सोने में 40% तेजी के बाद: क्या यह निवेश का सही समय है?

सोने में 40% तेजी के बाद: क्या यह निवेश का सही समय है?
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भारत में त्योहारी सीजन का मतलब परंपरा, उत्सव और सोने की खरीदारी है। दशहरा और दिवाली जैसे पर्वों पर सोना खरीदना शुभ माना जाता है, जो देश की वार्षिक सोने की बिक्री का लगभग एक-तिहाई हिस्सा है। लेकिन 2025 का त्योहारी सीजन एक बड़े सवाल के साथ आया है क्योंकि पिछले 12 महीनों में सोने की प्राइस में 40% से अधिक की वृद्धि हुई है, और 24 कैरेट सोने का भाव पहली बार ₹1 लाख प्रति 10 ग्राम के स्तर को पार कर गया है।

इस वृद्धि ने एक बहस छेड़ दी है क्या भारतीय अपनी सदियों पुरानी परंपरा को निभाते हुए इस प्राइस पर भी सोने को खरीदेंगे, या यह रिकॉर्ड तोड़ प्राइस इस बार उत्सव की चमक को फीका कर देंगी। आइए समझते हैं।

क्या है मामला?

सोने की प्राइस में इस साल का प्रदर्शन शानदार रहा है। 25 सितंबर 2025 को, MCX पर सोने की प्राइस लगभग ₹1,12,400 तक पहुंच गई, जबकि ठीक एक साल पहले सितंबर 2024 में यह लगभग ₹73,000 थी। इसके साथ ही अगर हम ग्लोबल स्तर पर देखें तो सोने की प्राइस लगभग $3,738 प्रति औंस तक पहुंच गयी है, जो सितंबर 2023 की प्राइस से लगभग दोगुनी है।

इस तेजी के पीछे कई बड़े कारण रहे हैं, जिनमें 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व में ईरान, इज़राइल और फिलिस्तीन से जुड़े जिओपॉलिटिकल तनावों ने सोने को एक सुरक्षित निवेश के रूप में स्थापित किया। इन अनिश्चितताओं के कारण दुनिया भर के केंद्रीय बैंक्स ने अपनी सोने की खरीद बढ़ा दी, जिससे डिमांड में वृद्धि हुई और प्राइस आसमान छूने लगीं।

सोने की डिमांड क्यों बढ़ रही है?

फॉरेन करेंसी रिज़र्व में सोने का बढ़ता योगदान: सितंबर 2025 के पहले सप्ताह में भारत का फॉरेक्स रिज़र्व $698.3 बिलियन तक पहुंच गया, जिसमें से अकेले $3.53 बिलियन की बढ़ोतरी सोने की होल्डिंग से हुई।

RBI की बढ़ती दिलचस्पी: रिज़र्व बैंक ने सितंबर 2024 से मार्च 2025 के बीच लगभग 25 मीट्रिक टन सोना खरीदा और कुल होल्डिंग को 882 टन तक पहुंचा दिया।

जियोपॉलिटिकल तनाव और आर्थिक सुरक्षा: सोने की लगातार खरीद इस बात का संकेत है कि केंद्रीय बैंक डॉलर पर अपनी निर्भरता घटाना चाहते हैं। डॉलर की प्राइस में उतार-चढ़ाव और जिओपॉलिटिकल तनाव ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम के लिए खतरा हैं। ऐसे माहौल में सोना एक सुरक्षित एसेट की तरह काम करता है।

केंद्रीय बैंक्स की बढ़ती खरीदारी: सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के केंद्रीय बैंक सोने के रिज़र्व लगातार बढ़ा रहे हैं। उदाहरण के लिए, 2025 की पहली तिमाही में पोलैंड ने 49 टन, चीन ने 13 टन और भारत ने भी 3 टन सोना अपने रिज़र्व में शामिल किया। इसके अलावा, अज़रबैजान, कज़ाकिस्तान, क़तर और मिस्र जैसे देशों ने भी अपनी होल्डिंग बढ़ाई है।

गोल्ड ETFs में रिकॉर्ड निवेश और बढ़ती भागीदारी

निवेश के स्तर पर, भारत में गोल्ड ETFs का चलन बढ़ता जा रहा है। अगस्त में इसमें ₹21.9 बिलियन (US$250 मिलियन) का नेट इनफ्लो दर्ज हुआ, जो 74% MoM की वृद्धि है और इस साल की दूसरी सबसे बड़ी बढ़त है। रिडेम्पशन सात महीनों के न्यूनतम स्तर ₹1.5 बिलियन (US$17 मिलियन) तक गिर गए, यह दर्शाता है कि निवेशक लंबी अवधि तक टिके रहना चाहते हैं।

