भारत दुनिया के सबसे बड़े गोल्ड उपभोक्ताओं में से एक है। यहां गोल्ड का सांस्कृतिक और भावनात्मक महत्व बहुत गहरा है, लेकिन इसी के साथ एक समस्या भी जुड़ी हुई है। देश के घरों, लॉकर और मंदिरों में हजारों टन गोल्ड निष्क्रिय पड़ा रहता है, जबकि दूसरी ओर अपनी डिमांड पूरी करने के लिए भारत को हर साल बड़ी मात्रा में गोल्ड आयात करना पड़ता है। इससे फॉरेन करेंसी रिज़र्व पर दबाव पड़ता है और ट्रेड डेफिसिट बढ़ता है।
इसी स्थिति को बदलने के लिए सरकार गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम (GMS) को नए और अधिक प्रभावी स्वरूप में लाने की तैयारी कर रही है। इस कदम का मकसद न केवल लोगों को अपने निष्क्रिय गोल्ड पर रिटर्न कमाने का अवसर देना है, बल्कि डोमेस्टिक गोल्ड को औपचारिक वित्तीय व्यवस्था में शामिल करके आयात पर निर्भरता कम करना भी है। यह योजना भारत की आर्थिक इंडिपेंडेंस की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हो सकती है।
क्या है मामला?
केंद्र सरकार अगले दो हफ्तों में गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम (GMS) का नया स्वरूप पेश कर सकती है। प्रस्तावित बदलाव के तहत अब सिर्फ बैंक ही नहीं, बल्कि देशभर के ज्वेलर्स को भी घरों में रखे निष्क्रिय गोल्ड को जमा करने के लिए कलेक्शन पार्टनर बनाया जा सकता है। इसके बाद यह गोल्ड बैंकिंग और रिफाइनिंग सिस्टम के जरिए औपचारिक वित्तीय व्यवस्था में शामिल होगा। सरकार का लक्ष्य इस नई व्यवस्था के माध्यम से 1,000 टन से अधिक गोल्ड जुटाना है।
गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम (GMS) योजना के तहत लोग अपने घरों में रखा गोल्ड बैंक में जमा कर उस पर ब्याज कमा सकते हैं और मैच्योरिटी पर तय नियमों के अनुसार भुगतान प्राप्त करते हैं। इस बदलाव का उद्देश्य घरों में वर्षों से निष्क्रिय पड़े गोल्ड को उपयोग में लाना और देश की गोल्ड के आयात पर निर्भरता कम करना है।
पहले स्कीम को अपेक्षित सफलता क्यों नहीं मिली?
गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम की शुरुआत वर्ष 2015 में हुई थी। इसका मूल उद्देश्य घरों में पड़े गोल्ड को बैंकिंग सिस्टम में लाकर उसे प्रोडक्टिव बनाना था। जमा किए गए गोल्ड को टेस्ट किया जाता है, पिघलाया जाता है और गोल्ड बार्स में बदला जाता है। जमा करने वाले व्यक्ति को ब्याज मिलता है और मैच्योरिटी पर फिजिकल गोल्ड या नकद राशि वापस मिल सकती है।
हालांकि, योजना को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। भारत में अनुमानित 25,000 टन डोमेस्टिक गोल्ड होने के बावजूद, पिछले दस वर्षों में केवल लगभग 38 से 39 टन गोल्ड ही मोनेटाइज हो सका। भारतीय परिवारों ने भावनात्मक और धार्मिक कारणों से अपने जेवर जमा करने में हिचकिचाहट दिखाई क्योंकि गोल्ड को पिघलाना पड़ता था। इसके अलावा, कागजी कार्यवाही, संभावित टैक्स जांच और सीमित जागरूकता भी बड़ी बाधाएं बनीं। बैंक्स के लिए भी इस स्कीम में व्यावसायिक प्रोत्साहन कम था।
नई योजना में क्या बदलाव प्रस्तावित हैं?
