आज की दुनिया में सेमीकंडक्टर या चिप्स किसी भी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस का सबसे अहम् हिस्सा माना जा रहा है। मोबाइल फोन से लेकर लड़ाकू विमानों तक हर चीज़ में चिप्स का इस्तेमाल होता है और इसलिए दुनियाभर में सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री से तेजी से आगे बढ़ रही है। इसके साथ ही भारत सरकार सेमीकंडक्टर बनाने में एक प्रमुख खिलाड़ी बनने का प्रयास कर रहा है।
चलिए समझते है, कि अभी भारत में सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री की क्या स्थिति है, और भारत को ग्लोबल सेमीकंडक्टर हब बनने में किन -किन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
क्या है मामला?
भारत के सेमीकंडक्टर मिशन को न सिर्फ सरकारी पहल बल्कि प्राइवेट क्षेत्र से भी बल मिल रहा है। हाल ही में, चेन्नई की सॉफ्टवेयर-एज-ए-सर्विस कंपनी ज़ोहो (Zoho) ने तमिलनाडु में एक कमर्शियल सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग यूनिट शुरू करने की योजना की घोषणा की।
लेकिन ज़ोहो अकेला नहीं है। मार्च 2024 में, भारत ने सेमीकंडक्टर निर्माण के अपने लक्ष्य की ओर एक महत्वपूर्ण कदम उठाया। जहां तीन सेमीकंडक्टर प्लांट्स के रूप में गुजरात के धोलेरा में एक चिप मैन्युफैक्चरिंग प्लांट और गुजरात के साणंद और असम के मोरीगांव में दो ATMP (असेंबली, टेस्टिंग, मार्किंग और पैकेजिंग) प्लांट्स की आधारशिला रखी।
इसके साथ ही हाल ही में, नई दिल्ली में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और उनके अमेरिकी समकक्ष जेक सुलिवान के नेतृत्व में हुई महत्वपूर्ण बैठक में, भारत और अमेरिका ने सप्लाई चैन, सेमीकंडक्टर और महत्वपूर्ण खनिजों पर निकट सहयोग करने का फैसला किया है।
भारत के सामने क्या चुनौतियां हैं?
उच्च लागत और लंबा समय: सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग यूनिट स्थापित करना एक बहुत महंगा और समय लेने वाला काम है। एक फेब्रिकेशन प्लांट स्थापित करने में 10 से 20 बिलियन डॉलर का खर्च आ सकता है, और इसे शुरु होने में कई साल लग सकते हैं।
कुशल इंजीनियर्स की कमी: टीमलीज डिग्री अप्रेंटिसशिप की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत को 2027 तक सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री में 250,000 से 300,000 प्रोफेशनल्स की कमी का सामना करना पड़ सकता है।
अनुभव की कमी: भारत में अभी तक सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री का कोई बड़ा अनुभव नहीं है। इसका मतलब है कि देश को इस क्षेत्र में अग्रणी देशों से सीखना होगा।
ग्लोबल प्रतिस्पर्धा: भारत को दक्षिण कोरिया, ताइवान, चीन और अमेरिका जैसे देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा।
इन चुनौतियों के बावजूद, भारत सरकार सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठा रही है।
भारत इन चुनौतियों को कैसे पार कर रहा है?
भारत सरकार सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री को बढ़ावा देने के लिए कई पहलों पर काम कर रही है।
भारत सेमीकंडक्टर मिशन: यह ₹76,000 करोड़ रुपये की स्कीम देश में सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स और इकोसिस्टम को स्थापित करने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करती है।
डिजाइन लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम (D-LIcS): यह स्कीम भारतीय कंपनियों को सेमीकंडक्टर चिप्स के डिजाइन, विकास और परीक्षण के लिए वित्तीय प्रोत्साहन देती है।
विदेशी कंपनियों को आकर्षित करना: सरकार विदेशी कंपनियों को भारत में सेमीकंडक्टर यूनिट स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित कर रही है।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
भारतीय सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री अभी शुरुआती दौर में है, लेकिन इसमें निवेशकों के लिए कई आकर्षक अवसर हैं, क्योंकि अगर हम बीते वर्षो में सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री में काम करने वाली भारतीय कंपनियों के रिटर्न की बात करें तो अन्य इंडस्ट्री की तुलना में बेहतरीन प्रदर्शन रहा है, लेकिन बिना रिसर्च किसी कंपनी में भविष्य में भी ऐसे ही रिटर्न की उम्मीद करना, सही विचार नहीं होगा।

भविष्य की बातें
हाल ही में सरकार ने घोषणा की थी कि भारत के 300 से अधिक प्रमुख कॉलेज विशेष रूप से सेमीकंडक्टर पाठ्यक्रम शुरू करेंगे। इससे देश में सेमीकंडक्टर प्रोफेशनल्स की एक मजबूत पाइपलाइन बनाने में मदद मिलेगी।
इसके साथ ही, अनुमान है कि भारतीय सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री 2030 तक 100 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है। यह तेजी से विकास निवेशकों के लिए एक आकर्षक अवसर है और यह दर्शाता है कि भारत सेमीकंडक्टर क्षेत्र में एक प्रमुख हब बनने की राह पर है।
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*आर्टिकल में शामिल कंपनियों के नाम केवल सूचना के उद्देश्य के लिए है। यह निवेश सलाह नहीं है।
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