भारत की ग्रोथ स्टोरी मजबूत डोमेस्टिक डिमांड, निवेश और सर्विसेज के सहारे आगे बढ़ रही है, लेकिन ग्लोबल माहौल पहले की तुलना में ज्यादा जटिल हो गया है। युद्ध, व्यापारिक तनाव, एनर्जी प्राइस, सप्लाई चेन में बदलाव और AI आधारित निवेश की नई लहर भारत के लिए अवसर और जोखिम दोनों पैदा कर रही है।
एक तरफ अर्थव्यवस्था तेज गति बनाए हुए है और निर्यात, FDI तथा मैन्युफैक्चरिंग से सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं। दूसरी तरफ ऑइल और फर्टिलाइजर की बाहरी निर्भरता और ग्लोबल कैपिटल के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा आगे की राह कठिन बनाती है।
आइए भारत की ग्रोथ स्टोरी को विस्तारपूर्वक समझें और जानें कि बदलती ग्लोबल अर्थव्यवस्था में किन फैक्टर्स पर इसकी आगे की दिशा निर्भर कर सकती है।
क्या है मामला?
भारत FY22 से दुनिया की तेजी से बढ़ती हुई इकोनॉमी बना हुआ है। Q1 FY27 में अर्थव्यवस्था ने 7.8% ग्रोथ दर्ज की, जबकि जुलाई-सितंबर तिमाही में रियल GDP ग्रोथ 7.3% रहने का अनुमान है। इसके साथ ही, मिंट के अनुसार, एनालिस्ट का मानना है कि पूरे वित्त वर्ष के लिए 6.8-7% विस्तार की उम्मीद है।
डोमेस्टिक गतिविधियों से भी मजबूती के संकेत हैं। सितंबर में GST कलेक्शन ₹2 लाख करोड़ से ऊपर रहा और मैन्युफैक्चरिंग PMI सात महीने के उच्च स्तर 55.1 पर पहुंच गया। अप्रैल-जुलाई के बीच नेट FDI 38% बढ़कर $13.4 बिलियन रहा, जबकि ग्रॉस FDI इनफ्लो $43.9 बिलियन था।
18 सितंबर तक फॉरेक्स रिजर्व्स $765.9 बिलियन थे। चालू वित्त वर्ष में मर्चेंडाइज और सर्विसेज निर्यात $1 ट्रिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। FY27 के पहले पांच महीनों में निर्यात $400 बिलियन पार कर चुका था और अगस्त में गुड्स निर्यात 26.1% बढ़ा।
बाहरी झटके और आयात निर्भरता
भारत की बड़ी कमजोरियों में एनर्जी और जरूरी इनपुट्स की बाहरी निर्भरता शामिल है। क्रूड ऑयल आयात निर्भरता 2013-14 के 77.6% से बढ़कर 2024-25 में 88.2% हो गई। फर्टिलाइजर में प्रभावी बाहरी निर्भरता करीब 68-70% है, जबकि डोमेस्टिक यूरिया उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली नेचुरल गैस का लगभग 85% आयात होता है।
ऐसे में युद्ध, शिपिंग व्यवधान और क्रूड प्राइस में तेज उछाल का असर महंगाई, रुपये और करेंट अकाउंट पर पड़ सकता है। पिछले एक महीने में 10-वर्षीय US ट्रेजरी यील्ड 52 बेसिस पॉइंट बढ़कर 5.32% और समान अवधि की भारतीय सरकारी सिक्योरिटी यील्ड 25 बेसिस पॉइंट बढ़कर 7.21% हो गई।
इसके साथ US कानून राष्ट्रपति को रूसी क्रूड खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता है, जिससे व्यापारिक अनिश्चितता बढ़ सकती है।
मैन्युफैक्चरिंग, पूंजी और AI की चुनौती
भारत में मैन्युफैक्चरिंग की अर्थव्यवस्था में हिस्सेदारी तीन दशकों से लगभग 15-18% के दायरे में बनी हुई है। यह 2013-14 में 17.2%, 2021-22 में 18.5%, 2023-24 में 17.3% और 2024-25 में घटकर 15.2% रही।
