भारत में चावल की प्राइस में हाल के महीनों में तेज बढ़ोतरी देखने को मिली है। खासकर बासमती चावल की प्राइस अब करीब ₹100 प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है। इसके पीछे कमजोर फसल, बारिश की कमी और अंतरराष्ट्रीय मार्केट से मजबूत डिमांड जैसे कई कारण काम कर रहे हैं। ऐसे समय में जब नई फसल की आवक शुरू हो चुकी है, शुरुआती प्राइस भी पिछले साल के मुकाबले हाई बनी हुई हैं।
आइए समझते हैं कि चावल की प्राइस में यह तेजी क्यों आई है, इसका डोमेस्टिक मार्केट और निर्यात पर क्या असर पड़ सकता है और आगे प्राइस की दिशा किन फैक्टर्स पर निर्भर करेगी।
क्या है मामला?
बासमती और नॉन-बासमती दोनों तरह के चावल की प्राइस में बढ़ोतरी हुई है। बिज़नेस टुडे के अनुसार, Q1 FY27 में बासमती की प्राइस एक साल पहले की तुलना में 15-20% बढ़ीं, जबकि नॉन-बासमती चावल की प्राइस में 20-25% की वृद्धि हुई। बासमती की प्राइस करीब ₹100 प्रति किलोग्राम हो गई है, जो एक साल पहले लगभग ₹85 प्रति किलोग्राम थी।
इस तेजी के पीछे पहली बड़ी वजह कम फसल है। अक्टूबर-दिसंबर 2025 की फसल पंजाब और हरियाणा में शुरुआती बाढ़ से प्रभावित हुई थी। इसके बाद पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू होने के साथ अंतरराष्ट्रीय खरीदारों की ओर से फूड सिक्योरिटी के लिए डिमांड अचानक बढ़ गई। खासकर गल्फ देशों की भारतीय चावल में दिलचस्पी मजबूत बनी हुई है। सऊदी अरब भारत का सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है।
FY26 में भारत ने 154 देशों को रिकॉर्ड 6.52 मिलियन टन बासमती चावल निर्यात किया। इससे डोमेस्टिक प्राइस पर भी डिमांड का दबाव बढ़ा है।
कमजोर बारिश ने फसल पर बढ़ाया दबाव
चावल की प्राइस में तेजी का दूसरा महत्वपूर्ण कारण इस साल बारिश की कमी है। रॉयटर्स के अनुसार, 2026/27 में भारत का चावल उत्पादन करीब 10 मिलियन टन घट सकता है। यह पिछले साल के रिकॉर्ड 154 मिलियन टन उत्पादन से लगभग 6.5% की गिरावट होगी और 2009/10 के बाद सबसे बड़ी गिरावट हो सकती है।
1 जून से शुरू हुए चार महीने के मानसून सीजन के दौरान भारत में सामान्य से 15% कम बारिश हुई है। कुछ प्रमुख चावल उत्पादक राज्यों में बारिश की कमी 42% तक पहुंच गई। 11 सितंबर तक गर्मियों में बोए गए चावल का क्षेत्रफल 42.68 मिलियन हेक्टेयर था, जो एक साल पहले की तुलना में करीब 4% कम है। गर्मियों में बोई जाने वाली फसल देश के कुल चावल उत्पादन का 80% से अधिक हिस्सा देती है।
दक्षिण भारत में प्रीमियम किस्मों जैसे पोन्नी, सोना मसूरी और BPT के रकबे में भी बारिश की कमी के कारण गिरावट आई है। इन प्रीमियम किस्मों की प्राइस में करीब 50% तक की तेजी की रिपोर्ट सामने आई है। इससे स्पष्ट है कि उत्पादन का दबाव केवल बासमती तक सीमित नहीं है, बल्कि कई प्रीमियम राइस वैरायटीज भी इसकी चपेट में हैं।
निर्यात डिमांड और सप्लाई का बदलता समीकरण
कम उत्पादन के बावजूद भारत के पास पर्याप्त स्टॉक मौजूद है, जिससे फिलहाल निर्यात पर तत्काल संकट की स्थिति नहीं दिख रही है। 1 सितंबर तक राज्य स्तर पर चावल और अनमिल्ड धान का कुल स्टॉक रिकॉर्ड 59.6 मिलियन टन था, जबकि 1 अक्टूबर तक सरकार का लक्ष्य 10.3 मिलियन टन था। यह बड़ा स्टॉक भारत को कम उत्पादन के बावजूद निर्यात जारी रखने में मदद कर सकता है।
दूसरी तरफ, अंतरराष्ट्रीय मार्केट में भारतीय बासमती की डिमांड मजबूत बनी हुई है। पिछले साल बासमती की औसत प्राइस करीब $870 थी, जिससे भारतीय चावल अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के लिए आकर्षक रहा। इस साल प्राइस बढ़ने से कुछ मार्केट्स में डिमांड प्रभावित हो सकती है, लेकिन फिलहाल डिमांड में स्पष्ट कमजोरी दिखाई नहीं दे रही है।
पश्चिम एशिया में सप्लाई रूट में बदलाव भी देखने को मिला है। जॉर्डन को भारतीय चावल का निर्यात आठ गुना बढ़ा, जबकि इराक को निर्यात करीब 50% घटा। इसका एक कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जुड़ी सप्लाई बाधाएं और शिपमेंट का रीरूटिंग बताया गया है।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
चावल की मौजूदा प्राइस का असर एग्री कमोडिटी से जुड़े कारोबार और राइस निर्यात सेक्टर पर पड़ सकता है। एक तरफ कम उत्पादन और हाई डोमेस्टिक प्राइस प्रीमियम राइस की प्राइस को सपोर्ट कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ निर्यात डिमांड मजबूत रहने से मार्केट में सप्लाई का दबाव बना रह सकता है।
हालांकि, रिकॉर्ड 59.6 मिलियन टन स्टॉक एक महत्वपूर्ण कुशन प्रदान करता है। इसका मतलब है कि उत्पादन में अनुमानित 10 मिलियन टन की गिरावट के बावजूद भारत के पास निर्यात जारी रखने के लिए पर्याप्त इन्वेंटरी मौजूद है। दूसरी ओर, किसानों को प्रीमियम किस्मों के लिए खुले मार्केट में बेहतर प्राइस मिलने की संभावना सरकारी खरीद को प्रभावित कर सकती है।
भविष्य की बातें
आने वाले महीनों में चावल की प्राइस की दिशा मुख्य रूप से नई फसल की वास्तविक आवक, बारिश से हुए नुकसान, डोमेस्टिक प्राइस और अंतरराष्ट्रीय डिमांड पर निर्भर करेगी। बासमती की नई फसल की आवक शुरू हो चुकी है, लेकिन 1509 धान की शुरुआती आवक प्राइस पिछले साल की तुलना में करीब 20% अधिक हैं। हालांकि यह शुरुआती चरण है और आगे आवक बढ़ने के साथ प्राइस में बदलाव संभव है।
नॉन-बासमती चावल की नई फसल की आवक अक्टूबर के मध्य से अंत तक शुरू होने की उम्मीद है। इसलिए मार्केट को वास्तविक सप्लाई की तस्वीर आने में अभी समय लगेगा। फिलहाल कमजोर उत्पादन की आशंका प्राइस को सपोर्ट कर रही है, जबकि रिकॉर्ड स्टॉक भारत को निर्यात जारी रखने का सहारा दे रहा है। यही संतुलन आने वाले समय में चावल मार्केट की दिशा तय करने वाला प्रमुख फैक्टर होगा।
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