भारत की ऑटो कंपोनेंट इंडस्ट्री अब केवल डोमेस्टिक वाहन कंपनियों की सप्लायर नहीं रही। भारतीय कंपनियां तेजी से ग्लोबल ऑटोमोटिव सप्लाई चेन का हिस्सा बन रही हैं और यूरोप, उत्तरी अमेरिका, एशिया, अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिका जैसे मार्केट्स में अपनी मौजूदगी बढ़ा रही हैं।
कम मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट, मजबूत इंजीनियरिंग क्षमता, स्किल्ड वर्कफोर्स और बढ़ते टेक्नोलॉजी निवेश ने इस विस्तार को गति दी है। भारतीय कंपनियां अब सामान्य ऑटो पार्ट्स के साथ EV कंपोनेंट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और एडवांस्ड इंजीनियरिंग प्रोडक्ट्स भी सप्लाई कर रही हैं।
आइए भारतीय ऑटो कंपोनेंट इंडस्ट्री के ग्लोबल विस्तार को समझें और जानें कि क्या यह थीम निवेशकों के लिए एक बड़ा अवसर बन सकती है।
क्या है मामला?
वित्त वर्ष 2025 में इंडस्ट्री की उत्पादन वैल्यू ₹6.73 लाख करोड़ यानी 80.20 बिलियन डॉलर रही। वित्त वर्ष 2020 से 2025 के बीच सेक्टर ने 14% का कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट दर्ज किया। वित्त वर्ष 2026 में इसका टर्नओवर बढ़कर ₹7.60 लाख करोड़ यानी 85.9 बिलियन डॉलर हो गया।
भारतीय ऑटो कंपोनेंट कंपनियां इंजन पार्ट्स, ट्रांसमिशन, फोर्जिंग्स, कास्टिंग्स, इलेक्ट्रिकल आइटम्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और EV कंपोनेंट्स ग्लोबल ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स यानी OEMs को सप्लाई कर रही हैं।
वित्त वर्ष 2025 में ऑटो कंपोनेंट निर्यात लगभग ₹1.94 लाख करोड़ यानी 22.90 बिलियन डॉलर रहा। वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही में निर्यात 9.3% बढ़कर ₹1.07 लाख करोड़ पहुंच गया। इसी दौरान OEMs को बिक्री 7.3% बढ़कर ₹3.04 लाख करोड़ और आफ्टरमार्केट बिक्री 9% बढ़कर ₹53,160 करोड़ रही।
भारत के कुल ऑटोमोबाइल निर्यात ने भी वित्त वर्ष 2026 में 66.40 लाख यूनिट का रिकॉर्ड बनाया, जो पिछले सात वर्षों की सबसे तेज 24% सालाना ग्रोथ थी। यह प्रदर्शन बताता है कि वाहनों के साथ भारतीय कंपोनेंट्स की ग्लोबल डिमांड भी मजबूत हो रही है।
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निर्यात डायवर्सिफिकेशन और FTA का अवसर
वित्त वर्ष 2026 में भारत का कुल ऑटो कंपोनेंट निर्यात लगभग 5% बढ़ा, लेकिन उत्तरी अमेरिका को भेजे जाने वाले निर्यात में कोई खास वृद्धि नहीं हुई। अमेरिकी टैरिफ, पश्चिम एशिया से जुड़ी जियोपॉलिटिकल अनिश्चितता और दूसरे ट्रेड प्रतिबंधों ने इस मार्केट में ग्रोथ सीमित रखी।
इसके विपरीत, यूरोप को निर्यात 9% बढ़कर 7.36 बिलियन डॉलर और लैटिन अमेरिका को 12% बढ़कर 1.54 बिलियन डॉलर हो गया। यूरोप भारतीय ऑटो कंपोनेंट्स का सबसे बड़ा निर्यात डेस्टिनेशन बनकर उभरा। हालांकि यूनाइटेड किंगडम की हिस्सेदारी भारत के कुल ऑटो कंपोनेंट निर्यात में केवल करीब 3% रही।
इंडस्ट्री को उम्मीद है कि भारत-यूरोपियन यूनियन फ्री ट्रेड एग्रीमेंट लागू होने के बाद यूरोप में अवसर और बढ़ेंगे। कई यूरोपीय OEMs भारत में अपनी प्रोक्योरमेंट एक्टिविटीज बढ़ा रहे हैं। अमेरिका पर निर्भरता कम करने के लिए कंपनियां यूरोप, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे मार्केट्स में विस्तार कर रही हैं।
टेक्नोलॉजी और रेगुलेटरी बदलाव से नई ग्रोथ
भारतीय ऑटो कंपोनेंट इंडस्ट्री की अगली ग्रोथ केवल वॉल्यूम से नहीं, बल्कि अधिक टेक्नोलॉजी वाले और ज्यादा वैल्यू प्रदान करने वाले कंपोनेंट्स से आने की उम्मीद है। BS-7, CAFE-III, TREM-V और CPCB-IV+ जैसे रेगुलेटरी बदलाव कंपनियों को एमिशन कंट्रोल, फ्यूल एफिशिएंसी और एडवांस्ड इंजीनियरिंग में निवेश के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
