेंट वास्तव में क्या है।

रिस्क मैनेजमेंट क्या है?

रिस्क मैनेजमेंट को समझने के लिए, पहले आपको समझना होगा कि रिस्क क्या है। स्टॉक मार्केट में, अगर किसी एक पोर्टफोलियो में प्रति रुपये का प्रॉफिट हो रहा है तो किसी दूसरे पोर्टफोलियो में वह लॉस में बदल जाता है। जब आप किसी स्टॉक पर आशावादी होते हो, तो कोई और उस पर नेगेटिव व्यू रखता है और इन दोनों लोगों में से, केवल एक ही सही होगा। सीधे शब्दों में कहें तो, स्टॉक की प्राइस ऊपर जा सकती है या नीचे जा सकती है। अगर किसी को प्रॉफिट हो रहा है, तो किसी को लॉस होगा। इसलिए, रिस्क रेशियो 50-50 है, और यही वह रिस्क है जिस की हम बात कर रहे हैं।

एक निवेशक के रूप में, लक्ष्य है कि इस 50% रिस्क रेशियो को कम से कम करना, जिसे हम रिस्क मैनेजमेंट कहते हैं। यह हमें याद दिलाता है एक प्रसिद्ध पुस्तक, ‘द डिसिप्लिन्ड ट्रेडर’ की एक कहावत के बारे में, जिसमें कहा गया है, ‘सफलता 80% मनी मैनेजमेंट और 20% स्ट्रैटेजी है’।

इसलिए हम कह सकते है, कि पैसे और रिस्क दोनों को मैनेज करना ही फाइनेंशियल सफलता की कुंजी है।

रिस्क को मैनेज करने के लिए, आपको पहले समझना होगा कि रिस्क कितने तरह के होते हैं। तो आइए, इन रिस्क के प्रकार को विस्तार से समझते है। 

रिस्क के प्रकार

निवेश करते समय आमतौर पर दो तरह के रिस्क होते हैं: अनसिस्टेमेटिक और सिस्टेमेटिक रिस्क।

अनसिस्टेमेटिक रिस्क

यह वह रिस्क है जो किसी व्यक्तिगत कंपनी या निवेश के लिए होता है। अनसिस्टेमेटिक रिस्क को समझने के लिए, आप खुद से पूछ सकते हैं कि आपको क्यों लगता हैं कि आपने जिस स्टॉक को खरीदा है, उसकी प्राइस बढ़ेगी। यह कंपनी की बेहतर संभावनाओं की वजह से या कंपनी लगातार प्रॉफिट कर रही है, या फिर उसके पास यूनिक कॉम्पिटिटिव एडवांटेज है। अगर किसी कंपनी में ये सभी पॉजिटिव क्वॉलिटी हैं, तो उसके स्टॉक प्राइस बढ़ने की संभावना है, जिसका मतलब है कि आपका निवेश भी समय के साथ बढ़ता जाएगा। 

लेकिन अगर इस कंपनी के स्टॉक प्राइस में बढ़ोतरी हो रही है तो इसका यह मतलब नहीं है कि इसके कॉम्पिटिटर्स या पूरा स्टॉक मार्केट भी बढ़ेगा। इसे हम अनसिस्टेमेटिक रिस्क कहते हैं। यह एक सीमित और संभालने योग्य रिस्क होता है क्योंकि यह किसी विशेष कंपनी या निवेश से जुड़ा होता है।

सिस्टेमेटिक रिस्क

दूसरी ओर, सिस्टेमेटिक रिस्क ऐसे इवेंट्स या फैक्टर्स होते हैं जो सभी को प्रभावित करते हैं। सिस्टेमेटिक रिस्क का एक प्रमुख उदाहरण COVID-19 क्रैश है। जब सिस्टेमेटिक रिस्क होता है, तो यह केवल एक ही कंपनी या इंडस्ट्री को नहीं, बल्कि सभी सेक्टर को प्रभावित करता है। सिस्टेमेटिक रिस्क आमतौर पर हमारे नियंत्रण के बाहर होता है और इसमें कुछ भी नहीं किया जा सकता है। 

सिस्टेमेटिक रिस्क को डायवर्सिफाई या संभाला नहीं जा सकता है। हालांकि, अनसिस्टेमेटिक रिस्क को डाइवर्सिफाइड और मैनेज भी किया जा सकता है। चलिए समझते है कैसे?

