शेयर बाजार में हमेशा तेजी और गिरावत का माहौल रहता है। इसलिए इसे वोलैटिलिटी के लिए जाना जाता है। लेकिन क्या होगा अगर ये वोलैटिलिटी नियंत्रण से बाहर चली जाए और शेयरों में अनियमित मूवमेंट हो – और अनजाने में आपको लाभ या हानि हो जाए? सेबी ने इस मूवमेंट को नियंत्रण में रखने के लिए कुछ सिस्टम बनाए हैं, और वो है स्टॉक पर प्राइस सर्किट लगाना।
सर्किट स्टॉक प्राइस में उतार-चढ़ाव को एक अधिकतम सीमा के बाहर नहीं जाने देता है, जिससे निवेशकों को अचानक और अनजाने में होनी वाली भारी मूवमेंट से बचाया जा सके।
ऐसा भी होता है कि कोई स्टॉक किसी नकारात्मक खबर के कारण ज्यादा गिर जाता है और लोग डर के कारण हुई गिरावट को देखते हुए अपने स्टॉक को बेच देते हैं। ऐसे में लोअर सर्किट मदद करता है। लोअर सर्किट स्टॉक की कीमत को एक निश्चित प्रतिशत पर गिरावत को उस दिन के लिए रोक देता है। अगर किसी स्टॉक का लोअर सर्किट 20% है, तो उस दिन के ट्रेडिंग सेशन में स्टॉक की कीमत 20% से ज़्यादा न तो बढ़ सकती है और न ही गिर सकती है।
लोअर सर्किट क्या होता है?
लोअर सर्किट को इसलिए रखा जाता ताकि किसी स्टॉक की कीमत एक पहले से तय किए गए प्रतिशत से ज्यादा नहीं गिरे। लोअर सर्किट एक विशेष ट्रेडिंग सत्र में किसी स्टॉक की सबसे निचली ट्रेडेड प्राइस को निर्धारित करता है। इस स्थिति में जब तक कोई नया खरीदार नहीं आता है, स्टॉक का लोअर सर्किट फ्रीज़ रहेगा।
जब कोई स्टॉक अपने लोअर सर्किट को हिट करता है, वहां केवल सेलर्स होते हैं और कोई खरीदार नहीं होता है, क्योंकि स्टॉक पहले से ही लोअर सर्किट पर ट्रेड हो रहा है, इसलिए इस दौरान कोई भी अपने शेयर्स नहीं बेच सकता है। हालांकि, लोअर सर्किट के दौरान कोई भी स्टॉक खरीद सकता है क्योंकि लोअर सर्किट सिर्फ बेचने पर पाबंदी लगाता है खरीदने पर नहीं।
एक उदाहरण की मदद से समझते है,
7 दिसंबर 2023, को एक नकारात्मक न्यूज़ की वजह से पेटीएम के शेयर में 20% की गिरावट देखी गयी, यानि उस दिन पेटीएम ने लोअर सर्किट पर पहुंच गया, हालंकि कुछ समय बाद वह अपने लोअर सर्किट से थोड़ा ऊपर आकर क्लॉज हुआ। अभी सोचिए, अगर यह लोअर सर्किट का सिस्टम नहीं होता तो शायद पेटीएम में और भी गिरावट हो सकती थी, लेकिन सिर्फ 20% तक ही गिरावट हुई, क्योंकि SEBI ने इस स्टॉक की सर्किट लिमिट 20% निर्धारित की थी।
स्टॉक में लोअर सर्किट क्यों लगता है?
स्टॉक में लोअर सर्किट लगने के कई कारण हो सकते हैं, ये हो सकता है कि पूरी मार्केट में या किसी इंडस्ट्री में सभी लोग स्टॉक बेच रहे हो, जिसे हम ‘इंडेक्स-वाइड सेलिंग’ या ‘इंडस्ट्री-वाइड सेलिंग’ कहते हैं।
इसका एक कारण यह हो सकता है कि किसी खास स्टॉक के बारे में कोई नकारात्मक खबर आ जाए, जैसे कि वरिष्ठ प्रमुख मैनेजमेंट कर्मियों को इस्तीफा देना पड़े या कंपनी के लिए एक महत्वपूर्ण सौदे में किसी गड़बड़ी की खबर आना।
ये भी हो सकता है कि बड़े निवेशक और एसेट मैनेजमेंट कंपनियां (AMC) अपना पैसा निकाल रहे हैं या फिर FIIs और DIIs कुछ ब्लॉक डील कर रहे हैं। ये भी हो सकता है कि कोई ऑपरेटर गेम चल रहा हो। इसलिए कोई भी कारण हो सकता है, और जब तक आप गिरावत के पीछे कारण जानेंगे, तब तक काफी नुकसान हो चुका होता है।
लोअर सर्किट और सर्किट लिमिट कौन तय करता है?
