ग्रीन हाइड्रोजन को पानी के इलेक्ट्रोलिसिस से उत्पादित किया जाता है, जिसमें रिन्यूएबल एनर्जी स्रोत, जैसे सोलर और विंड एनर्जी का उपयोग होता है। भारतीय एनर्जी सेक्टर में लगातार बदलाव हो रहे हैं, पहले सिर्फ हम ट्रेडिशनल एनर्जी सोर्सेज पर निर्भर थे, लेकिन वर्तमान में भारत रिन्यूएबल एनर्जी की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है और हाइड्रोजन एनर्जी का इसमें अहम योगदान बनता जा रहा है।
यह आर्टिकल भारत में हाइड्रोजन एनर्जी सेक्टर की मौजूदा स्थिति, ग्रोथ की दिशा, चुनौतियां और इसके भविष्य के बारे में गहराई से चर्चा करेंगे।
भारत में हाइड्रोजन एनर्जी की मौजूदा स्थिति
भारत अपनी 40% से अधिक प्राथमिक ऊर्जा जरूरतों को आयात के जरिए पूरा करता है, जिस पर हर साल 90 बिलियन अमेरिकी डॉलर से ज्यादा खर्च करते हैं। ग्रीन हाइड्रोजन को बढ़ावा देकर, भारत न केवल अपनी घरेलू ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने की दिशा में काम कर रहा है, बल्कि ग्लोबल हाइड्रोजन मार्केट में एक प्रमुख प्लेयर बनने का लक्ष्य भी रखता है।
ग्रीन हाइड्रोजन टेक्नोलॉजी दुनियाभर में इमर्जिंग टेक्नोलॉजी में से एक है, और भारत ने 2030 तक इसका उत्पादन वर्तमान के कुछ किलो-टन से बढ़ाकर 5 मिलियन टन प्रति वर्ष (MTPA) तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। वर्तमान में भारत लगभग 6 मिलियन टन प्रति वर्ष हाइड्रोजन का उत्पादन करता है, जो ज्यादातर प्राकृतिक गैस के स्टीम रिफॉर्मिंग (ग्रे हाइड्रोजन) से होता है और इसका उपयोग मुख्य रूप से उर्वरक उत्पादन और ऑइल रिफाइनिंग में होता है।
राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन
2023 में शुरू किए गए इस मिशन का उद्देश्य ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन को बढ़ावा देना और एनर्जी आत्मनिर्भरता हासिल करना है और ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के तहत, सरकार ने 19,744 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। इसमें से 17,490 करोड़ रुपये ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन के लिए और 1,466 करोड़ रुपये पायलट प्रोजेक्ट्स के लिए हैं।
इसके साथ ही, भारत ने ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन के लिए 2030 तक 125 GW रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा है। साथ ही, इस मिशन से 6 लाख नौकरियों के सृजन की संभावना है और ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन से भारत को 1 लाख करोड़ रुपये का एनर्जी आयात बचाने की उम्मीद है।
ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन में चुनौतियां
ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन को अपनाने में कई चुनौतियां सामने आ रही हैं।
उत्पादन लागत: ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन में इलेक्ट्रोलाइजर उत्पादन की लागत कुल लगात की 30-50 प्रतिशत तक हैं और इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण में आवश्यक घटक, जैसे मेम्ब्रेन, अभी भी आयात पर निर्भर हैं। इसके अलावा, प्लैटिनम और इरिडियम जैसे खनिज भी आयात किए जाते है, जो इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण में उपयोग किए जाते हैं।
पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर: उत्पादन, रिज़र्व और डिस्ट्रीब्यूशन का मौजूदा सिस्टम पूरी तरह विकसित नहीं है। ग्रीन हाइड्रोजन के लिए रिन्यूएबल एनर्जी स्रोत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनसे 24 घंटे ऊर्जा की सप्लाई संभव नहीं है। मौजूदा बैटरी तकनीक भी आर्थिक रूप से सस्ती नहीं है, जिससे निरंतर हाइड्रोजन उत्पादन मुश्किल होता है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा: भारत को अमेरिका और चीन जैसे देशों से मुकाबला करना होगा, जहां सरकारें हाइड्रोजन उत्पादन में भारी सब्सिडी देती हैं। इसके अलावा, जर्मनी जैसे देशों के कड़े व्यापार मानकों के चलते भारतीय हाइड्रोजन को ग्लोबल मार्केट्स में पैठ बनाने में मुश्किल होती है।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
ग्रीन हाइड्रोजन भारत के स्वच्छ एनर्जी भविष्य का एक अहम हिस्सा बन रहा है, और अच्छी बात यह है कि इसमें निवेश के लिए कई बेहतरीन कंपनियां हैं। ग्रीन हाइड्रोजन का उपयोग इंडस्ट्रीज में कार्बन उत्सर्जन को कम करने और एनर्जी को अधिक पर्यावरण अनुकूल बनाने के लिए किया जा रहा है।
भारत में रिलायंस इंडस्ट्रीज, जिंदल स्टेनलेस लिमिटेड, अडानी ग्रीन एनर्जी, JSW एनर्जी, NTPC लिमिटेड, और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन जैसी कंपनियां ग्रीन हाइड्रोजन क्षेत्र में निवेश कर रही हैं। यह कंपनियां ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन और इसके उपयोग के लिए आधुनिक तकनीकों भारी निवेश कर रही है।
हाइड्रोजन एनर्जी का भविष्य
IBEF के अनुसार, मार्केट रिसर्च फ्यूचर का कहना है कि 2032 तक भारतीय ग्रीन हाइड्रोजन मार्केट 12.95 US बिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है। हाइड्रोजन एनर्जी न केवल भारत के लिए एनर्जी सुरक्षा सुनिश्चित करेगा, बल्कि यह देश के विकास के नए आयाम भी खोलेगा।

भारतीय ग्रीन हाइड्रोजन मार्केट 2022 के 4.53 से 2032 तक लगभग लगभग तीन गुना होने की उम्मीद है।
दुनियाभर में हाइड्रोजन-आधारित ऊर्जा का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। IBEF के अनुसार, McKinsey की ग्लोबल एनर्जी पर्सपेक्टिव 2023 रिपोर्ट का कहना है कि 2050 तक हाइड्रोजन की कुल डिमांड का 73-100% हिस्सा स्वच्छ हाइड्रोजन से पूरा हो सकता है।
इसके साथ ही, 2030 तक ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन में कई देश बड़ा योगदान देने की योजना बना रहे हैं। अमेरिका ने सबसे अधिक 10 मिलियन टन प्रति वर्ष का लक्ष्य रखा है। इसके बाद भारत का लक्ष्य 5 मिलियन टन, दक्षिण कोरिया ने 4.80 मिलियन टन और जापान ने 3 मिलियन टन प्रति वर्ष ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया है।
*आर्टिकल में शामिल कंपनियों के नाम केवल सूचना के उद्देश्य के लिए है। यह निवेश सलाह नहीं है।
*डिस्क्लेमर: तेजी मंदी डिस्क्लेमर