सिक्योरिटी बनाम रेजिलिएंस: क्या है ज़्यादा ज़रूरी

सिक्योरिटी बनाम रेजिलिएंस: क्या है ज़्यादा ज़रूरी
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आज के समय में आर्थिक तनाव सिर्फ कम आय या बढ़ते खर्च के कारण नहीं होता, बल्कि उस अनिश्चित माहौल से होता है जो कभी भी हमारी ज़िंदगी की दिशा बदल सकता है। नौकरी की स्थिरता कम हुई है, स्वास्थ्य खर्च लगातार बढ़ रहे हैं और दुनिया भर की घटनाएँ हमारी जेब पर सीधा असर डाल रही हैं। ऐसे माहौल में दो शब्द अक्सर सुनाई देते हैं फाइनेंशियल सिक्योरिटी और फाइनेंशियल रेज़िलिएंस। दोनों देखने में एक जैसे लगते हैं, लेकिन इनका अर्थ, इनका असर और इनसे मिलने वाली राहत एक-दूसरे से बिल्कुल अलग है।

आइए फाइनेंशियल सिक्योरिटी और रेजिलिएंस के बीच अंतर को समझें और जानें केवल सुरक्षित होना ही काफी नहीं है, बल्कि मजबूत होना ज़्यादा ज़रूरी है।

फाइनेंशियल सिक्योरिटी क्या है?

फाइनेंशियल सिक्योरिटी वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति को यह भरोसा होता है कि उसकी आमदनी, बचत और योजनाएँ उसके रोज़मर्रा के खर्च और भविष्य की ज़रूरतों को बिना तनाव पूरा कर सकती हैं। यह एक तरह का आर्थिक आराम है, जिसमें व्यक्ति को यह महसूस होता है कि उसके पास पर्याप्त बचत है, कर्ज कम है और घर-परिवार की जरूरतें आसानी से पूरी हो रही हैं।

सिक्योरिटी का मतलब है नियमित आय, संभाला हुआ कर्ज, चल रही बचत और वह आधार जो व्यक्ति को आर्थिक रूप से स्थिर रखे। लेकिन सिक्योरिटी की अपनी सीमाएं होती हैं। यह स्थिति सामान्य दिनों में तो आराम देती है, लेकिन अचानक आने वाली कठिन परिस्थितियों में यह नींव हिल सकती है। अगर नौकरी चली जाए, कोई गंभीर बीमारी आ जाए या किसी वजह से आय कम हो जाए, तो सिर्फ सिक्योरिटी व्यक्ति को संभालने के लिए काफी नहीं होती है।

फाइनेंशियल रेज़िलिएंस क्या है?

फाइनेंशियल रेज़िलिएंस सिर्फ सुरक्षित होने से कहीं आगे की चीज़ है। इसका मतलब है आर्थिक झटकों से जल्दी उभरने की क्षमता। चार्ल्स स्टेनली इसे इस तरह समझाता है कि रेज़िलिएंस वह शक्ति है जो किसी व्यक्ति को कठिन समय के बाद फिर से संभलने में मदद करती है। यह सिर्फ पैसों की स्थिति नहीं है, बल्कि मानसिक तैयारी और समझदारी से फैसले लेने की क्षमता भी है।

रेज़िलिएंस बनता है सही योजना से, जैसे मजबूत इमरजेंसी फंड, उचित इंश्योरेंस, जोखिम को बांटने वाली निवेश योजना, और बदलती परिस्थितियों के अनुसार फैसला लेने की क्षमता। रेज़िलिएंस में यह स्वीकार किया जाता है कि अनिश्चितता जीवन का हिस्सा है, और इसका सामना करने के लिए व्यक्ति को केवल बचत नहीं बल्कि समझ और तैयारी भी चाहिए।