PLI स्कीम 14 सेक्टर्स को कवर करती है और इसका स्वीकृत आउटले करीब ₹1.91 लाख करोड़ है। इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मास्यूटिकल्स में प्रगति के बावजूद पावर और लॉजिस्टिक्स कॉस्ट, छोटे मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स और ग्लोबल नेटवर्क्स से सीमित इंटीग्रेशन चुनौतियां बने हुए हैं।
इसके साथ AI ग्लोबल कैपिटल फ्लो की दिशा भी बदल रहा है। विकसित देश मैन्युफैक्चरिंग और AI निवेश के लिए पूंजी आकर्षित कर रहे हैं। भारत के लिए चुनौती अपनी सर्विसेज की मौजूदा ताकत को बनाए रखते हुए AI से पैदा हो रहे बदलावों में भागीदारी बढ़ाने की है।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
मौजूदा तस्वीर मजबूत डोमेस्टिक अर्थव्यवस्था और बढ़ते बाहरी जोखिमों का मिश्रण है। रिटेल प्राइस गेज में करीब 69% आइटम्स की महंगाई 4% के मीडियम-टर्म टारगेट से काफी नीचे रही। बैंक क्रेडिट, सर्विसेज गतिविधि और रोजगार से भी सकारात्मक संकेत मिले हैं।
दूसरी ओर, ग्लोबल ब्याज दरें, क्रूड, टैरिफ और AI-ड्रिवन कैपिटल फ्लो भारत में पूंजी की उपलब्धता और मार्केट सेंटीमेंट को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए केवल GDP ग्रोथ के बजाय FDI, निर्यात, बॉन्ड यील्ड, रुपये और मैन्युफैक्चरिंग की प्रतिस्पर्धात्मकता भी अर्थव्यवस्था की दिशा समझने के महत्वपूर्ण संकेत बने रहेंगे।
भविष्य की बातें
प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव शक्तिकांत दास के अनुसार, GST, बैंकिंग सुधार, फ्लेक्सिबल इन्फ्लेशन टारगेटिंग, डिजिटल पेमेंट्स और फिस्कल प्रूडेंस जैसे सुधारों के सहारे भारत की अर्थव्यवस्था 8% ग्रोथ के बेहद करीब पहुंच चुकी है। उनका कहना है कि पिछले दशक के कई सुधार केवल तत्काल जरूरतों के लिए नहीं, बल्कि बाहरी झटकों को बेहतर तरीके से संभालने और तेजी से उबरने की क्षमता मजबूत करने के लिए किए गए हैं।
आगे अगले पांच वर्षों में आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार तेज होने की उम्मीद है, जिसमें AI की भूमिका भी बढ़ सकती है। AI प्रोडक्टिविटी, पब्लिक सर्विस डिलीवरी, साइंटिफिक डिस्कवरी, हेल्थकेयर और एजुकेशन को प्रभावित कर सकता है। इसके साथ कॉरपोरेट बॉन्ड मार्केट, पेंशन और इंश्योरेंस फंड्स, म्युनिसिपल फाइनेंस और नए इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंसिंग मॉडल्स को गहरा करने पर भी जोर दिया गया है।
डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल एजुकेशनल और इंफॉर्मेशनल उद्देश्य के लिए है और यह इन्वेस्टमेंट एडवाइस या किसी भी सिक्योरिटीज को खरीदने या बेचने की रिकमेंडेशन नहीं है। यहाँ जिन कंपनियों का उल्लेख किया गया है, उन्हें मार्केट डेवलपमेंट्स के संदर्भ में केवल उदाहरण के रूप में बताया गया है। इन्वेस्टर्स को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी इन्वेस्टमेंट डिसीजन लेने से पहले अपनी खुद की रिसर्च करें और अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से परामर्श करें।
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