भारत से FPI आउटफ्लो क्यों बढ़ रहा है जबकि अर्थव्यवस्था मजबूत है?

भारत से FPI आउटफ्लो क्यों बढ़ रहा है जबकि अर्थव्यवस्था मजबूत है?
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भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और पिछले एक दशक में देश ने कई संरचनात्मक सुधारों के जरिए निवेश माहौल को मजबूत किया है। मजबूत बैंकिंग व्यवस्था, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और बड़े डोमेस्टिक मार्केट के कारण भारत लंबे समय से ग्लोबल निवेशकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में एक दिलचस्प बदलाव देखने को मिला है। मजबूत आर्थिक फंडामेंटल के बावजूद विदेशी निवेशक भारतीय मार्केट्स से पैसा निकाल रहे हैं और ग्लोबल पूंजी का रुख नई तकनीकों और इनोवेशन आधारित मार्केट्स की ओर बढ़ रहा है।

यह बदलाव केवल भारत की कहानी नहीं है, बल्कि ग्लोबल पूंजी के बदलते स्वभाव को दर्शाता है। निवेशक अब भविष्य के मुनाफे की तलाश में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सेमीकंडक्टर और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग की ओर मुड़ रहे हैं।

क्या है मामला?

भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है। देश के पास लगभग 700 बिलियन डॉलर का फॉरेन करेंसी रिज़र्व, मजबूत बैंकिंग व्यवस्था और बड़े देशों में सबसे बेहतर विकास संभावनाओं में से एक है। इसके बावजूद विदेशी निवेशकों का रुख कमजोर पड़ा है।

FY26 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने नेट 16.5 बिलियन डॉलर की निकासी की, जबकि नेट विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) घटकर केवल 7.7 बिलियन डॉलर रह गया, जो पिछले कुछ वर्षों के मुकाबले काफी कम है।

हालांकि, कुल (ग्रॉस) FDI रिकॉर्ड 94.5 बिलियन डॉलर तक पहुंचा, जो भारत में लॉन्गटर्म भरोसे को दर्शाता है। लेकिन विदेशी कंपनियों द्वारा 53.6 बिलियन डॉलर की पूंजी वापस ले जाने और भारतीय कंपनियों द्वारा 33.3 बिलियन डॉलर का विदेशी निवेश करने के कारण नेट FDI में बड़ी गिरावट आई है। 2023 के बाद से भारत में आए विदेशी पोर्टफोलियो निवेश का आधे से अधिक हिस्सा वापस जा चुका है और केवल 2026 में ही लगभग 8.5 बिलियन डॉलर का आउटफ्लो दर्ज किया गया।

यह दिखाता है कि मजबूत आर्थिक फंडामेंटल के बावजूद ग्लोबल पूंजी का रुझान तेजी से बदल रहा है।

ग्लोबल पूंजी AI और टेक थीम्स की ओर क्यों बढ़ रही है?

दुनियाभर के निवेशकों का फोकस अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर्स पर है। अमेरिका AI क्रांति का केंद्र बन चुका है, जबकि ताइवान और दक्षिण कोरिया ग्लोबल चिप इंडस्ट्री के बड़े केंद्र बनकर उभरे हैं।

साउथ कोरिया का KOSPI इंडेक्स AI चिप कंपनियों की वजह से पिछले दो वर्षों में शानदार प्रदर्शन कर चुका है। ताइवान के मार्केट को भी TSMC जैसी कंपनियों से मजबूती मिली है। इसके मुकाबले भारत में रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर खर्च GDP का केवल 0.7% है, जो इन देशों से काफी कम है।

भारत की ताकत सॉफ्टवेयर सर्विसेज और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स में रही है, लेकिन हार्डवेयर और फ्रंटियर टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में अभी शुरुआती बढ़त हासिल नहीं हो पाई है। यही वजह है कि ग्लोबल पूंजी तेजी से उन मार्केट्स की ओर जा रही है, जहां भविष्य की तकनीकों से जुड़े बड़े अवसर दिखाई दे रहे हैं।

विदेशी बिकवाली के बावजूद क्यों टिके हुए हैं भारतीय मार्केट?

