अमेरिकी इमिग्रेशन नीतियों और वॉल स्ट्रीट की हायरिंग रणनीतियों के बीच एक दिलचस्प रिश्ता उभर रहा है। जहाँ एक तरफ अमेरिका अपनी वीज़ा नीतियों, विशेषकर H-1B प्रोग्राम को सख़्त कर रहा है, वहीं दूसरी ओर, दुनिया के सबसे बड़े इन्वेस्टमेंट बैंक भारत में अपनी उपस्थिति को तेज़ी से बढ़ा रहे हैं। यह कोई संयोग नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी रणनीतिक है जिसने भारत के फाइनेंस और टेक्नोलॉजी हब्स को ग्लोबल प्रतिभा का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना दिया है।
US प्रशासन द्वारा उठाए गए क़दम, जिनका मक़सद डोमेस्टिक रोज़गार को बचाना था, अनजाने में ही भारत में उच्च-स्तरीय फाइनेंस प्रोफेशनल्स नौकरियों की एक नई लहर पैदा कर रहे हैं। आइए समझते है यह स्थिति भारत को कैसे फायदा पहंचा रही है।
क्या है मामला?
H-1B वीजा पर अमेरिकी प्रशासन द्वारा सख्त नियंत्रण लागू किए गए हैं। प्रशासन ने विदेशी H-1B कर्मचारियों को काम पर रखने वाली अमेरिकी फर्मों के लिए लागत में भारी वृद्धि कर दी है, जिसमें $1,00,000 प्रति कर्मचारी तक की नई याचिका शुल्क भी शामिल है। जेपी मॉर्गन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जेमी डिमन के अनुसार, इस शुल्क ने सभी को चौंका दिया। इस भारी-भरकम शुल्क के अलावा, ऑटोमैटिक EAD (वर्क परमिट) एक्सटेंशन को हटाने और सख़्त प्रवर्तन जैसे क़दमों ने अमेरिकी कंपनियों के लिए विदेशी प्रतिभा को काम पर रखना बेहद महंगा और जटिल बना दिया है।
लेकिन, इस सख़्ती का नतीजा यह हो रहा है कि कंपनियाँ अमेरिका में कर्मचारियों को काम पर रखने के बजाय, उन नौकरियों को ही भारत जैसे देशों में ऑफ़शोर कर रही हैं।
H-1B वीज़ा में भारत की पकड़
भारतीय लीडर्स के हाथ आज गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और IBM जैसी ग्लोबल टेक दिग्गजों की कमान है, और अमेरिकी हेल्थकेयर सिस्टम में लगभग 6% डॉक्टर भारतीय हैं। यह प्रभाव केवल लीडरशिप या चिकित्सा तक सीमित नहीं है बल्कि H-1B वीज़ा आवंटन में भारत का दबदबा इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। 2024 में जारी सभी H-1B वीज़ाओं में से 70% से अधिक भारतीयों को मिले। कुल 2,83,397 स्वीकृतियाँ चीन की तुलना में छह गुना अधिक हैं, और भारत–चीन मिलकर 84% हिस्सा लेते हैं। बाकी आठ देशों को मिलकर भी 10% से कम वीज़ा मिले।

इस बढ़त का एक बड़ा कारण लागत का अंतर है। ब्लूमबर्ग के अनुसार, भारत में किसी अमेरिकी बैंक के GCC में एक एंट्री-लेवल इंजीनियर सालाना ₹3-8 लाख कमाता है। वहीं अमेरिका में H-1B पर काम करने वाला भारतीय लगभग $60,000 पाता है, और उसी भूमिका के लिए एक अमेरिकी कर्मचारी को $1,20,000 तक भुगतान करना पड़ता है। यही विशाल लागत अंतर बैंक्स को भारत में बड़े पैमाने पर विस्तार और निवेश करने के लिए लगातार प्रेरित कर रहा है।
भारत कैसे बना US बैंक्स का नया ऑपरेशनल हब?
