भारतीय शेयर मार्केट में पिछले कुछ वर्षों के दौरान डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग में तेज़ी से वृद्धि हुई है, जबकि कैश इक्विटी मार्केट की तुलना में निवेशकों की भागीदारी अपेक्षाकृत कम रही है। अब मार्केट रेगुलेटर SEBI इस संतुलन को बेहतर बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाने की तैयारी कर रहा है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, SEBI शॉर्ट सेलिंग को आसान बनाने के लिए स्टॉक लेंडिंग एंड बॉरोइंग (SLB) फ्रेमवर्क में बदलाव पर काम कर रहा है। प्रस्तावित बदलावों का उद्देश्य अधिक लिक्विड शेयर्स को इस व्यवस्था में शामिल करना और निवेशकों के लिए एंट्री को आसान बनाना है।
आइए विस्तार से समझते हैं कि यह बदलाव क्या हैं और इनका मार्केट पर क्या असर पड़ सकता है।
क्या है मामला?
शॉर्ट सेलिंग एक ऐसी निवेश रणनीति है, जिसमें निवेशक शेयर की प्राइस गिरने पर मुनाफा कमाने की कोशिश करता है। इसमें निवेशक पहले किसी शेयर को उधार लेकर बाजार में बेचता है और बाद में कम प्राइस पर उसे वापस खरीदकर लौटा देता है। उदाहरण के लिए, यदि 1,000 रुपये का शेयर बेचकर बाद में 900 रुपये में खरीदा जाता है, तो 100 रुपये का लाभ होता है। हालांकि, यदि शेयर की प्राइस बढ़ जाती है, तो निवेशक को अधिक प्राइस पर शेयर खरीदकर लौटाना पड़ता है, जिससे नुकसान हो सकता है।
इसी व्यवस्था को और व्यापक बनाने के लिए SEBI शॉर्ट सेलिंग के लिए पात्र शेयर्स की संख्या लगभग दोगुनी करने पर विचार कर रहा है। फिलहाल NSE पर लिस्टेड करीब 2,600 कंपनियों में से केवल 176 शेयर ही स्टॉक लेंडिंग एंड बॉरोइंग (SLB) के दायरे में आते हैं, लेकिन प्रस्तावित बदलाव के बाद अधिकतर लिक्विड शेयर इसमें शामिल हो सकते हैं। इसके साथ ही, रेगुलेटर SLB के तहत मौजूदा 130% तक के कोलैटरल की आवश्यकता को भी कम करने पर विचार कर रहा है, जबकि अमेरिका और यूरोप जैसे मार्केट्स में यह करीब 100% है। हालांकि, SEBI ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि कोलैटरल में कितनी कमी की जाएगी।
कैश मार्केट को मजबूत करने पर क्यों है जोर?
SEBI का मुख्य उद्देश्य निवेशकों को अत्यधिक लीवरेज वाले डेरिवेटिव्स मार्केट से हटाकर कैश इक्विटी मार्केट की ओर आकर्षित करना है। पिछले कुछ वर्षों में डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग में तेज़ विस्तार हुआ है, लेकिन इसके साथ जोखिम भी बढ़े हैं।
SEBI के अनुसार, डेरिवेटिव्स में ट्रेड करने वाले लगभग 90% रिटेल निवेशकों को नुकसान होता है। वहीं, डेरिवेटिव्स में लगाया गया कैपिटल कैश मार्केट की तुलना में लगभग तीन गुना है और कुल कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू लगभग 500 गुना अधिक है, जो प्रमुख ग्लोबल मार्केट्स से भी काफी ज्यादा है।
इसी कारण सरकार और SEBI पिछले 18 महीनों में डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग की लागत बढ़ाने जैसे कई कदम उठा चुके हैं। अब कैश मार्केट को अधिक प्रतिस्पर्धी और आकर्षक बनाने की दिशा में यह नया प्रयास किया जा रहा है।
किन नियमों में बदलाव संभव है?