रेज़िलिएंस वह ढाल है जो जीवन के झटकों को पूरी तरह रोकती नहीं, लेकिन उनका असर कम कर देती है ताकि व्यक्ति फिर से स्थिर होकर आगे बढ़ सके।

सिक्योरिटी और रेज़िलिएंस में मूल अंतर

इन दोनों के बीच का अंतर बहुत कम है, लेकिन बेहद महत्वपूर्ण है।

  • फाइनेंशियल सिक्योरिटी आज को स्थिर रखती है।
  • फाइनेंशियल रेज़िलिएंस कल को सुरक्षित बनाती है।

सिक्योरिटी का आधार स्थिरता है जहां सब कुछ सामान्य और आरामदायक चले। रेज़िलिएंस का आधार क्षमता है जहां मुश्किल आने पर भी व्यक्ति संभल जाए।

सिक्योरिटी एक बनी-बनाई स्थिति है। रेज़िलिएंस एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है।

  • सिक्योरिटी कहती है ‘मेरी वर्तमान स्थिति ठीक है’।
  • रेज़िलिएंस कहती है ‘अगर परिस्थिति बदल जाए, तब भी मैं खुद को बचा सकता हूँ’।

इसीलिए आधुनिक आर्थिक माहौल में रेज़िलिएंस का महत्व तेजी से बढ़ा है। दुनिया में बदलाव तेज़ हैं, खर्च बढ़ रहे हैं और जोखिम पहले से कहीं अधिक है। ऐसे समय में सिर्फ सिक्योर होना पर्याप्त नहीं, बल्कि रेज़िलिएंस ही व्यक्ति की सबसे बड़ी ताकत बनती है।

आज के समय में किसकी जरूरत ज़्यादा है?

कुछ साल पहले तक लोग फाइनेंशियल सिक्योरिटी को ही अंतिम लक्ष्य मानते थे, एक स्थिर नौकरी, थोड़ी बचत और इंश्योरेंस काफी माना जाता था। लेकिन आज की ज़िंदगी कहीं ज़्यादा जटिल हो गई है। खर्च बढ़े हैं, स्वास्थ्य जोखिम बढ़ रहे हैं, नौकरी की स्थिरता कम हुई है और अल्टरनेटिव आय के स्रोत भी बदल रहे हैं।

चार्ल्स स्टेनली के अनुसार, आज की दुनिया में रेज़िलिएंस बनाना जरूरी है यानी पर्याप्त सुरक्षा फंड, सही कवरेज, कम कर्ज और संतुलित निवेश। इसके साथ ही, रेज़िलिएंस कोई एक बार बनने वाली चीज़ नहीं, बल्कि यह उम्र, मौके और परिस्थितियों के साथ बदलती रहती है।

इसीलिए आज सिर्फ सिक्योरिटी से काम नहीं चलता। अगर योजना में रेज़िलिएंस नहीं है, तो एक बड़ी घटना पूरी स्थिति बदल सकती है। लेकिन अगर रेज़िलिएंस मौजूद है, तो सीमित साधनों में भी व्यक्ति मुश्किल समय में टिक सकता है।

निष्कर्ष

फाइनेंशियल सिक्योरिटी और फाइनेंशियल रेज़िलिएंस दोनों ही मजबूत आर्थिक जीवन के दो पहिये हैं। सिक्योरिटी आज को आसान बनाती है। रेज़िलिएंस कल को सुरक्षित करती है। इसलिए सबसे अच्छी आर्थिक रणनीति वही है जिसमें दोनों संतुलित हों, एक स्थिर नींव और उसके ऊपर परिस्थितियों के अनुसार ढल सकने वाली मजबूती। यही संतुलन व्यक्ति को न सिर्फ सुरक्षित रखता है, बल्कि किसी भी आर्थिक चुनौती के सामने टिके रहने की क्षमता भी देता है।

*यह आर्टिकल केवल जानकारी के उद्देश्य के लिए है। यह कोई निवेश सलाह नहीं है।
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