1990 के दशक में कम लागत वाले बैक-ऑफिस के रूप में शुरू हुए हब आज ग्लोबल फाइनेंस के सबसे अहम ऑपरेशनल हब बन चुके हैं। बेंगलुरु, हैदराबाद, गुरुग्राम और मुंबई में फैले GCC कैंपस अब क्वांट्स, रिस्क एनालिस्ट, इन्वेस्टमेंट टीम और टेक टैलेंट की बड़ी कार्यबल को संभालते हैं। सिर्फ छह सबसे बड़े अमेरिकी बैंक्स के GCCs में ही लगभग 1.5 लाख कर्मचारी काम करते हैं। गोल्डमैन सैक्स और मॉर्गन स्टेनली के लिए भारत अमेरिका के बाहर उनका सबसे बड़ा बेस बन चुका है, जबकि जेपी मॉर्गन अपने ग्लोबल कर्मचारियों का लगभग पाँचवां हिस्सा भारत में नियुक्त करता है।
ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स मूल रूप से US कंपनियों की ऑफशोर एंटिटी हैं, जो R&D, IT, फाइनेंस, और कस्टमर सपोर्ट जैसी महत्वपूर्ण भूमिकाएँ संभालती हैं। यह मॉडल कंपनियों को भारतीय टैलेंट का लाभ लेने, लागत घटाने और महंगे वीज़ा व कंप्लायंस जोखिमों से बचने में मदद करता है।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
भारत में बढ़ते GCCs US बैंक्स के लिए लागत बचत और टैलेंट एक्सेस का बड़ा साधन हैं और यही ट्रेंड निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण अवसर बनाता है। TCS, इन्फोसिस और विप्रो जैसी IT कंपनियों को मजबूत डील पाइपलाइन, स्थिर रेवेन्यू और लंबी अवधि के कॉन्ट्रैक्ट मिलते हैं। साथ ही बेंगलुरु, हैदराबाद, गुरुग्राम और मुंबई जैसे शहरों में कमर्शियल रियल एस्टेट की डिमांड बढ़ती है, जिससे DLF, प्रेस्टीज, ब्रिगेड और माइंडस्पेस REIT जैसे प्लेयर्स को फायदा मिलता है।
उच्च-कौशल नौकरियों का यह सघन क्लस्टर स्थानीय कंज़म्पशन को भी तेज करता है, जो ऑटो, रिटेल और FMCG कंपनियों के लिए सकारात्मक है। लंबी अवधि में, भारत की ग्लोबल टैलेंट हब के रूप में उभरती भूमिका विदेशी निवेश को बढ़ावा देती है। संक्षेप में GCCs का बढ़ता प्रभाव कई सेक्टर्स में निवेशकों के लिए सस्टेनेबल थीम बन रहा है।
भविष्य की बातें
ग्लोबल बैंक्स का भारत में तेज़ी से बढ़ता विस्तार यह दिखाता है कि ट्रम्प की सख्त इमिग्रेशन नीति उच्च-कौशल नौकरियों को अमेरिका में रोकने में सीमित असर डाल रही है। NASSCOM और Zinnov के अनुसार, भारत में GCC कर्मचारियों की संख्या 2030 तक 50% बढ़कर 2.8 मिलियन तक पहुंचने का अनुमान पहले से ही था और H-1B प्रतिबंधों ने इस रफ्तार को और बढ़ा दिया है।
पर तेजी के साथ जोखिम भी बढ़ते हैं। ब्लूमबर्ग के अनुसार, ग्रांट थॉर्नटन भारत के विवेक रामजी अय्यर का कहना है कि, भारत अब ‘सस्ते श्रम वाला देश नहीं, बल्कि गहरे टैलेंट वाला बाज़ार’ बन चुका है। लेकिन अगर ग्लोबल जिओपॉलिटिकल तनाव या ट्रम्प की टैरिफ नीति और सख्त होती है, तो GCCs भी इसके निशाने पर आ सकते हैं।
*आर्टिकल में शामिल कंपनियों के नाम केवल सूचना के उद्देश्य के लिए है। यह निवेश सलाह नहीं है।
*डिस्क्लेमर: तेजी मंदी डिस्क्लेमर