वर्तमान नियमों के अनुसार किसी शेयर को SLB के लिए पात्र बनने के लिए लिक्विडिटी, ट्रेडिंग वॉल्यूम और डेरिवेटिव्स एक्सपोजर जैसे कई मानदंड पूरे करने होते हैं। उदाहरण के लिए, किसी शेयर का पिछले छह महीनों में औसत मासिक ट्रेडिंग टर्नओवर कम से कम ₹1 बिलियन होना चाहिए। साथ ही पूरे मार्केट में उसका डेरिवेटिव्स एक्सपोजर भी कम से कम ₹1 बिलियन होना आवश्यक है।
रिपोर्ट के अनुसार, SEBI इन मानदंडों में से कुछ को आसान बनाने पर विचार कर रहा है ताकि अधिक लिक्विड कंपनियां इस व्यवस्था का हिस्सा बन सकें। हालांकि, भारत में एक महत्वपूर्ण नियम यथावत रहने की संभावना है कि स्टॉक लेंडिंग एंड बॉरोइंग केवल एक्सचेंज प्लेटफॉर्म के माध्यम से ही होगी, जबकि कई पश्चिमी देशों में यह सुविधा ब्रोकर्स के जरिए भी उपलब्ध है।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
यदि प्रस्ताव लागू होता है, तो निवेशकों को शॉर्ट सेलिंग के लिए अधिक शेयर उपलब्ध होंगे और कोलैटरल की आवश्यकता कम होने से इस व्यवस्था का उपयोग करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। इससे कैश मार्केट में लिक्विडिटी बढ़ने और बेहतर प्राइस डिस्कवरी को भी समर्थन मिल सकता है।
हालांकि, यह बदलाव डेरिवेटिव्स की जगह लेने के लिए नहीं बल्कि कैश इक्विटी मार्केट को अधिक सक्रिय बनाने के उद्देश्य से है। निवेशकों के लिए यह समझना महत्वपूर्ण होगा कि शॉर्ट सेलिंग एक रणनीति है, जिसमें जोखिम भी जुड़े रहते हैं। इसलिए किसी भी निर्णय से पहले जोखिम और रिस्क मैनेजमेंट पर विशेष ध्यान देना आवश्यक रहेगा।
भविष्य की बातें
भारत की अर्थव्यवस्था ने महामारी के दौर को छोड़कर पिछले एक दशक में लगातार 6-7% की मजबूत विकास दर बनाए रखी है। इसके साथ ही शेयर बाजार में निवेशकों की रुचि भी तेजी से बढ़ी है। इसका सबसे बड़ा संकेत यह है कि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का कुल मार्केट वैल्यू लगभग 10 साल पहले 1 ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर अब 5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो गया है। यह बदलाव देश के कैपिटल मार्केट की बढ़ती ताकत और निवेशकों के बढ़ते भरोसे को दर्शाता है।
आगे बढ़ते हुए, इस प्रस्ताव से जुड़े अंतिम नियम और विवरण वर्ष के अंत तक तय किए जा सकते हैं। यदि यह प्रक्रिया तय समय पर पूरी होती है, तो इससे भारतीय शेयर बाजार को और मजबूती मिल सकती है तथा डोमेस्टिक और विदेशी निवेशकों के लिए नए अवसर खुल सकते हैं।
डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल एजुकेशनल और इंफॉर्मेशनल उद्देश्य के लिए है और यह इन्वेस्टमेंट एडवाइस या किसी भी सिक्योरिटीज को खरीदने या बेचने की रिकमेंडेशन नहीं है। यहाँ जिन कंपनियों का उल्लेख किया गया है, उन्हें मार्केट डेवलपमेंट्स के संदर्भ में केवल उदाहरण के रूप में बताया गया है। इन्वेस्टर्स को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी इन्वेस्टमेंट डिसीजन लेने से पहले अपनी खुद की रिसर्च करें और अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से परामर्श करें।
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