अगस्त 2025 में गोल्ड ETF में इनफ्लो ने रफ्तार पकड़ी और होल्डिंग्स 70 टन से ऊपर पहुंच गईं, जो निवेशकों की मजबूत दिलचस्पी को दर्शाता है।

गोल्ड ETFs का कुल AUM रिकॉर्ड हाई ₹724 बिलियन (US$8.3 बिलियन) पर पहुंच गया है, जबकि होल्डिंग्स 70 टन तक बढ़ चुकी हैं। अगस्त में ही 1.64 लाख नए फोलियो जुड़े, जिससे सक्रिय फोलियो की कुल संख्या 8.03 मिलियन हो गई, यानी साल की शुरुआत से 24% की वृद्धि हुई। इसके साथ ही, अगस्त में एक नया गोल्ड ETF लॉन्च होने से भारत में ऐसे फंड्स की संख्या 22 तक पहुंच गई है। त्योहारों से पहले फिजिकल निवेश और ETFs दोनों में यह मजबूती संकेत देती है कि पूरे सीजन में सोने की डिमांड उच्च बनी रह सकती है।

निवेशकों के लिए इसमें क्या है?

हाल ही में सोने में आई तेजी के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या प्राइस फिर गिरेंगी, तो इस पर मिंट के अनुसार, VT मार्केट्स के रॉस मैक्सवेल का कहना है कि वर्तमान परिस्थितियों में सोने का दृष्टिकोण सकारात्मक है। अमेरिका की धीमी होती आर्थिक गति, महंगाई का दबाव, केंद्रीय बैंक्स की बढ़ती खरीदारी और आगे संभावित ब्याज दर कटौती लंबे समय तक सोने को सहारा दे सकते हैं।

इसके बावजूद, निकट अवधि की चुनौतियां बनी हुई हैं। यदि ब्याज दर कटौती में देरी होती है या आर्थिक आंकड़े उम्मीद से बेहतर निकलते हैं, तो सोने की प्राइस पर दबाव बन सकता है। दूसरी ओर, लॉन्ग-टर्म में स्थिति रहती है, महंगाई ऊंची बनी रहती है या डॉलर कमजोर होता है, तो सोना फिर से मजबूती पा सकता है और नए रिकॉर्ड स्तर भी छू सकता है।

भविष्य की बातें

चीन को पीछे छोड़ते हुए भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा सोने का उपभोक्ता बन चुका है। अनुमान है कि भारतीय परिवारों के पास करीब 24,000 टन सोना है जो कि दुनिया के सभी केंद्रीय बैंक्स की संयुक्त होल्डिंग से भी अधिक है। गहनों और सिक्कों के रूप में सोना भारत में हमेशा से शुभ और लॉन्गटर्म निवेश माना जाता है, खासकर बच्चों की शादी जैसे बड़े वित्तीय लक्ष्यों को पूरा करने के लिए। यही परंपरा त्योहारों और शादी के सीजन में सोने की खरीद को और बढ़ावा देती है।

हालांकि, बढ़ती प्राइस का असर खरीदारी पैटर्न पर साफ दिख रहा है। फाइनेंशियल एक्सप्रेस के अनुसार, टाइटन की ज्वेलरी डिवीजन के CEO का कहना है कि ₹50,000 से ₹1 लाख की रेंज वाले गहनों की डिमांड कमजोर हुई है, जबकि प्रीमियम और लग्जरी सेगमेंट अभी भी मजबूत प्रदर्शन कर रहे हैं। इस बीच, इंडिया टुडे के अनुसार, UBS और गोल्डमैन सैक्स जैसे बड़े संस्थान सोने की प्राइस में और बढ़ोतरी की संभावना जता रहे हैं $3,800 से लेकर $5,000 प्रति औंस तक। ऐसे में, ग्लोबल मार्केट की उम्मीदें और भारत की परंपरागत कंजम्पशन मिलकर सोने को निवेश और सांस्कृतिक दोनों नजरियों से और भी आकर्षक बना रही हैं।

*यह आर्टिकल केवल जानकारी के उद्देश्य के लिए है। यह कोई निवेश सलाह नहीं है।
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