ऊपर के उदाहरण में हमने देखा कि पेटीएम का लोअर सर्किट 20% पर सेट है। लेकिन ये सभी स्टॉक के लिए एक समान नहीं होता है। स्टॉक के लिए न्यूनतम सीमा सेबी द्वारा उसके पिछले दिन के क्लोजिंग प्राइस के आधार पर तय की जाती है।
अलग-अलग शेयरों के लिए लोअर सर्किट 2-20% के बीच होती है, जिसे सेबी द्वारा शेयरों का वॉल्यूम, लिक्विडिटी, और स्टॉक की केटेगरी को ध्यान में रखकर निर्धारित किया जाता है। ये सर्किट लेवल परमानेंट नहीं होते है और इन्हे समय-समय पर रिव्यु किया जा सकता है। लिक्विड स्टॉक के लिए सर्किट बढ़ाया जा सकता है और जिन शेयरों में लिक्विडिटी कम है उनके लिए सर्किट को कम रखा जा सकता है।
आप हर एक स्टॉक के लोअर सर्किट की जानकारी NSE की आधिकारिक वेबसाइट पर ‘प्राइस इनफार्मेशन’ मेनू में जाकर देख सकते हैं। इसके साथ ही, अलग-अलग ब्रोकर्स भी हैं यह जानकारी प्रदान करते हैं।
क्या आप स्टॉक को लोअर सर्किट में बेच सकते हैं?
नहीं, क्योंकि अगर ऐसा होता तो इससे सर्किट लगने की अवधारणा का कोई मतलब ही नहीं रहता, इसका उद्देश्य सिर्फ स्टॉक में गिरावट को रोकना है। लोअर सर्किट पर सेलर्स ही होते हैं और कोई खरीदार नहीं होता है, इस प्रकार सेल ऑर्डर एक्सीक्यूट नहीं होंगे क्योंकि इस कीमत पर खरीदने के लिए कोई भी खरीदार नहीं है।
दिन भर, वह स्टॉक लोअर सर्किट में फ्रीज़ रहेगा जब तक कि कोई नया खरीददार न आ जाए।
इस तरह की स्थितियों में, इंट्राडे ट्रेडर दुविधा में रहते हैं क्योंकि इंट्राडे ट्रेडिंग में आपको उस दिन के लिए ट्रेडिंग सत्र बंद होने से पहले अपनी पोजिशन को स्क्वेयर ऑफ करना होता है। हालांकि, स्टॉक लोअर सर्किट में क्लॉज होने के कारण, वह अपनी पोजिशन एग्जिट नहीं कर सकते है। इस तरह की स्थिति में इंट्राडे पोजिशनें स्वतंत्र रूप से डिलीवरी में बदल जाएंगी, और ट्रेडर को अपने ट्रेडिंग खाते में उन पोजिशनों की डिलीवरी लेने के लिए पर्याप्त शेष राशि बनाए रखने की आवश्यकता होगी, जो अगले ट्रेडिंग सत्र में होगा। यदि ट्रेडर ऐसा नहीं करता है, तो ब्रोकर अगले ट्रेडिंग सत्र में ट्रेडिंग अकाउंट में कम राशि होने के कारण उन स्टॉक्स को एग्जिट कर देगा।
यदि यह समझना कठिन लगा हो, तो इसे हम एक उदाहरण की मदद से समझते है,
20 दिसंबर, 2023 को, सुजलॉन एनर्जी 38 रुपये पर ओपन हुआ और यह अपने 5% के लोअर सर्किट 35.65 रुपये पर क्लॉज हुआ।
माना, मिस्टर A ने सुजलॉन एनर्जी के 500 शेयर्स इंट्राडे में 38 रुपये प्रति शेयर पर खरीदे।
जब शेयर अपने लोअर सर्किट में क्लोज हो गया, तब मिस्टर A दिन के अंत में अपनी पोजीशन्स स्क्वेयर-ऑफ़ करने में असमर्थ थे। अब, मिस्टर A को अगले दिन अपने ट्रेडिंग खाते में फुल ट्रेडेड वैल्यू यानि, 19,000 रुपये (38 रुपये प्रति शेयर, 500 शेयर्स) का बैलेंस रखना होगा। अन्यथा, ब्रोकर शेयर एग्जिट कर देगा, जिसमें ब्रोकर को शॉर्टफॉल फीस भी देनी होगी और इस तरह मिस्टर A को नुकसान उठाना पड़ेगा।
लोअर सर्किट में फंसने से कैसे बचें?
