भारत अपनी एनर्जी सुरक्षा को मजबूत करने और आयात निर्भरता कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाने जा रहा है। देश अपनी विशाल कोयला संपदा को अधिक कुशल और स्वच्छ तरीके से उपयोग करने की ओर बढ़ रहा है। कोयला गैसीकरण प्रोजेक्ट्स को बढ़ावा देने के लिए सरकार ₹37,500 करोड़ के इंसेंटिव स्कीम को मंजूरी देने की तैयारी में है, जो स्वदेशी संसाधनों से ईंधन और रसायनों का उत्पादन बढ़ाएगा।
आइए कोयला गैसीकरण के इस महत्वपूर्ण पहल को विस्तारपूर्वक समझें और जानें क्या निवेशकों के लिए मायने रखता है।
क्या है मामला?
केंद्र सरकार जल्द ही कोयला और लिग्नाइट गैसीकरण प्रोजेक्ट्स को बढ़ावा देने के लिए ₹37,500 करोड़ की वित्तीय सहायता वाली योजना को मंजूरी दे सकती है। कोयला मंत्रालय ने पहले ही कैबिनेट नोट तैयार कर लिया है। इस स्कीम का उद्देश्य सतही कोयला और लिग्नाइट गैसीकरण प्रोजेक्ट्स को तेजी से आगे बढ़ाना है।
प्रति प्रोजेक्ट अधिकतम ₹3,000 करोड़ की वित्तीय सहायता दी जाएगी। यह एक यूनिफाइड स्कीम है जिसमें कोई अलग कैटेगरी नहीं है। पहले की स्कीम में प्राइवेट सेक्टर के लिए अधिकतम ₹1,000 करोड़ और PSU के लिए ₹1,350 करोड़ तक की सहायता थी।
इस पहल से LNG, यूरिया, अमोनियम नाइट्रेट, अमोनिया, कोकिंग कोल (DRI के माध्यम से), मेथनॉल और DME जैसे महत्वपूर्ण गुड्स पर आयात निर्भरता कम होगी।
भारत की कोयला संपदा और गैसीकरण की जरूरत
भारत के पास 400 बिलियन टन कोयला रिज़र्व हैं, जो दुनिया में सबसे बड़े में से एक है। कोयला देश की एनर्जी मिक्स का 55% से अधिक हिस्सा रखता है और बिजली उत्पादन में लगभग 74% योगदान देता है। वार्षिक कोयला डिमांड पहले ही एक बिलियन टन के करीब पहुंच चुकी है।
कोयला गैसीकरण प्रक्रिया में कोयले को सीधे जलाने के बजाय नियंत्रित वातावरण में उच्च तापमान पर हीट किया जाता है, जिसमें सीमित ऑक्सीजन और स्टीम का उपयोग होता है। इससे सिन्गास (syngas) बनता है, जो कार्बन मोनोऑक्साइड, हाइड्रोजन और अन्य हाइड्रोकार्बन्स का मिश्रण है। यह सिन्गास मेथनॉल, अमोनिया, यूरिया, पेट्रोकेमिकल्स और सिंथेटिक नेचुरल गैस बनाने के लिए कच्चे माल के रूप में काम करता है।
यह प्रक्रिया कोयले को कम्बस्शन फ्यूल से इंडस्ट्रियल केमिकल फीडस्टॉक में बदल देती है।
आयात कम करने और आत्मनिर्भरता की दिशा
भारत अपनी 83% क्रूड ऑयल, लगभग 50% नेचुरल गैस और मेथनॉल तथा फर्टिलाइजर जैसे की इनपुट्स का 90% से अधिक आयात करता है। पश्चिम एशिया में हाल के तनाव ने LNG, LPG और अन्य हाइड्रोकार्बन सप्लाई चेन की कमजोरी को उजागर किया है।
कोयला गैसीकरण डोमेस्टिक कोयला संसाधनों का बेहतर उपयोग करके इन आयातों को प्रतिस्थापित कर सकता है। सरकार का लक्ष्य 2030 तक 100 मिलियन टन कोयला गैसीकरण क्षमता हासिल करना है। इससे एनर्जी सुरक्षा मजबूत होगी और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को गति मिलेगी।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
₹37,500 करोड़ की इस स्कीम से कोयला गैसीकरण प्रोजेक्ट्स में बड़े पैमाने पर निवेश आकर्षित होने की उम्मीद है। प्रति प्रोजेक्ट ₹3,000 करोड़ तक की प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता प्राइवेट और पब्लिक सेक्टर दोनों के लिए आकर्षक बनती है।
यह स्कीम कोयला खदान कंपनियों, केमिकल कंपनियों, फर्टिलाइजर उत्पादकों और इंजीनियरिंग फर्म्स के लिए नए अवसर खोलती है। गैसीकरण से जुड़े प्रोजेक्ट्स से न केवल राजस्व बढ़ेगा बल्कि रोजगार सृजन भी होगा। निवेशक डोमेस्टिक कोयला उपयोग से जुड़े हाई वैल्यू प्रोडक्ट्स जैसे मेथनॉल और यूरिया के उत्पादन में भागीदारी कर सकते हैं, जो लंबी अवधि में स्थिर रिटर्न दे सकते हैं।
भविष्य की बातें
प्रस्तावित स्कीम का मुख्य उद्देश्य देश में सरफेस कोयला और लिग्नाइट गैसीफिकेशन प्रोजेक्ट्स को तेज़ी से आगे बढ़ाना है। इससे LNG, यूरिया, अमोनियम नाइट्रेट, अमोनिया, कोकिंग कोल (DRI के जरिए), मेथनॉल और डीएमई जैसी जरूरी कमोडिटीज़ के आयात पर निर्भरता कम होगी और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही, घरेलू कोयला और लिग्नाइट संसाधनों का बेहतर उपयोग करते हुए ईंधन और केमिकल उत्पादन को मजबूत किया जा सकेगा, जिससे 2030 तक 100 मिलियन टन कोल गैसीफिकेशन क्षमता के राष्ट्रीय लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलेगी।
इस लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ते हुए देश में केमिकल क्लस्टर्स और मजबूत इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम विकसित होने की संभावना है। भविष्य में अंडरग्राउंड कोयला गैसीफिकेशन (UCG) जैसी नई तकनीकें उन कोयला भंडारों को भी उपयोग में ला सकेंगी, जिन्हें पारंपरिक माइनिंग के जरिए निकालना संभव नहीं है।
डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल एजुकेशनल और इंफॉर्मेशनल उद्देश्य के लिए है और यह इन्वेस्टमेंट एडवाइस या किसी भी सिक्योरिटीज को खरीदने या बेचने की रिकमेंडेशन नहीं है। यहाँ जिन कंपनियों का उल्लेख किया गया है, उन्हें मार्केट डेवलपमेंट्स के संदर्भ में केवल उदाहरण के रूप में बताया गया है। इन्वेस्टर्स को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी इन्वेस्टमेंट डिसीजन लेने से पहले अपनी खुद की रिसर्च करें और अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से परामर्श करें।
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