निवेशकों के लिए ग्रीन अलर्ट: भारत का पावर CO2 घटा!

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भारत के एनर्जी सेक्टर की तेजी से कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन की स्थिति में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखा जा रहा है। 2025 की पहली छमाही में भारत के पावर सेक्टर से CO2 उत्सर्जन में 1% की गिरावट दर्ज हुई है, जो लगभग 50 वर्षों में केवल दूसरी बार हुई है। इसके परिणामस्वरूप भारत के नॉन-फॉसिल फ्यूल और सीमेंट से होने वाले कुल उत्सर्जन की वृद्धि दर 2001 के बाद सबसे धीमी रही है। यह क्लीन एनर्जी की तरफ झुकाव और मौसम की अनुकूल परिस्थितियों का सकारात्मक परिणाम है।

आइए समझते हैं कि विश्व की सबसे बड़ी जनसंख्या वाले देश के रूप में भारत की इस उपलब्धि का ग्लोबल जलवायु संकट के लिए क्या महत्व है, और यह स्थिति निवेशकों के नजरिए से क्या मायने रखती है।

क्या है मामला?

भारत में CO2 उत्सर्जन की स्थिति समझने के लिए पूरी स्थिति को देखना आवश्यक है। भारत ग्लोबल एनर्जी सेक्टर के 8% CO2 उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है, जबकि यहां विश्व की 18% जनसंख्या निवास करती है। यह दर्शाता है कि प्रति व्यक्ति उत्सर्जन विश्व औसत से कम है, फिर भी तेज़ी से बढ़ रहा है।

भारत के पावर सेक्टर के CO2 उत्सर्जन का लगभग आधा हिस्सा कोयले से आता है, जो पावर उपयोग में सबसे बड़ा योगदानकर्ता है।

2024 तक के दशक में भारत ने ग्लोबल एनर्जी सेक्टर उत्सर्जन वृद्धि में 31% योगदान दिया, जो पिछले पांच वर्षों में बढ़कर 37% हो गया। भारत के कुल CO2 उत्सर्जन का आधे से अधिक हिस्सा कोयले से बिजली और ताप (Heat) उत्पादन से आता है।

2019 से 2023 तक भारत के फॉसिल फ्यूल और सीमेंट से उत्सर्जन में सालाना 8% की वृद्धि हुई। हालांकि 2024 की दूसरी छमाही से स्थिति बदलने लगी, जब उत्सर्जन वृद्धि घटकर 2% रह गई और 2025 की पहली छमाही में यह केवल 1% रही।

क्लीन एनर्जी का रिकॉर्ड विस्तार

2025 की पहली छमाही में भारत में क्लीन एनर्जी क्षमता में रिकॉर्ड 25.1 GW की वृद्धि हुई, जो पिछले वर्ष की तुलना में 69% अधिक है। यह नई क्लीन एनर्जी क्षमता प्रति वर्ष लगभग 50 TWh बिजली उत्पन्न करने में सक्षम है, जो कुल डिमांड की औसत वृद्धि को पूरा करने के लिए लगभग पर्याप्त है।

सोलर, विंड और अन्य क्लीन एनर्जी स्रोतों की ग्रोथ अब लगभग पावर की बढ़ती डिमांड को पूरा करने की स्थिति में है।

सोलर एनर्जी में सबसे अधिक वृद्धि हुई है, जिसमें 14.3 GW बड़े पैमाने के सोलर प्रोजेक्ट्स से और 3.2 GW रूफटॉप सोलर एनर्जी से आई है। नई क्लीन एनर्जी उत्पादन में सोलर पावर का 62% योगदान रहा, हाइड्रो पावर का 16%, विंड का 13% और न्यूक्लियर एनर्जी का 8% हिस्सा था।

2025 की पहली छमाही में कुल पावर उत्पादन 9 TWh बढ़ा, लेकिन नॉन-फॉसिल फ्यूल से उत्पादन 29 TWh घट गया। इसके विपरीत सोलर एनर्जी से उत्पादन में 17 TWh, विंड से 9 TWh, हाइड्रो पावर से 9 TWh और न्यूक्लियर एनर्जी से 3 TWh की वृद्धि हुई।

भारत में ऑयल डिमांड ग्रोथ की सुस्ती

2025 की पहली छमाही में भारत की तेल डिमांड लगभग ठहर गई। 2023 तक लगातार 6% सालाना वृद्धि के बाद यह दर 2024 में 4% और 2025 में शून्य पर आ गई। इसका मुख्य कारण डीज़ल कंजम्पशन की कमजोरी रही, जो इंडस्ट्रियल सुस्ती, असामान्य मानसून, सड़क निर्माण में कमी और CNG व इलेक्ट्रिक वाहनों के बढ़ते उपयोग से प्रभावित हुई। पेट्रोल की डिमांड स्थिर रही, लेकिन पैसेंजर व्हीकल सेल्स ग्रोथ सिर्फ 1.3% रही, जो पिछले दो वर्षों की तुलना में काफी कम है।