सितंबर 2024 में शिखर पर पहुंचने के बाद भारतीय शेयर मार्केट का प्रदर्शन दबाव में रहा है। इसकी वजह अर्थव्यवस्था की फंडामेंटल मजबूती में कोई कमजोरी नहीं, बल्कि अक्टूबर 2024 से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की लगातार बिकवाली है।

कैलेंडर वर्ष 2025 में FPIs ने नेट 1.6 लाख करोड़ रुपये निकाले, जबकि 2026 में मई तक यह आंकड़ा 2.2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया।

केवल 2026 में जनवरी से जून के दौरान विदेशी निवेशकों ने कुल 2.8 लाख करोड़ रुपये से अधिक की नेट बिकवाली की है। मार्च में सबसे ज्यादा 1.18 लाख करोड़ रुपये और जून में अब तक करीब 54,944 करोड़ रुपये की निकासी दर्ज की गई। इतनी बड़ी बिकवाली के बावजूद भारतीय मार्केट्स में बड़ी गिरावट नहीं आई है।

इसकी प्रमुख वजह डोमेस्टिक निवेशकों की बढ़ती भागीदारी और म्यूचुअल फंड्स में नियमित SIP निवेश है, जिसने मार्केट को मजबूत सहारा दिया है। यदि दो या तीन दशक पहले इतनी बड़ी विदेशी बिकवाली होती, तो मार्केट में कहीं अधिक तेज गिरावट देखने को मिल सकती थी। यह दिखाता है कि भारतीय कैपिटल मार्केट पहले की तुलना में अधिक परिपक्व और डोमेस्टिक निवेशकों पर आधारित हो चुके हैं।

निवेशकों के लिए इसमें क्या है?

विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली के बावजूद भारत की लंबी अवधि की विकास कहानी कमजोर नहीं हुई है। अधिक जनसंख्या, बड़ा उपभोक्ता मार्केट और तेज आर्थिक विकास की संभावनाएं अभी भी भारत की सबसे बड़ी ताकत हैं। हालांकि, FY26 में FPI द्वारा 16.5 बिलियन डॉलर की निकासी और जनवरी-जून 2026 के दौरान लगभग 2.8 लाख करोड़ रुपये की बिकवाली ने मार्केट पर दबाव बनाया है।

इसके बावजूद घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) ने मार्केट को मजबूत सहारा दिया है। जनवरी 2026 में DIIs ने 69,221 करोड़ रुपये, फरवरी में 38,423 करोड़ रुपये, मार्च में रिकॉर्ड 1.43 लाख करोड़ रुपये, अप्रैल में 51,064 करोड़ रुपये, मई में 82,669 करोड़ रुपये और जून में अब तक 66,091 करोड़ रुपये का नेट निवेश किया है।

यानी केवल जनवरी-जून 2026 के दौरान DIIs ने करीब 4.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश किया, जो FPI बिकवाली से कहीं अधिक है।

यह दिखाता है कि भारतीय मार्केट अब पहले की तुलना में अधिक परिपक्व हो चुके हैं और डोमेस्टिक बचत बाजार की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी है।

भविष्य की बातें

यह मान लेना गलत होगा कि विदेशी निवेशक भारत से दूर हो रहे हैं। रिकॉर्ड स्तर का ग्रॉस FDI यह दिखाता है कि भारत में लंबी अवधि का भरोसा अभी भी मजबूत है। भारत जैसी विकास दर, जनसंख्या संरचना और मार्केट साइज बहुत कम अर्थव्यवस्थाओं के पास है।

लेकिन ग्लोबल निवेश का पैटर्न बदल चुका है। पहले भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका बड़ा मार्केट और तेज ग्रोथ थी, जो निवेश आकर्षित करने के लिए पर्याप्त मानी जाती थी। ये सभी फंडामेंटल मजबूतियां अभी भी मौजूद हैं, लेकिन अब ये अकेले पर्याप्त नहीं हैं।

क्योंकि, अब निवेश केवल तेज ग्रोथ वाली अर्थव्यवस्थाओं पर नहीं, बल्कि AI, सेमीकंडक्टर, क्लाउड और कंप्यूटिंग जैसी तकनीकों पर केंद्रित हो रहा है। भारत ने ग्रोथ की लड़ाई काफी हद तक जीत ली है। असली चुनौती अब इनोवेशन की है। आने वाली ग्लोबल पूंजी उस देश को प्राथमिकता दे सकती है जो अगली बड़ी तकनीकी क्रांति का हिस्सा बनेगा।

डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल एजुकेशनल और इंफॉर्मेशनल उद्देश्य के लिए है और यह इन्वेस्टमेंट एडवाइस या किसी भी सिक्योरिटीज को खरीदने या बेचने की रिकमेंडेशन नहीं है। यहाँ जिन कंपनियों का उल्लेख किया गया है, उन्हें मार्केट डेवलपमेंट्स के संदर्भ में केवल उदाहरण के रूप में बताया गया है। इन्वेस्टर्स को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी इन्वेस्टमेंट डिसीजन लेने से पहले अपनी खुद की रिसर्च करें और अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से परामर्श करें।

सिक्योरिटीज मार्केट में किए गए इन्वेस्टमेंट मार्केट जोखिम के अधीन होते हैं। इन्वेस्ट करने से पहले सभी संबंधित डॉक्यूमेंट्स को ध्यानपूर्वक से पढ़ें।

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