हेल्थ इंश्योरेंस में 10% बिल नियम, जानें क्या बदल सकता है?

हेल्थ इंश्योरेंस में 10% बिल नियम, जानें क्या बदल सकता है?
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भारत में हेल्थ इंश्योरेंस को लेकर एक बड़ा बदलाव प्रस्तावित किया गया है, जो पॉलिसीहोल्डर्स के अस्पताल खर्च की जिम्मेदारी को बदल सकता है। नॉन-लाइफ इंश्योरर्स के स्तर पर विचाराधीन इस प्रस्ताव के तहत रिटेल हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम में पॉलिसीहोल्डर को एडमिसिबल हॉस्पिटलाइजेशन कॉस्ट का 10% खुद देना पड़ सकता है, जबकि बाकी 90% राशि इंश्योरर वहन करेगा।

इस व्यवस्था के बदले सालाना प्रीमियम कम हो सकता है, लेकिन अस्पताल में भर्ती होने के समय परिवार को अपनी जेब से अधिक पैसा तैयार रखना पड़ सकता है। इसलिए केवल सम इंश्योर्ड देखना पर्याप्त नहीं होगा; पॉलिसी की वास्तविक आउट-ऑफ-पॉकेट कॉस्ट भी महत्वपूर्ण हो जाएगी।

आइए समझें कि प्रस्तावित 10% को-पेमेंट नियम क्या है और इसका हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसीहोल्डर्स तथा उनके मेडिकल खर्च पर क्या असर पड़ सकता है।

10% को-पेमेंट का प्रस्ताव आखिर है क्या?

प्रस्ताव के अनुसार, 1 जनवरी 2027 से रिटेल हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम पर 10% को-पेमेंट लागू किया जा सकता है। यह इनपेशेंट हॉस्पिटलाइजेशन, दुर्घटना, कैशलेस ट्रीटमेंट और रीइम्बर्समेंट क्लेम पर लागू हो सकता है। हालांकि पॉलिसीहोल्डर की हिस्सेदारी पर प्रति क्लेम अधिकतम ₹5 लाख की सीमा प्रस्तावित है।

उदाहरण के लिए, यदि एडमिसिबल हॉस्पिटल बिल ₹5 लाख है, तो 10% के हिसाब से पॉलिसीहोल्डर ₹50,000 देगा। यदि कुल बिल ₹5 लाख है लेकिन पॉलिसी शर्तों के बाद एडमिसिबल अमाउंट ₹4.5 लाख रह जाता है, तो को-पेमेंट ₹45,000 होगा। इसी तरह ₹50 लाख के एडमिसिबल क्लेम पर 10% यानी ₹5 लाख देना होगा। ₹60 लाख के क्लेम पर 10% राशि ₹6 लाख बनती है, लेकिन प्रस्तावित कैप के कारण पॉलिसीहोल्डर का हिस्सा ₹5 लाख तक सीमित रहेगा।

इंश्योरर्स इस बदलाव को क्यों चाहते हैं?

प्रस्ताव के पीछे बढ़ती हेल्थकेयर कॉस्ट और अस्पताल बिलिंग को लेकर चिंताएं हैं। इंश्योरर्स का मानना है कि पूरी तरह इंश्योरेंस-कवर्ड मरीज महंगे टेस्ट, अतिरिक्त प्रोसीजर, लंबी हॉस्पिटल स्टे या हाई कैटेगरी के कमरे की लागत को कम चुनौती देते हैं, क्योंकि अधिकांश खर्च इंश्योरेंस से आता है। इससे प्रोवाइडर-इंड्यूस्ड डिमांड और ओवरबिलिंग बढ़ने का जोखिम है।

इसी कारण प्रस्ताव केवल को-पेमेंट तक सीमित नहीं है। 4,300 से अधिक अस्पतालों के लिए कॉमन एम्पैनलमेंट, स्टैंडर्ड बेंचमार्क टैरिफ, क्लिनिकल और प्रोसीजर आउटकम से जुड़े कॉन्ट्रैक्ट तथा अस्पतालों और इंश्योरर्स के बीच विवाद निपटाने के लिए औपचारिक मैकेनिज्म का भी प्रस्ताव है। उद्देश्य अस्पताल बिलिंग को अधिक मानकीकृत करना और क्लेम कॉस्ट पर बेहतर नियंत्रण बनाना है।

कम प्रीमियम के बदले ज्यादा आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च

इस मॉडल का सबसे स्पष्ट फायदा कम सालाना प्रीमियम हो सकता है। लेकिन कम प्रीमियम के बदले अस्पताल में भर्ती होने पर पॉलिसीहोल्डर को क्लेम का 10% हिस्सा खुद देना होगा।

