शेयर मार्केट में निवेश केवल आंकड़ों का खेल नहीं है बल्कि यह भावनाओं का भी प्रतिबिंब है। अक्सर निवेशक यह मानते हैं कि वे पूरी तरह सही निर्णय लेते हैं, लेकिन वास्तविकता में उनके निर्णय भावनाओं से प्रेरित होते हैं। चाहे डर हो, लालच हो या दूसरों के फैसलों से प्रभावित होने की प्रवृत्ति, यही इमोशनल इन्वेस्टिंग कहलाती है। भारत जैसे तेजी से विकसित हो रहे मार्केट में, जहां रिटेल निवेशक लगातार बढ़ रहे हैं, यह ट्रेंड और भी स्पष्ट दिखाई देता है।
आइए समझते है कि इमोशनल इन्वेस्टिंग क्या है और कैसे यह आपके पोर्टफोलियो को नुकसान पहुंचाती है साथ ही समझेंगे कि इमोशनल इन्वेस्टिंग से कैसे बचे।
इमोशनल इन्वेस्टिंग क्या है?
जब कोई निवेशक डर, लालच, उत्साह या घबराहट जैसी भावनाओं के प्रभाव में निवेश संबंधी निर्णय लेता है, तो उसे इमोशनल इन्वेस्टिंग कहा जाता है। उदाहरण के लिए, जब मार्केट चढ़ता है तो निवेशक सकारात्मक सेंटीमेंट में अधिक शेयर खरीद लेते हैं, और जब मार्केट गिरता है तो घबराकर बेच देते हैं।
भावनाएं इंसान के व्यवहार का स्वाभाविक हिस्सा हैं, लेकिन अगर इन्हीं भावनाओं के आधार पर वित्तीय निर्णय लिए जाएं, तो यह अक्सर जल्दबाज़ी, बार-बार खरीद-बिक्री और कमजोर निवेश परिणामों की ओर ले जाता है। इस तरह निवेशक लॉन्गटर्म रणनीति को छोड़कर शॉर्टटर्म लाभ के पीछे भागने लगते हैं या गलत समय पर मार्केट में एंट्री और एग्जिट करते हैं।
निवेश में आम इन्वेस्टर बायस जिन्हें समझना जरूरी है
निवेश करते समय कई बार हमारी सोच और भावनाएं निर्णयों को प्रभावित करती हैं। इन्हें बिहेवियरल बायसेस कहा जाता है। ये गलत निर्णय और कमजोर रिटर्न की वजह बन सकते हैं। आइए इन्हें समझें –
Optimism Bias (अति-आशावाद): निवेशक यह सोचते हैं कि उनके साथ नुकसान की संभावना कम है और वे मार्केट को हरा सकते हैं। यह अति आत्मविश्वास उन्हें बिना डेटा के जोखिम भरे निर्णय लेने पर मजबूर करता है।
Familiarity Bias (परिचय आधारित झुकाव): निवेशक केवल उन्हीं कंपनियों या सेक्टर्स में पैसा लगाते हैं जिन्हें वे जानते हैं। इससे पोर्टफोलियो में डायवर्सिफिकेशन नहीं रहता और जोखिम बढ़ता है।
Anchoring Bias (पुरानी जानकारी पर अटके रहना): निवेशक पुरानी जानकारी या किसी पुराने प्राइस टारगेट से चिपके रहते हैं, भले ही नई परिस्थितियां बदल चुकी हों। इससे वे नुकसान वाले स्टॉक्स पकड़े रहते हैं।
Loss Aversion (नुकसान का डर): नुकसान के डर से निवेशक सही समय पर कार्रवाई नहीं कर पाते। वे नुकसान वाले स्टॉक्स को पकड़े रखते हैं और अच्छे स्टॉक्स जल्दी बेच देते हैं।
Herd Mentality (भीड़ का अनुसरण): जब निवेशक दूसरों की देखा-देखी निवेश करते हैं, तो वे भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं। यह प्रवृत्ति उन्हें मार्केट के पीक पर खरीदने और गिरावट में बेचने पर मजबूर करती है।
2020 का क्रैश: जब डर ने मार्केट की दिशा बदल दी
दिसंबर 2019 के दौरान, दुनिया में अचानक आए कोविड-19 महामारी ने झकझोर कर रख दिया। सरकारों ने वायरस को रोकने के लिए लॉकडाउन लगाए, जिससे इंडस्ट्रीज में डर और अनिश्चितता फैल गई और भारी आर्थिक नुकसान की आशंका बढ़ गई। इसके परिणामस्वरूप मार्च 2020 में ग्लोबल स्टॉक मार्केट क्रैश देखने को मिला।
9 मार्च 2020 को डाउ जोन्स ने अपनी सबसे बड़ी एक-दिन की गिरावट दर्ज की, जब यह 7.79% गिर गया। यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। 12 मार्च को 9.9% और फिर 16 मार्च को 12.9% नीचे गिर गया। इसका असर सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं रहा। भारत भी इससे बुरी तरह प्रभावित हुआ। BSE का Sensex 8.18% गिर गया। 9 मार्च 2020 को मार्केट खुलते ही ज्यादातर शेयर अपने लोअर सर्किट पर पहुंच गए, जिससे निवेशकों में घबराहट फैल गई और इसी दिन NSE का निफ्टी भी 8.30% नीचे गिरा।
