भारत में रिन्यूएबल एनर्जी की क्षमता तेजी से बढ़ने के साथ अब केवल बिजली पैदा करना पर्याप्त नहीं रह गया है। असली चुनौती इस बिजली को उत्पादन वाले क्षेत्रों से डिमांड वाले इलाकों तक पहुंचाने, ग्रिड में उतार-चढ़ाव संभालने और जरूरत के समय स्टोर की गई बिजली उपलब्ध कराने की है।
इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए सरकार ने PM-DHARA योजना को मंजूरी दी है, जिसमें ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर और बैटरी स्टोरेज को एक साथ विकसित करने पर फोकस है।
आइए PM-DHARA योजना को विस्तारपूर्वक समझें और जानें कि यह भारत के रिन्यूएबल एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर और इससे जुड़े सेक्टर्स के लिए क्या बदलाव ला सकती है।
क्या है मामला?
केंद्रीय कैबिनेट ने PM-Developing Harmonised and Accelerated Renewable-energy Access यानी PM-DHARA योजना को मंजूरी दी है। इसका कुल प्रोजेक्ट आउटले ₹1,86,405 करोड़ है और इसे FY2032-33 तक लागू करने का लक्ष्य रखा गया है। योजना के जरिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इंट्रा-स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम को मजबूत करते हुए 135 GW तक रिन्यूएबल एनर्जी को ग्रिड तक पहुंचाने की व्यवस्था तैयार की जाएगी।
कुल राशि में ₹1,36,378 करोड़ Green Energy Corridor Phase-III के तहत इंट्रा-स्टेट ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए रखे गए हैं, जबकि ₹50,000 करोड़ से 50 GWh बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम्स यानी BESS विकसित किए जाएंगे। इस इंफ्रास्ट्रक्चर के तहत 51,126 सर्किट किलोमीटर ट्रांसमिशन लाइन और 2,28,903 MVA ट्रांसफॉर्मेशन कैपेसिटी जोड़ने की योजना है।
ट्रांसमिशन और स्टोरेज की जरूरत क्यों बढ़ रही है?
सोलर और विंड पावर की सबसे बड़ी चुनौती उनकी अनियमित उपलब्धता है। सोलर बिजली दिन में बनती है, जबकि विंड जनरेशन मौसम और समय के साथ बदलती रहती है। इसलिए सिर्फ नई रिन्यूएबल कैपेसिटी जोड़ना पर्याप्त नहीं है; ग्रिड को भी इस बदलते उत्पादन को संभालने के लिए मजबूत बनाना जरूरी है।
यह चुनौती अब साफ दिखने लगी है। मई 2026 की Ember रिपोर्ट के अनुसार, ट्रांसमिशन सीमाओं के कारण 2026 की पहली तिमाही में भारत को करीब 300 GWh रिन्यूएबल एनर्जी का नुकसान हुआ। इसकी बड़ी वजह यह रही कि रिन्यूएबल कैपेसिटी का विस्तार ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर की तुलना में तेज रहा।
यहीं 50 GWh BESS अहम भूमिका निभा सकता है। यह अतिरिक्त बिजली को स्टोर कर रिन्यूएबल इंटरमिटेंसी, ट्रांसमिशन कंजेशन, पीक-ऑवर कर्टेलमेंट और नॉन-सोलर आवर्स की डिमांड को संतुलित करने में मदद करेगा। राजस्थान और गुजरात जैसे रिन्यूएबल-रिच राज्यों में बढ़ती जनरेशन के साथ मजबूत ट्रांसमिशन और स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत भी तेजी से बढ़ रही है।
फंडिंग और इम्प्लीमेंटेशन का मॉडल
योजना में कुल सेंट्रल फाइनेंशियल सपोर्ट ₹54,082 करोड़ रखा गया है। इसमें ₹45,005 करोड़ इंट्रा-स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम्स, ₹6,000 करोड़ BESS के लिए वायबिलिटी गैप फंडिंग, ₹3,050 करोड़ पहले के Green Energy Corridor चरणों की कमिटेड लायबिलिटीज और ₹27 करोड़ प्रोग्राम मैनेजमेंट व ग्रिड स्टडीज के लिए निर्धारित हैं। इस सहायता का उद्देश्य ट्रांसमिशन चार्ज के प्रभाव को कम कर बिजली की लागत को नियंत्रित रखने में मदद करना है।
