भारत वर्तमान में अपनी आर्थिक यात्रा के एक निर्णायक चरण में प्रवेश कर रहा है, जहाँ निर्यात ग्रोथ अब केवल पारंपरिक तरीकों से नहीं, बल्कि बढ़ते डिजिटल फर्स्ट एक्सपोर्टर्स और मजबूत ग्लोबल ट्रेड नेटवर्क से आकार ले रही है। आर्थिक सर्वे 2025-26 के अनुसार, भारत का बाहरी प्रदर्शन ग्लोबल झटकों के बावजूद जबरदस्त रेजिलिएंस दिखा रहा है। भारत सरकार और इंडस्ट्री मिलकर दो ट्रिलियन डॉलर के निर्यात टारगेट को प्राप्त करने की दिशा में तेजी से काम कर रहे हैं। वाणिज्य मंत्री ने भी इस विशाल लक्ष्य को हासिल करने के लिए इंडस्ट्री से अपने क्वालिटी स्टैंडर्ड्स को तुरंत बढ़ाने पर विशेष जोर दिया है।
आइए भारत के निर्यात बूम, इससे जुड़ी डॉक्युमेंटेशन चुनौतियों और ग्लोबल अनिश्चितताओं को समझें और जानें क्या यह थीम निवेशकों के लिए एक बड़ा निवेश अवसर बन सकता है।
क्या है मामला?
भारत का $2 ट्रिलियन निर्यात लक्ष्य कागजी बोझ और जटिल डॉक्युमेंटेशन की वजह से मुश्किलों में फंसा हुआ है। दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के बाद भारत ने 2030 तक $2 ट्रिलियन के एक्सपोर्ट का सपना रखा है, जो देश की बढ़ती ट्रेड क्षमता और आत्मविश्वास को दिखाता है।
इस लक्ष्य को पाने के लिए मर्चेंडाइज निर्यात को हर साल लगभग 11-12% की CAGR और सर्विसेज निर्यात को 18-19% की CAGR से बढ़ना होगा। भारत ने हाल ही में FTA UK और यूरोपीय संघ के साथ साइन किए हैं, जबकि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते का अंतिम ड्राफ्ट लगभग तैयार है। ये सभी कदम एक्सपोर्ट में तेजी लाने में मदद करेंगे, लेकिन कागजी प्रक्रियाओं की भारी जटिलता इस लक्ष्य को हासिल करने की राह में बड़ी बाधा बनी हुई है।
अमेरिका का टैरिफ और व्यापार अनिश्चितता
द इकोनॉमिक टाइम्स के अनुसार, भारतीय निर्यातकों को वर्तमान में अमेरिका में अपने शिपमेंट पर अगले 150 दिनों के लिए 10% के अस्थायी टैरिफ का सामना करना पड़ रहा है, जो 24 फरवरी से पूरी तरह से प्रभावी हो गया है। यह महत्वपूर्ण निर्णय सुप्रीम कोर्ट के उस बड़े फैसले के ठीक बाद आया है, जिसमें ट्रम्प प्रशासन के 25% के व्यापक टैरिफ को यह कहते हुए पूरी तरह रद्द कर दिया गया था कि आपातकालीन शक्तियों का ऐसा उपयोग नहीं किया जा सकता। इसके तुरंत बाद, राष्ट्रपति ट्रम्प ने 21 फरवरी को सभी देशों पर 10% का नया टैरिफ लगाया और साथ ही इसे भविष्य में 15% तक बढ़ाने का स्पष्ट संकेत भी दिया, जिससे निर्यातकों के बीच व्यापार अनिश्चितता लगातार बनी हुई है।
फेडरेशन ऑफ इंडियन निर्यात ऑर्गेनाइजेशंस के महानिदेशक अजय सहाय के अनुसार, वर्तमान आदेश के तहत भारतीय गुड्स पर 10% टैरिफ लगेगा, लेकिन 15% के नए आदेश को लेकर मार्केट में भारी अनिश्चितता है। यह 10% लेवी अमेरिका में लागू मौजूदा मोस्ट फेवर्ड नेशन ड्यूटी के अतिरिक्त लगाई जाएगी।
उदाहरण के लिए, जिस विशिष्ट प्रोडक्ट पर पहले 5% मोस्ट फेवर्ड नेशन ड्यूटी लगती थी, उस पर अब प्रभावी ड्यूटी 15% होगी, जो पुराने नियमों के तहत 30% हुआ करती थी। भारत और अमेरिका ने आपसी सहमति से टैरिफ को 18% तक कम करने के लिए एक विस्तृत फ्रेमवर्क पर सहमति व्यक्त की थी। इसमें से दंडात्मक 25% टैरिफ हटा दिया गया है, जबकि शेष 25% अभी भी मौजूद है। इस महत्वपूर्ण समझौते के कानूनी पाठ पर गहन चर्चा के लिए 23 से 26 फरवरी 2026 तक वाशिंगटन में एक बैठक होनी थी, लेकिन इसे स्थगित कर दिया गया है।