यह तो पूरी तरह से स्पष्ट हो गया है कई जब स्टॉक लोअर सर्किट में होता है, तो आप अपनी पोजीशन को एग्जिट नहीं कर सकते है। हालांकि, आप एक सरल मार्केट प्रैक्टिस का सहारा ले सकते हैं जो आपको स्टॉक लोअर स्तर को छूने से पहले आपकी पोजिशन से निकालने में मदद करेगा।
स्टॉप लॉस का उपयोग लोअर सर्किट प्राइस को छूने से पहले पोजिशन क्लोज करने के लिए किया जा सकता है। इसलिए आप ट्रेड के दौरान लोअर सर्किट प्राइस से ऊपर अपना स्टॉप लॉस रखें और फिर लोअर सर्किट में फंसने का सवाल ही नहीं उठेगा।
उदाहरण के लिए, आपने एक्स कंपनी के शेयर्स 100 रुपये में खरीदे हैं, जहां स्टॉक का लोअर सर्किट 88 रुपये पर है। यहां, लोअर सर्किट में फंसने से बचने के लिए, आप 88 रुपये से ऊपर किसी भी प्राइस पर स्टॉप लॉस लगा सकते हैं।
क्या हम उन शेयरों को खरीद सकते हैं जो लोअर सर्किट में हैं?
हाँ, लोअर सर्किट पर खरीदारी नहीं रुकती है, बल्कि वास्तव में, वह निवेशक जो किसी स्टॉक उच्च वैल्यूएशन के कारण गुणवत्ता शेयरों को खरीदने में असमर्थ रहे हैं, वह अभी लोअर स्तर पर स्टॉक खरीद सकते हैं। लोअर सर्किट पर बहुत से लोग बेचने के लिए ऑर्डर लगाए हुए होते है इसलिए खरीदार का ऑर्डर तुरंत ही एक्सीक्यूट हो जाएगा।
निष्कर्ष
लोअर सर्किट एक टूल है जो SEBI द्वारा स्टॉक में किसी असामान्य गिरावट को रोकने के लिए लगाया गया है। लोअर सर्किट सुनिश्चित करता है कि ट्रेडिंग सत्र के दौरान और अधिक गिरावट न हो, जब सिर्फ स्टॉक में सेलर्स हो और खरीदार कोई न हो।
लोअर सर्किट स्तर SEBI द्वारा लिक्विडिटी और वॉल्यूम्स के आधार तय किए जाते हैं और इनका समय-समय पर रिव्यु भी किया जाता हैं। हालांकि, लोअर सर्किट लगना कभी भी अच्छा नहीं होता है, निवेशकों को यह समझना चाहिए कि एक बुरा दिन स्टॉक द्वारा अतीत में किए गए अच्छे परफॉरमेंस को खत्म नहीं कर देता है। लोअर सर्किट का मतलब यह नहीं है कि कंपनी के फंडामेंटल्स के साथ कुछ गंभीर रूप से गलत हुआ है। इसे एक दिन की बिकवाली के रूप में देखा जाना चाहिए और ज्यादातर मामलों में, आप आगामी ट्रेडिंग सत्रों में खरीदार आते हुए देखेंगे।
*आर्टिकल केवल सूचना के उद्देश्य के लिए है। यह निवेश सलाह नहीं है।
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