यूक्रेन युद्ध के बाद ग्लोबल एनर्जी मार्केट में बड़ा बदलाव देखने को मिला है और भारत इस बदलते समीकरण का एक अहम हिस्सा बनकर उभरा है। पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के बीच भारत ने रूसी क्रूड ऑइल का आयात तेजी से बढ़ाया। हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक भारत रूस से करीब 144 बिलियन यूरो का ऑइल आयात कर चुका है। यह आंकड़ा न केवल भारत की एनर्जी रणनीति को दर्शाता है, बल्कि ग्लोबल जिओपॉलिटिकल, व्यापारिक दबाव और निवेशकों की चिंता को भी सामने लाता है।
आइए इस पर विस्तार से गौर करें और निवेशकों पर इसके प्रभाव को समझें।
क्या है मामला?
यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से भारत ने रूस से करीब 144 बिलियन यूरो वैल्यू का क्रूड ऑइल आयात किया है। यूरोपीय थिंक टैंक के अनुसार, फरवरी 2022 से अब तक रूस ने वैश्विक ऑइल बिक्री से कुल लगभग 1 ट्रिलियन यूरो की कमाई की है।
CREA के मुताबिक, रूस से ऑइल खरीदने में भारत चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा खरीदार रहा है। चीन ने इस अवधि में रूस से कुल 293.7 बिलियन यूरो के फॉसिल फ्यूल्स खरीदे, जिसमें ऑइल, कोयला और गैस शामिल हैं। भारत ने रूस से कुल 162.5 बिलियन यूरो के फॉसिल फ्यूल्स खरीदे, जिसमें 143.88 बिलियन यूरो का ऑइल और 18.18 बिलियन यूरो का कोयला शामिल है।
वहीं, यूरोपीय यूनियन ने भी रूस से 218.1 बिलियन यूरो के फॉसिल फ्यूल्स का आयात किया, जिसमें ऑइल, गैस और कोयला शामिल हैं। ये आंकड़े दिखाते हैं कि ग्लोबल प्रतिबंधों के बावजूद रूस का ऊर्जा निर्यात बड़े पैमाने पर जारी रहा।
भारतीय रिफाइनरियां और अमेरिकी दबाव
रूस से क्रूड ऑइल के आयात को लेकर भारत पर अमेरिकी दबाव बना हुआ है, लेकिन इसके बावजूद देश की सरकारी रिफाइनरियां (PSUs) अपनी खरीद जारी रखे हुए हैं। अगस्त में अमेरिका ने रूस से ऑइल आयात को आधार बनाकर भारतीय वस्तुओं पर 25% सेकेंडरी टैरिफ लगाया था, जबकि नवंबर के अंत में लुकोइल (Lukoil) और रोसनेफ्ट (Rosneft) पर भी प्रतिबंध लगाए गए।
CNBC TV18 के अनुसार, दिसंबर में भारत की कुल रूसी ऑइल मांग में जो गिरावट दिखी, वह मुख्य रूप से रिलायंस इंडस्ट्रीज की खरीद घटने के कारण थी। विश्लेषकों के अनुसार, इस कमी की भरपाई आंशिक रूप से पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स (PSUs) ने की। IOC (Indian Oil Corporation) और BPCL (Bharat Petroleum Corporation) जैसी सरकारी कंपनियां अब भी रूस से कच्चा ऑइल खरीद रही हैं।
भारत–रूस ऑइल व्यापार
यूक्रेन युद्ध के बाद भारत, जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऑइल आयातक है, रूस से डिस्काउंटेड क्रूड ऑइल का सबसे बड़ा खरीदार बनकर उभरा। पश्चिमी प्रतिबंधों और यूरोप की घटती डिमांड के चलते भारत में रूसी ऑइल की हिस्सेदारी 1% से भी कम से बढ़कर करीब 40% तक पहुंच गई। नवंबर 2025 से पहले यह हिस्सा लगभग 35% था।
हालांकि, अमेरिका द्वारा रोसनेफ्ट और लुकोइल पर नए प्रतिबंध लागू होने के बाद यह हिस्सेदारी घटकर 25% से नीचे आ गई है। CREA के अनुसार, जनवरी की शुरुआत में भारत की रूसी ऑइल की दैनिक खरीद करीब €72.92 मिलियन रही, जो नवंबर के अंत में €130.49 मिलियन और जुलाई 2023 के पीक €189.07 मिलियन से काफी कम है।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयर 6 जनवरी 2025 को 4.4% गिर गए, जो 4 जून 2024 के बाद की सबसे बड़ी गिरावट रही। यह गिरावट तब आई जब कंपनी ने स्पष्ट किया कि वह जनवरी में रूसी क्रूड ऑइल खरीदने की उम्मीद नहीं कर रही है। रिलायंस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर बताया कि उनकी जामनगर रिफाइनरी को पिछले तीन सप्ताह से रूसी ऑइल का कोई कार्गो नहीं मिला है और इस महीने आगे भी डिलीवरी की संभावना नहीं है।
2022 से अब तक सस्ते रूसी ऑइल की सबसे बड़ी खरीदार रही रिलायंस, अपनी उन्नत रिफाइनरी क्षमता के चलते अलग-अलग किस्म के क्रूड प्रोसेस करने में सक्षम है। हालांकि, रूसी ऑइल की हिस्सेदारी घटने से प्राइवेट रिफाइनरियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है, खासकर उन कंपनियों पर जो डिस्काउंटेड क्रूड पर निर्भर थीं। इसके मुकाबले IOC और BPCL जैसी PSU रिफाइनरियां अपेक्षाकृत स्थिर नजर आती हैं, क्योंकि वे नॉन-प्रतिबंधित सप्लायर्स से सीमित खरीद जारी रखे हुए हैं। निवेशकों के लिए यह संकेत है कि एनर्जी सेक्टर में कंपनी-विशेष रणनीति और सप्लाई सोर्स आने वाले समय में शेयर्स की दिशा तय कर सकते है।
भविष्य की बातें
आने वाले समय में भारत–रूस तेल व्यापार पर अनिश्चितता और बढ़ सकती है। Kpler के आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर में भारत का रूसी क्रूड ऑइल का आयात MoM 595 हजार बैरल प्रतिदिन (kbpd) घटकर 1.24 मिलियन बैरल प्रतिदिन (mbpd) रह गया, जो दिसंबर 2022 के बाद का सबसे निचला स्तर है। यह गिरावट दिखाती है कि भारत की खरीद रणनीति पहले ही बदलने लगी है।
इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि अगर भारत रूसी तेल की खरीद को और कम नहीं करता है, तो अमेरिका भारतीय प्रोडक्ट्स पर टैरिफ बढ़ा सकता है। यह बयान भारत की एनर्जी नीति और रिफाइनरियों के फैसलों पर अतिरिक्त दबाव डालता है। आगे चलकर भारत के लिए सस्ता ऑइल, एनर्जी सुरक्षा और ग्लोबल कूटनीतिक दबाव इन तीनों के बीच संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती रहेगा, और इसी संतुलन पर ऑइल कंपनियों व निवेशकों की दिशा तय होगी।
*आर्टिकल में शामिल कंपनियों के नाम केवल सूचना के उद्देश्य के लिए है। यह निवेश सलाह नहीं है।
*डिस्क्लेमर: तेजी मंदी डिस्क्लेमर