टेक्नोक्राफ्ट इंडस्ट्रीज इंडिया के संस्थापक अध्यक्ष शरद कुमार सराफ ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका भारत के लिए एक प्रमुख बाजार है और इस टैरिफ ड्रामा को जल्द से जल्द समाप्त करने की सख्त आवश्यकता है। जबकि फ्लोरेंस शू कंपनी के चेयरमैन अकील पनारुना का मानना है कि यह विशेष रूप से फुटवियर और लेदर इंडस्ट्री जैसे लेबर इंटेंसिव सेक्टर्स के लिए टैरिफ स्टेबिलिटी बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण है।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
भारत के लगातार बढ़ते निर्यात और डाइवर्सिफाइड ट्रेड पार्टनरशिप निवेशकों के लिए भी शानदार और सुरक्षित अवसर प्रस्तुत करते हैं। अमेरिका द्वारा लागू किए गए 10% के घटे हुए टैरिफ से मुख्य रूप से सीफूड, लेदर और फुटवियर जैसे महत्वपूर्ण सेक्टर्स में शिपमेंट बढ़ने की प्रबल उम्मीद है। द इकोनॉमिक टाइम्स के अनुसार, मेगा मोडा के MD योगेश गुप्ता का मानना है कि, इस टैरिफ कटौती से अमेरिका के मार्केट में शिपमेंट बढ़ाने में काफी अधिक मदद मिलेगी और 15% की अनिश्चितता हटने से एक्सपोर्टर्स को ज़्यादा साफ़ तस्वीर मिलेगी।
वर्तमान परिदृश्य में सर्विस रिलायबिलिटी, वर्कफोर्स कंटिन्यूटी और लॉन्ग टर्म सप्लायर रिलेशनशिप ग्लोबल सोर्सिंग के सबसे अहम फैसले बन गए हैं। अमेरिका और यूरोप के कई प्रमुख ब्रांड्स अब अपने सप्लाई चेन रिस्क को कम करने के लिए भारतीय सप्लायर्स की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं। यह बदलती हुई स्थिति निवेशकों को भारत की अपार लेबर अवेलेबिलिटी और स्केलेबल प्रोडक्शन क्षमता में अपनी पूंजी लगाने का एक बहुत ठोस कारण देती है। इसके अलावा, टेलीकॉम इंस्ट्रूमेंट्स में 51.2% की वृद्धि यह साफ दर्शाती है कि भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर निवेशकों के लिए संभावनाएं नजर आ रही है।
भविष्य की बातें
भविष्य में भारत का दो ट्रिलियन डॉलर का निर्यात टारगेट केवल पारंपरिक प्रोडक्ट्स तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, हाई वैल्यू सर्विसेज और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग पर भी बहुत अधिक निर्भर करेगा। वर्तमान व्यापार अनिश्चितताओं को कम करने के लिए अमेरिका और अन्य विकसित देशों के साथ ट्रेड एग्रीमेंट्स को अंतिम रूप देना एक बहुत ही महत्वपूर्ण कदम होगा। भारत के उभरते डिजिटल फर्स्ट निर्यातर्स के लिए मजबूत पॉलिसी सपोर्ट और स्ट्रीमलाइन्ड अप्रूवल की सख्त आवश्यकता है, ताकि वे बिना किसी कागजी बाधा के विश्व स्तर पर आसानी से प्रतिस्पर्धा कर सकें।
यदि भारत अपने क्वालिटी स्टैंडर्ड्स को और बेहतर करता है और ट्रेड कंप्लायंस को पूरी तरह से सरल बनाता है, तो वह निश्चित रूप से ग्लोबल सप्लाई चेन का सबसे अहम हिस्सा बन बन सकता है। जो निवेशक इन सभी स्ट्रक्चरल बदलावों को जल्दी पहचानेंगे और लॉन्ग टर्म होराइजन के साथ सही सेक्टर्स में निवेश करेंगे, वे भारत की निर्यात ग्रोथ की रीढ़ को आकार देने में सहायक होंगे, वशर्ते निवेशक पूर्ण रिसर्च के बाद ही निवेश करें।
डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल एजुकेशनल और इंफॉर्मेशनल उद्देश्य के लिए है और यह इन्वेस्टमेंट एडवाइस या किसी भी सिक्योरिटीज को खरीदने या बेचने की रिकमेंडेशन नहीं है। यहाँ जिन कंपनियों का उल्लेख किया गया है, उन्हें मार्केट डेवलपमेंट्स के संदर्भ में केवल उदाहरण के रूप में बताया गया है। इन्वेस्टर्स को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी इन्वेस्टमेंट डिसीजन लेने से पहले अपनी खुद की रिसर्च करें और अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से परामर्श करें।
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