चीनी कंपनियों पर टेंडर बैन हटाने की तैयारी: क्या है वजह?

चीनी कंपनियों पर टेंडर बैन हटाने की तैयारी: क्या है वजह?
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भारत सरकार एक बार फिर उन नीतिगत प्रतिबंधों पर विचार कर रही है, जो पिछले पांच वर्षों से चीनी कंपनियों को सरकारी टेंडर्स में भाग लेने से रोकते आए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, वित्त मंत्रालय और संबंधित विभाग इस बात पर विचार कर रहे हैं कि क्या इन पाबंदियों को आंशिक या पूरी तरह हटाया जाए। यह कदम ऐसे समय में सामने आया है, जब भारत बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स, पावर सेक्टर और मैन्युफैक्चरिंग में लागत, प्रतिस्पर्धा और टेक्नोलॉजी एक्सेस जैसे मुद्दों से जूझ रहा है। इस संभावित बदलाव का असर न केवल भारत-चीन व्यापारिक संबंधों पर पड़ सकता है, बल्कि डोमेस्टिक इंजीनियरिंग और कैपिटल गुड्स कंपनियों के शेयर्स पर भी साफ दिखाई देने लगा है।

आइए इस नीतिगत मुद्दे को समझते है और देखते है कि अगर यह लागू होता है तो भारत के किन सेक्टर्स पर प्रभाव पड़ सकता है।

क्या है मामला?

भारत सरकार चीन की कंपनियों के लिए सरकारी कॉन्ट्रैक्ट्स से जुड़ी पांच साल पुरानी पाबंदियों को हटाने पर विचार कर रही है। रॉयटर्स के अनुसार, बॉर्डर तनाव में कमी के बाद न्यू दिल्ली चीन के साथ कारोबारी रिश्तों को फिर से मजबूत करना चाहती है।

ये पाबंदियां 2020 में दोनों देशों की सेनाओं के बीच हुए घातक संघर्ष के बाद लगाई गई थीं। इसके तहत चीनी कंपनियों को भारतीय सरकारी कॉन्ट्रैक्ट्स में भाग लेने से पहले एक सरकारी समिति के साथ रजिस्ट्रेशन कराना और पॉलिटिकल व सिक्योरिटी क्लियरेंस लेना जरूरी था।

इन नियमों की वजह से चीनी कंपनियां भारत के उन सरकारी प्रोजेक्ट्स से लगभग बाहर हो गई थीं, जिनकी कुल अनुमानित वैल्यू $700 बिलियन से $750 बिलियन के बीच बताई जाती है। अब अगर ये प्रतिबंध हटते हैं, तो सरकारी टेंडर्स में प्रतिस्पर्धा बढ़ने के साथ-साथ भारत-चीन के कारोबारी संबंधों में भी नई गति देखने को मिल सकती है।

नीतिगत ढील के पीछे आर्थिक मजबूरियां

प्रस्तावित ढील की बुनियाद आर्थिक जरूरतों पर टिकी हुई है। कई सरकारी विभागों, खासकर पावर और हेवी इंडस्ट्री से जुड़े मंत्रालयों ने मौजूदा प्रतिबंधों के चलते सामने आ रही व्यावहारिक सीमाओं को रेखांकित किया है।

पावर सेक्टर की चिंताएं सबसे ज्यादा सामने आई हैं। सेक्टर के मुताबिक, चीनी आयात पर लगे कर्ब्स की वजह से थर्मल पावर कैपेसिटी के विस्तार में देरी हो रही है, जबकि भारत का लक्ष्य अगले एक दशक में इसे लगभग 307 GW तक ले जाने का है।

इसी को ध्यान में रखते हुए एक हाई-लेवल कमेटी जिसमें पूर्व कैबिनेट सेक्रेटरी राजीव गौबा के इनपुट भी शामिल हैं ने नियमों में ढील की सिफारिश की है। कमेटी का मानना है कि यदि कॉम्पिटिटिव बिडिंग और स्पेशलाइज्ड टेक्नोलॉजी तक पहुंच नहीं मिली, तो अहम राष्ट्रीय प्रोजेक्ट्स की प्रगति प्रभावित हो सकती है।