डीज़ल कंजम्पशन पर EV का असर अब धीरे-धीरे दिखने लगा है। हालांकि भारी ट्रक्स में EV अपनाने की रफ्तार अब भी बेहद धीमी है और ट्रक बिक्री में 9% से अधिक की बढ़ोतरी ने डीज़ल डिमांड को सहारा दिया। वहीं, दोपहिया और तिपहिया वाहनों में EV की लोकप्रियता भविष्य में पेट्रोल कंजम्पशन को प्रभावित कर सकती है।

स्टील और सीमेंट से उत्सर्जन में तेज़ी

2025 की पहली छमाही में भारत के स्टील और सीमेंट सेक्टर ही ऐसे बड़े उद्योग रहे जिनमें उत्सर्जन तेज़ी से बढ़ा। 2024 में ये मिलकर कुल CO2 उत्सर्जन का लगभग 12% हिस्सेदार थे, लेकिन पिछले पाँच सालों से इनकी ग्रोथ औसतन 6% सालाना रही है। 2025 की पहली छमाही में यह रफ्तार और बढ़ गई, जब सीमेंट उत्पादन 10% और स्टील उत्पादन 7% बढ़ा। इसका बड़ा कारण सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च रहा, जो 2019 से 2024 के बीच तीन गुना हो गया और 2025 की दूसरी तिमाही में 52% की सालाना बढ़त दर्ज की।

सरकार ने डोमेस्टिक स्टील क्षमता को 2030 तक 300 मिलियन टन तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है, साथ ही आयात पर टैरिफ और गुणवत्ता मानक भी सख्त किए हैं। आवास योजनाएं और तेजी से बढ़ती ऑटोमोबाइल बिक्री भी स्टील व सीमेंट की डिमांड को मजबूती दे रही हैं।

निवेशकों के लिए इसमें क्या है?

भारत के उत्सर्जन में आई यह गिरावट निवेशकों के लिए कई नए अवसर खोलती है। क्लीन एनर्जी सेक्टर की तेज़ वृद्धि दर्शाती है कि रिन्यूएबल एनर्जी आने वाले समय में और तेजी से विस्तार करेगा। साथ ही, बैटरी स्टोरेज तकनीक में प्रगति के कारण सोलर एनर्जी के साथ एकीकृत बैटरी स्टोरेज की लागत 2023 से 2025 के बीच 50-60% तक कम हुई है, जो बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) सेक्टर के उज्ज्वल भविष्य की ओर संकेत करता है।

बढ़ती रिन्यूएबल क्षमता के कारण सोलर और विंड प्रोजेक्ट्स में निवेश के अवसर बढ़ रहे हैं। वहीं, कोयला-आधारित बिजली उत्पादन में कमी आने से पारंपरिक बिजली कंपनियों पर दबाव बढ़ सकता है। दूसरी ओर, सरकार के इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च के चलते स्टील और सीमेंट उत्पादन क्रमशः 7% और 10% बढ़ गया है, जो इन सेक्टर्स के शेयर्स के लिए सकारात्मक संकेत हैं।

भविष्य की बातें

भारत के पावर सेक्टर से उत्सर्जन 2030 से पहले चरम पर पहुंच सकते हैं, जो एक महत्वपूर्ण मोड़ होगा। केंद्रीय पावर प्राधिकरण (CEA) के अनुमान के अनुसार FY2029-30 में नॉन-फॉसिल पावर उत्पादन का हिस्सा बढ़कर 44% हो जाएगा, जो FY2024-25 में 25% था।

भारत के पावर सेक्टर से होने वाला CO2 उत्सर्जन 2030 से पहले ही चरम पर पहुँच सकता है, इसके बाद क्लीन एनर्जी का योगदान और बढ़ेगा।

भारत का 2030 तक 500 GW नॉन-फॉसिल फ्यूल क्षमता का लक्ष्य पूरा होने की दिशा में अच्छी प्रगति हो रही है। अप्रैल 2025 तक 234 GW रिन्यूएबल क्षमता पाइपलाइन में थी, जिसमें 169 GW के लिए पहले से कॉन्ट्रैक्ट दिए गए हैं।

पेरिस समझौते के तहत 2035 के लिए भारत का राष्ट्रीय निर्धारित योगदान (NDC) अभी तक प्रकाशित नहीं हुआ है, जो 2070 तक नेट-जीरो लक्ष्य के मार्ग को अनिश्चित बनाता है। फिर भी जुलाई में भारत ने 2030 का लक्ष्य पांच साल पहले पूरा कर लिया, जब स्थापित पावर उत्पादन क्षमता का 50% नॉन-फॉसिल स्रोतों से हो गया।

*यह आर्टिकल केवल जानकारी के उद्देश्य के लिए है। यह कोई निवेश सलाह नहीं है।
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