मौलिक रिस्क मैनेजमेंट तकनीकें

डायवर्सिफिकेशन

डायवर्सिफिकेशन का मतलब है अपने पैसे को सिर्फ एक ही स्टॉक में नहीं लगाना। सोचो, आपके पास कुछ पैसे हैं जो आप स्टॉक्स में निवेश करना चाहते है। लेकिन अगर आप आपने सभी पैसों को सिर्फ एक ही स्टॉक में लगा देते हो, तो आप बहुत बड़ा रिस्क ले रहे है, क्योंकि अगर वह कंपनी सही से परफॉर्म नहीं कर पाती है, तो आप अपना पैसा गँवा सकते है।

लेकिन, अगर आप अपने पैसे को कई अलग-अलग स्टॉक्स या सेक्टर में लगाते हो, तो आप अपने अनसिस्टेमेटिक रिस्क को कम कर रहे हो और आप देखोगे कि जब आप और स्टॉक्स जोड़ते हो, तो आपका रिस्क बहुत कम हो जाता है। हालांकि, एक सीमा के बाद, और ज्यादा स्टॉक्स जोड़ना रिस्क को ज्यादा कम नहीं करता है, बल्कि यह ओवर डायवर्सिफिकेशन का कारण बन सकता है।

इसका कारण यह है कि, विभिन्न स्टॉक्स के साथ भी, पूरे स्टॉक मार्केट से जुड़ा हुआ कुछ रिस्क होता है। हम इसे रेमैनिंग रिस्क कहते हैं। यह वह रिस्क है जो हमेशा रहता है, चाहे आपके पास कितने भी विभिन्न स्टॉक्स क्यों ना हों।

इसलिए, डायवर्सिफिकेशन आपके रिस्क को कम करने के लिए एक शानदार रणनीति है, लेकिन मार्केट में हमेशा कुछ रिस्क रहता ही है। 

हेजिंग

हेजिंग आपके स्टॉक्स के लिए एक सुरक्षा नेट जैसा है। जब आपके पास स्टॉक्स होते हैं, तो उनका प्राइस बढ़ सकता है या कम हो सकता है। लेकिन अगर आपको लगता है कि उसके प्राइस में गिरावट हो सकती है, तो आप हेजिंग का उपयोग कर सकते है।

यह ऐसे काम करता है जैसे अगर आपके पास कुछ स्टॉक्स है जिनकी प्राइस गिरती जा रही है , तो सिर्फ उम्मीद करने की बजाय, आप एक सुरक्षात्मक कदम उठा सकते है। आप उस स्टॉक का एक ‘पुट ऑप्शन’ खरीद सकते है यानि अभी आप स्टॉक की गिरावट पर दांव लगा रहे है। 

अगर स्टॉक प्राइस गिरती है, तो आप पुट ऑप्शन से पैसे कमा सकते है, जो आपके स्टॉक वैल्यू में नुकसान को कवर करता है, और आपको अपने स्टॉक्स एग्जिट करने की जरूरत नहीं होगी। लेकिन ध्यान रहे, ऑप्शन्स का उपयोग रिस्क के साथ होता है, इसलिए इस रणनीति का उपयोग करने से पहले आपको समझना होगा कि यह कैसे काम करता है।

स्टॉप लॉस और टारगेट

कई निवेशकों के पास अपने रिस्क को मैनेज करने के लिए अपने-अपने नियम होते हैं। हो सकता है उन्होंने एक स्टॉक में अधिकतम निवेश की सीमा तय की हो और साथ ही उन्होंने अधिकतम नुकसान की सीमा तय कर ली हो। अगर इन्वेस्टमेंट गिरने लगता है, तो वह ‘स्टॉप लॉस’ का उपयोग करते हैं ताकि नुकसान को उनके निवेश के स्पेसिफिक प्रतिशत तक ही सीमित किया जा सके। तो, यहाँ आप स्टॉप लॉस की मदद से गिरावट के समय अपने आप को प्रोटेक्ट कर सकते है। 