ग्रीनफील्ड ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट्स टैरिफ-बेस्ड कॉम्पिटिटिव बिडिंग के जरिए दिए जाएंगे और ट्रांसमिशन सर्विस प्रोवाइडर्स इन्हें Build-Own-Operate-Maintain मॉडल पर चलाएंगे। मौजूदा नेटवर्क के अपग्रेड और स्ट्रेंथनिंग के लिए कॉस्ट-प्लस मॉडल अपनाया जाएगा। स्टेट ट्रांसमिशन यूटिलिटीज इसकी मुख्य इम्प्लीमेंटिंग एजेंसियां होंगी।
PM Gati Shakti, प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग यूनिट्स और चैलेंज मोड का भी इस्तेमाल किया जाएगा, जिसमें बेहतर पॉलिसी तैयारी, लैंड कम्पेनसेशन और जरूरी क्लियरेंस वाले राज्यों को प्राथमिकता मिल सकती है।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
PM-DHARA का प्रभाव केवल ट्रांसमिशन लाइन निर्माण तक सीमित नहीं है। सरकार के अनुसार, योजना लगभग ₹1.32 लाख करोड़ का ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट लेवरेज कर सकती है। इसके साथ जुड़े 135 GW रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स में करीब ₹4.6 लाख करोड़ के निवेश का अनुमान है।
इससे ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर, BESS मैन्युफैक्चरिंग और डिप्लॉयमेंट, पावर इक्विपमेंट, निर्माण तथा ऑपरेशन और मेंटेनेंस जैसे क्षेत्रों में गतिविधि बढ़ने की संभावना बनती है। DD News के अनुसार, योजना पावर, मैन्युफैक्चरिंग और कंस्ट्रक्शन में डायरेक्ट और इनडायरेक्ट रोजगार के साथ ग्रिड मैनेजमेंट में लॉन्ग-टर्म स्किल्ड रोजगार भी पैदा कर सकती है।
यह किसी एक कंपनी या एसेट के लिए निवेश संकेत नहीं, बल्कि यह बताता है कि रिन्यूएबल एनर्जी विस्तार के साथ सपोर्टिंग ग्रिड और स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर का आर्थिक महत्व भी बढ़ रहा है।
भविष्य की बातें
PM-DHARA भारत की बड़ी नॉन-फॉसिल एनर्जी महत्वाकांक्षाओं से जुड़ा हुआ है। सरकार 2030 तक 500 GW नॉन-फॉसिल फ्यूल इंस्टॉल्ड कैपेसिटी का लक्ष्य रखती है, जबकि मौजूदा क्षमता 270 GW है।
इसके साथ ही, PM-DHARA 2035 तक 900 GW इंस्टॉल्ड नॉन-फॉसिल कैपेसिटी के लक्ष्य को सपोर्ट करने के उद्देश्य से भी तैयार की गई है। ऐसे में भविष्य की चुनौती केवल नई सोलर और विंड कैपेसिटी लगाने की नहीं होगी, बल्कि उसके साथ ट्रांसमिशन, स्टोरेज और ग्रिड फ्लेक्सिबिलिटी को उसी रफ्तार से विकसित करने की होगी।
डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल एजुकेशनल और इंफॉर्मेशनल उद्देश्य के लिए है और यह इन्वेस्टमेंट एडवाइस या किसी भी सिक्योरिटीज को खरीदने या बेचने की रिकमेंडेशन नहीं है। यहाँ जिन कंपनियों का उल्लेख किया गया है, उन्हें मार्केट डेवलपमेंट्स के संदर्भ में केवल उदाहरण के रूप में बताया गया है। इन्वेस्टर्स को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी इन्वेस्टमेंट डिसीजन लेने से पहले अपनी खुद की रिसर्च करें और अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से परामर्श करें।
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