BS-6 ट्रांजिशन के दौरान OEMs और सप्लायर्स ने मिलकर 18 बिलियन डॉलर से अधिक का निवेश किया था। BS-7 में इतनी बड़ी राशि की जरूरत न भी पड़े, फिर भी कंपनियों को रियल-वर्ल्ड एमिशन कंप्लायंस, सिस्टम ऑप्टिमाइजेशन और कॉस्ट इंजीनियरिंग पर खर्च करना होगा।
अगले तीन से पांच वर्षों में OEMs का फोकस कॉस्ट एफिशिएंसी, लाइटवेटिंग, कॉम्पैक्ट पैकेजिंग, PGM रिडक्शन और बेहतर अकूस्टिक्स (acoustics) पर रहने की उम्मीद है। EVs, हाइब्रिड्स और इंटरनल कम्बशन इंजन एक साथ मौजूद रहने से सप्लायर्स के लिए कई पावरट्रेन टेक्नोलॉजीज में अवसर बनेंगे।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
इंडस्ट्री की ग्रोथ के साथ एक महत्वपूर्ण जोखिम बढ़ती आयात निर्भरता है। वित्त वर्ष 2026 में ऑटो कंपोनेंट आयात 13% बढ़े और चीन की हिस्सेदारी कुल आयात में 36% हो गई। जापान, जर्मनी और दक्षिण कोरिया भी महत्वपूर्ण सप्लायर बने रहे।
आयात की ग्रोथ निर्यात से अधिक रहने के कारण सेक्टर ने वित्त वर्ष 2026 में पहली बार 1.37 बिलियन डॉलर का रिकॉर्ड ट्रेड डेफिसिट दर्ज किया। इसका प्रमुख कारण एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिकल और EV कंपोनेंट्स की डोमेस्टिक उपलब्धता सीमित होना है।
निवेशकों को उन कंपनियों पर अधिक ध्यान देना चाहिए जिनकी निर्यात मार्केट्स डाइवर्सिफाइड हैं, R&D क्षमता मजबूत है और जो EV पार्ट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, एमिशन सिस्टम्स तथा एडवांस्ड मैटेरियल्स में लोकलाइजेशन बढ़ा रही हैं। केवल डोमेस्टिक वाहन बिक्री पर निर्भर कंपनियों की तुलना में ग्लोबल OEM कॉन्ट्रैक्ट्स और हाई-वैल्यू कंपोनेंट्स वाली कंपनियों के पास बेहतर अवसर हो सकते हैं।
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भविष्य की बातें
ACMA को वित्त वर्ष 2027 में भारतीय ऑटो कंपोनेंट इंडस्ट्री के 8% से 10% बढ़ने की उम्मीद है। डोमेस्टिक वाहन डिमांड, रिप्लेसमेंट मार्केट, बढ़ते निर्यात ऑर्डर्स और ग्लोबल सोर्सिंग इस ग्रोथ को सहारा दे सकते हैं।
सितंबर 2021 में शुरू हुई ऑटोमोबाइल और ऑटो कंपोनेंट PLI स्कीम के लिए ₹25,938 करोड़ का बजट रखा गया था। नवंबर 2025 तक इसके तहत ₹35,657 करोड़ का निवेश और ₹32,879 करोड़ की बिक्री दर्ज की गई। बजट 2026-27 में इस स्कीम के लिए ₹5,940 करोड़ का आवंटन किया गया।
आने वाले समय में भारतीय कंपनियों की ग्लोबल सफलता केवल कम कॉस्ट पर निर्भर नहीं रहेगी। इंटरनेशनल क्वालिटी, सेफ्टी और एमिशन स्टैंडर्ड्स को पूरा करना, इलेक्ट्रॉनिक्स तथा EV कंपोनेंट्स का लोकल प्रोडक्शन बढ़ाना और अलग-अलग ग्लोबल मार्केट्स में मौजूदगी बनाना अधिक महत्वपूर्ण होगा। जो कंपनियां टेक्नोलॉजी, लोकलाइजेशन और ग्लोबल पार्टनरशिप में लगातार निवेश करेंगी, वे भारत को एक बड़े मैन्युफैक्चरिंग और सोर्सिंग हब के रूप में मजबूत कर सकती हैं।
डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल एजुकेशनल और इंफॉर्मेशनल उद्देश्य के लिए है और यह इन्वेस्टमेंट एडवाइस या किसी भी सिक्योरिटीज को खरीदने या बेचने की रिकमेंडेशन नहीं है। यहाँ जिन कंपनियों का उल्लेख किया गया है, उन्हें मार्केट डेवलपमेंट्स के संदर्भ में केवल उदाहरण के रूप में बताया गया है। इन्वेस्टर्स को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी इन्वेस्टमेंट डिसीजन लेने से पहले अपनी खुद की रिसर्च करें और अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से परामर्श करें।
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