दूसरा, आपको अपने प्रॉफिट को सिक्योर करना चाहिए और इसलिए हमेशा एक टारगेट तय करें। इसे करने के लिए, निवेशक ‘गुड टिल ट्रिगर्ड’ (GTT) ऑर्डर का उपयोग कर सकते हैं। यह ऑर्डर ऑटोमैटिक रूप से स्टॉक को बेच देता है जब यह आपके द्वारा तय किए टारगेट प्राइस तक पहुंचता है, सुनिश्चित करते हुए कि आप अपने प्रॉफिट को बुक कर रहे है। 

एडवांस रिस्क मैनेजमेंट तकनीकें

स्टॉक का बीटा समझना

बीटा आपको बताता है कि वह स्टॉक किस तरह से मूव करेगा, जब पूरा स्टॉक मार्केट मूव करता है। यदि किसी स्टॉक का बीटा हाई है, तो यह थोड़ा सा रोलरकोस्टर के जैसा है, जिसका मतलब है कि जब बाजार ऊपर जाता है, तो यह बहुत ऊपर जाता है, लेकिन यह काफी गिर सकता है अगर मार्केट गिरता है। इसलिए अगर बीटा कम है, तो यह एक शांत नाव की तरह है और कम रिस्क लेने वाले निवेशक इसके बारे में विचार कर सकते है जबकि हाई रिस्क लेने वाले निवेशक हाई बीटा स्टॉक्स का चुनाव कर सकते है। 

इसे बेहतर समझने के लिए, चलो मान लो, आपके पास स्टॉक ए है जिसका बीटा 1.5 है और स्टॉक बी है जिसका बीटा 0.8 है। अगर मार्केट 10% बढ़ता है, तो स्टॉक ए तुरंत ही 15% तक बढ़ सकता है, लेकिन स्टॉक बी सिर्फ 8% तक ही बढ़ सकता है। इसलिए, बीटा को समझने से आपको पता चलता है कि वह स्टॉक मार्केट के साथ कैसे मूव करता है। 

स्टॉक का मूल्यांकन: वैल्यू एट रिस्क (VAR)

वैल्यू एट रिस्क (VAR) एक बेहतर निवेश रिस्क मैनेजमेंट टूल है। यह आपको संभावित नुकसान का मूल्यांकन करने और उनके लिए तैयारी करने में मदद करता है। VAR निश्चित आत्म-विश्वास स्तर के भीतर होने वाली हानियों का अनुमान करके आपको बताता है कि आपके निवेश का सबसे बुरा हालात कैसा हो सकता है। 

उदाहरण के लिए, यदि किसी स्टॉक का VAR किसी विशेष स्तर पर 5% है, तो इसका मतलब है कि आपके नुकसान का 5% चांस है हालंकि यह थोड़ा कम या उससे अधिक भी हो सकता है।

सरल शब्दों में, VAR एक रिस्क मापक टूल है, जो आपको संभावित नुकसान की जानकारी देता है। यह निवेशकों के लिए एक महत्वपूर्ण टूल है, जो उन्हें उचित निर्णय लेने और उनके पोर्टफोलियो को सकारात्मक रूप से मैनेज करने में मदद करता है।

निष्कर्ष में, लंबी अवधि के लिए स्टॉक निवेश फाइनेंसियल ग्रोथ की राह खोल सकता है, लेकिन यह आवश्यक है कि आप स्वाभाविक जोखिमों को प्रभावी ढंग से समझें। फिर चाहे आप डायवर्सिफिकेशन, हेजिंग, या बीटा विश्लेषण और VAR जैसी एडवांस तकनीकों का उपयोग कर रहे हों, ये रणनीतियां आपको रिस्क के बारे में समझने और कम करने में मदद कर सकती है। लेकिन निवेश हमेशा रिस्क के साथ आता है, इसलिए अपनी फाइनेंसियल स्थिति और लक्ष्यो को ध्यान में रखते है उचित निर्णय ले। 

*यह आर्टिकल केवल जानकारी के उद्देश्य के लिए है। यह कोई निवेश सलाह नहीं है।

*डिस्क्लेमर: तेजी मंदी डिस्क्लेमर

नोट: यह आर्टिकल मूल रूप से तेजी मंदी द्वारा ET मार्केट्स के लिए लिखा गया था।

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