LiveMint के अनुसार, रूम-रेंट लिमिट, डिडक्टिबल, बीमारी या प्रोसीजर से जुड़े सब-लिमिट, एक्सक्लूजन और नॉन-पेयेबल एक्सपेंस जैसी शर्तों के कारण कुल आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च को-पेमेंट से अधिक हो सकता है। इसलिए पॉलिसीहोल्डर को केवल 10% आंकड़े के बजाय यह देखना होगा कि बाकी पॉलिसी कंडीशंस के बाद वास्तव में कितनी राशि इंश्योरर स्वीकार करेगा।

प्रस्ताव को लेकर कंज्यूमर चॉइस की चिंता भी है। यदि कोई ग्राहक ज्यादा प्रीमियम देकर पूर्ण कवरेज चाहता है, तब भी उसे अनिवार्य को-पेमेंट स्वीकार करना पड़ सकता है। इंडस्ट्री स्तर पर फुल-कम्पनसेशन पॉलिसी उपलब्ध न होने की स्थिति में प्रतिस्पर्धा को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।

किन पॉलिसियों पर असर और क्या जांचना जरूरी होगी?

प्रस्ताव रिटेल इंडेम्निटी हेल्थ पॉलिसी, रिटेल-अंडर-ग्रुप पॉलिसी, कॉम्बिनेशन प्रोडक्ट के इंडेम्निटी हिस्से, इंटरनल माइग्रेशन और पोर्टेबिलिटी बिजनेस तक लागू हो सकता है। आउटपेशेंट क्लेम को इस व्यवस्था से बाहर रखने का प्रस्ताव है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि 10% को-पेमेंट को राइडर या एंडोर्समेंट के जरिए हटाया, घटाया या बदला नहीं जा सकेगा और इस हिस्से को दूसरी हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी से रिकवर करने की अनुमति भी प्रस्तावित नहीं है।

पॉलिसी खरीदते या रिन्यू करते समय रूम-रेंट एंटाइटलमेंट, डिडक्टिबल, सब-लिमिट, एक्सक्लूजन, वेटिंग पीरियड, नॉन-पेयेबल खर्च, उपलब्ध सम इंश्योर्ड, रिस्टोरेशन बेनिफिट और बाकी डिडक्शन के बाद को-पेमेंट की गणना समझना पहले से अधिक जरूरी हो सकते है।

इमरजेंसी फंड अब और महत्वपूर्ण क्यों हो सकता है?

हेल्थ इंश्योरेंस होने के बावजूद प्रस्तावित व्यवस्था में अस्पताल के समय तुरंत नकदी की जरूरत हो सकती है। NDTV प्रोफिट के अनुसार, परिवारों को तीन से छह महीने के खर्च के बराबर इमरजेंसी फंड रखने की अपनी योजना पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है, ताकि मेडिकल इमरजेंसी के दौरान को-पेमेंट और अन्य नॉन-कवर्ड खर्चों को संभाला जा सके।

इस प्रस्ताव का मुख्य संतुलन कम प्रीमियम और अधिक व्यक्तिगत जिम्मेदारी के बीच है। पॉलिसीहोल्डर को सस्ता प्रीमियम मिल सकता है, लेकिन क्लेम के समय उसका वित्तीय योगदान बढ़ जाएगा। इसलिए अगर यह प्रस्ताव लागू होता है, तो हेल्थ इंश्योरेंस चुनते समय केवल प्रीमियम और सम इंश्योर्ड नहीं, बल्कि संभावित आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च और उपलब्ध लिक्विड सेविंग्स भी उतने ही महत्वपूर्ण होंगे।

डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल एजुकेशनल और इंफॉर्मेशनल उद्देश्य के लिए है और यह इन्वेस्टमेंट एडवाइस या किसी भी सिक्योरिटीज को खरीदने या बेचने की रिकमेंडेशन नहीं है। यहाँ जिन कंपनियों का उल्लेख किया गया है, उन्हें मार्केट डेवलपमेंट्स के संदर्भ में केवल उदाहरण के रूप में बताया गया है। इन्वेस्टर्स को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी इन्वेस्टमेंट डिसीजन लेने से पहले अपनी खुद की रिसर्च करें और अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से परामर्श करें।

सिक्योरिटीज मार्केट में किए गए इन्वेस्टमेंट मार्केट जोखिम के अधीन होते हैं। इन्वेस्ट करने से पहले सभी संबंधित डॉक्यूमेंट्स को ध्यानपूर्वक से पढ़ें।

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