सरकार की नई योजना में ज्वेलर्स को कलेक्शन पार्टनर के रूप में शामिल करने का प्रस्ताव है। इससे स्कीम अधिक सुविधाजनक और जन-सुलभ बनेगी। ज्वेलर्स गोल्ड की प्रारंभिक जांच करेंगे और फिर इसे बैंकिंग तथा रिफाइनिंग सिस्टम से जोड़ेंगे। उन्हें इस सेवा के लिए उचित फीस भी मिलेगी।
इस बदलाव से न केवल भागीदारी बढ़ेगी बल्कि डोमेस्टिक गोल्ड की बड़ी मात्रा औपचारिक अर्थव्यवस्था में आ सकेगी। FY26 में भारत का गोल्ड आयात बिल रिकॉर्ड 71.98 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया था, जो पिछले वर्ष की तुलना में 24% अधिक था। यदि डोमेस्टिक गोल्ड का एक छोटा हिस्सा भी स्कीम के तहत आ जाए तो आयात पर निर्भरता कम हो सकती है और विदेशी मुद्रा की बचत हो सकेगी।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
यह प्रस्ताव उन निवेशकों और आम नागरिकों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है जिनके पास लंबे समय से गोल्ड निष्क्रिय पड़ा है। नई व्यवस्था में यदि प्रक्रिया सरल और पारदर्शी बनी तो वे अपने गोल्ड पर ब्याज कमाने का लाभ उठा सकेंगे। साथ ही, उनका गोल्ड सुरक्षित तरीके से फाइनेंशियल सिस्टम का हिस्सा भी बन जाएगा।
व्यापक स्तर पर देखें तो यह कदम अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान कर सकता है। आयात बिल में कमी से करंट फिस्कल डेफिसिट नियंत्रित रह सकता है। हालांकि, निवेशकों को अंतिम गाइडलाइंस आने तक इंतजार करना चाहिए, जिसमें ब्याज दरें, जमा अवधि, पात्रता शर्तें और रिटर्न स्ट्रक्चर जैसी जानकारी शामिल होगी।
भविष्य की बातें
सरकार की यह पहल भविष्य में गोल्ड को केवल पारंपरिक आभूषण या निवेश के रूप में नहीं, बल्कि एक सक्रिय और उत्पादक वित्तीय एसेट के रूप में स्थापित करने की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकती है। यदि ज्वेलर्स की भागीदारी वाला नया मॉडल सफलतापूर्वक लागू होता है, तो स्कीम की पहुंच देशभर में बढ़ सकती है और घरों में रखा निष्क्रिय गोल्ड औपचारिक वित्तीय व्यवस्था का हिस्सा बनकर ब्याज भी कमा सकेगा।
आने वाले समय की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि नई व्यवस्था लोगों की भावनाओं, सुविधा और पारदर्शिता को कितना ध्यान में रखती है। यदि सरकार इन पहलुओं पर सही से काम करती है, तो डोमेस्टिक गोल्ड का बेहतर उपयोग, आयात में कमी और वित्तीय समावेशन जैसे कई उद्देश्य हासिल किए जा सकेंगे। यह पहल न केवल आर्थिक रूप से बल्कि गोल्ड के प्रति लोगों के नजरिए को बदलने में भी महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल एजुकेशनल और इंफॉर्मेशनल उद्देश्य के लिए है और यह इन्वेस्टमेंट एडवाइस या किसी भी सिक्योरिटीज को खरीदने या बेचने की रिकमेंडेशन नहीं है। यहाँ जिन कंपनियों का उल्लेख किया गया है, उन्हें मार्केट डेवलपमेंट्स के संदर्भ में केवल उदाहरण के रूप में बताया गया है। इन्वेस्टर्स को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी इन्वेस्टमेंट डिसीजन लेने से पहले अपनी खुद की रिसर्च करें और अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से परामर्श करें।
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