शेयर मार्केट की प्रतिक्रिया

चीनी कंपनियों पर लगे प्रतिबंध हटाने की खबर का असर कैपिटल गुड्स सेक्टर के शेयर्स पर साफ नजर आया। 8 जनवरी के ट्रेडिंग में BHEL के शेयर 10% के लोअर सर्किट तक फिसल गए। साथ ही, खबर के बाद लार्सन एंड टूब्रो (L&T) के शेयर भी इंट्राडे में करीब 12% तक टूटे।

रेलवे सेक्टर से जुड़े शेयर्स में भी दबाव दिखा। सीमेंस (Siemens) के शेयर 4% से ज्यादा गिरे, क्योंकि चीन की CRRC रेलवे कॉन्ट्रैक्ट्स में इसकी बड़ी प्रतिस्पर्धी मानी जाती है। अगर कमेटी की सिफारिशें लागू होती हैं, तो CRRC को भी रेलवे टेंडर्स में हिस्सा लेने की अनुमति मिल सकती है।

अन्य कैपिटल गुड्स कंपनियों पर भी इसका असर पड़ा। जहां हिताची एनर्जी और ABB इंडिया के शेयर 4-4.5% तक गिरे। दिन के अंत में, BHEL में मामूली रिकवरी दिखी लेकिन स्टॉक फिर भी 9% की गिरावट के साथ बंद हुआ। L&T करीब 2.7% नीचे बंद हुआ, जबकि ABB इंडिया और सीमेंस इंडिया के शेयर क्रमशः 5% और 4.2% की गिरावट के साथ बंद हुए।

निवेशकों के लिए इसमें क्या है?

संभावित नीतिगत बदलाव की खबर ने जनवरी 08, 2026 (गुरुवार) को भारतीय शेयर मार्केट में हलचल पैदा कर दी। निवेशकों ने जैसे ही चीनी सरकारी कंपनियों की संभावित वापसी से बढ़ती प्रतिस्पर्धा का आकलन किया, वैसे ही डोमेस्टिक कैपिटल गुड्स और इंजीनियरिंग कंपनियों के शेयर्स पर दबाव दिखा।

पिछले पांच वर्षों में प्रोटेक्शनिस्ट नीतियों का इन भारतीय कंपनियों को सीधा फायदा मिला था। चीनी कंपनियों की गैर-मौजूदगी में इन फर्मों ने सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स का बड़ा हिस्सा हासिल किया। अब यदि चीनी प्लेयर्स की दोबारा एंट्री होती है, तो निवेशकों को ऑर्डर फ्लो, मार्जिन और कॉम्पिटिशन के मोर्चे पर नए समीकरणों को ध्यान में रखना होगा।

भविष्य की बातें

हालांकि इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने में वित्त मंत्रालय की अहम भूमिका है, लेकिन अंतिम फैसला प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के हाथ में होगा। रॉयटर्स के स्त्रोतों के अनुसार, अगर कोई ढील दी जाती है, तो वह पूरी तरह नियंत्रित और सतर्क तरीके से होगी, क्योंकि संवेदनशील इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी सुरक्षा चिंताएं अब भी सर्वोच्च प्राथमिकता बनी हुई हैं।

इसके बावजूद, यह कदम 2024 के अंत और 2025 के दौरान दिखे भारत-चीन संबंधों में आए कूटनीतिक ‘थॉ’ के अनुरूप है। इससे संकेत मिलता है कि राष्ट्रीय विकास को गति देने के लिए न्यू दिल्ली अब कुछ आर्थिक सहयोगों को सीमा विवादों से अलग करके देखने के लिए अधिक तैयार नजर आ रही है।

*आर्टिकल में शामिल कंपनियों के नाम केवल सूचना के उद्देश्य के लिए है। यह निवेश सलाह नहीं है।
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