इस दौर के दौरान अधिकांश निवेशकों ने डर के चलते बड़े स्तर पर स्टॉक्स बेच दिए, जिससे मार्केट में सप्लाई बढ़ी और स्टॉक प्राइस तेजी से गिरे। ऐसे समय में लंबी अवधि के निवेशकों ने मार्केट से बाहर न निकलने की स्ट्रेटजी अपनाई और मार्केट रिकवरी का इंतजार किया। फिर अर्थव्यवस्था और मार्केट दोनों ने वापसी की और एक बड़ी बुल रन की शुरुआत हुई। नवंबर 2020 तक सेंसेक्स फिर जनवरी 2020 के ऑल-टाइम स्तर पर पहुंच गया।
यह इमोशनल इन्वेस्टिंग के सबसे बेहतरीन उदाहरण में से एक जो साबित करता है कि भावनाओं में बहकर निर्णय लेना न सिर्फ नुकसान का कारण बनता है बल्कि वेल्थ क्रिएशन का अवसर भी गवाता है।
हर्ड मेंटैलिटी: भीड़ के साथ चलने की गलती
हर्ड मेंटैलिटी (Herd Mentality) का अर्थ है जब निवेशक अपनी रिसर्च किए बिना केवल इसलिए निवेश करते हैं क्योंकि बाकी लोग ऐसा कर रहे हैं। भारतीय मार्केट में इसका उदाहरण IPO में निवेश के दौरान देखा गया, जब लगभग हर नए इश्यू में निवेशक भाग लेने लगे। ETIG की रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी 2024 से मई 2025 के बीच लिस्ट हुए 101 मेनबोर्ड IPO में से करीब दो-तिहाई IPO अब अपने लिस्टिंग प्राइस से नीचे ट्रेड कर रहे हैं।
यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि भीड़ के साथ चलना हमेशा मुनाफे की गारंटी नहीं देता। सही निवेश वह है जो निवेशक की जोखिम प्रोफाइल, लक्ष्यों और विश्लेषण पर आधारित हो, न कि भावनाओं पर।
FOMO इन्वेस्टिंग: कुछ छूट न जाए, इस डर का जाल
FOMO यानी फियर ऑफ़ मिसिंग आउट तब होता है जब निवेशक किसी अवसर को चूक जाने के डर से जल्दबाज़ी में निवेश कर बैठते हैं। सोशल मीडिया और ऑनलाइन चर्चाएं इस ट्रेंड को और बढ़ाती हैं।
US में यह ट्रेंड 1995-2000 की टेक रैली में देखा गया जब कई निवेशकों ने केवल दूसरों के मुनाफे देखकर टेक स्टॉक्स में निवेश किया। लेकिन बाद 2021 में वैल्यूएशन गिरने पर उन्हें भारी नुकसान हुआ। FOMO ट्रेडिंग निवेशक को रणनीतिक निवेशक के बजाय ‘reactionary trader’ बना देती है, जिससे न सिर्फ लक्ष्यों पर असर पड़ता है, बल्कि वर्षो की जमा पूंजी खोने का जोख़िम भी बढ़ जाता है।
इमोशनल इन्वेस्टिंग से कैसे बचें?
भावनात्मक निवेश से बचना आसान नहीं, लेकिन अनुशासन, सही समझ और ठोस योजना से इसे नियंत्रित किया जा सकता है। सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि मार्केट साइकिल सामान्य हैं यहां कभी तेज़ी होगी, तो कभी गिरावट। हर उतार-चढ़ाव में घबराने या अति उत्साहित होने के बजाय यह स्वीकार करें कि वोलैटिलिटी इक्विटी निवेश का हिस्सा है। बार-बार मार्केट टाइमिंग की कोशिश या शॉर्ट-टर्म ट्रेंड्स के आधार पर पोर्टफोलियो बदलना केवल नुकसान बढ़ाता है।
लॉन्गटर्म में सफलता के लिए निवेश को डाइवर्सिफाइड बनाना जरूरी है अलग-अलग सेक्टर्स, एसेट क्लासेस और मार्केट कैप स्टॉक्स में निवेश करें। किसी एक स्टॉक या फंड से भावनात्मक जुड़ाव न रखें, बल्कि डेटा और प्रदर्शन के आधार पर निर्णय लें।
निष्कर्ष
शेयर मार्केट में डर और लालच दो सबसे शक्तिशाली भावनाएं हैं और इन्हें नियंत्रित करना ही सफल निवेशक की असली पहचान है। 2020 का मार्केट क्रैश हमें यह सिखाती है कि भावनाओं पर आधारित निर्णय अक्सर घाटे में खत्म होते हैं। सफल निवेश वही है जो फैक्ट्स, रिसर्च, अनुशासन और धैर्य पर आधारित हो। जब निवेशक भावनाओं से ऊपर उठकर सोचते हैं, तभी उनका पोर्टफोलियो वास्तव में उनके नियंत्रण में आता है और लॉन्गटर्म लक्ष्य को पाना आसान हो जाता है।
*यह आर्टिकल केवल जानकारी के उद्देश्य के लिए है। यह कोई निवेश सलाह नहीं है।
*डिस्क्लेमर: तेजी मंदी डिस्क्लेमर