भारतीय शेयर मार्केट के लिए 2026 अब तक चुनौतीपूर्ण रहा है। सेंसेक्स और निफ्टी में लगातार दबाव, विदेशी निवेशकों की बिकवाली, क्रूड ऑइल की हाई प्राइस और ग्लोबल अनिश्चितता ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। मार्केट की कमजोरी केवल कुछ चुनिंदा शेयर्स तक सीमित नहीं है, बल्कि कई प्रमुख सेक्टर भी दबाव में हैं। हालांकि, मेटल और फार्मा जैसे कुछ सेक्टर्स ने इस दौरान सकारात्मक प्रदर्शन किया है।
2026 में निफ्टी की गिरावट 14% के पास पहुंच गयी है और मार्केट 2008 के ग्लोबल वित्तीय संकट के बाद अपने सबसे कमजोर साल की ओर बढ़ रहा है।
सवाल यह है कि क्या यह कमजोरी लंबी मंदी का संकेत है या निवेशकों के लिए बेहतर कंपनियों को उचित प्राइस पर चुनने का अवसर बन सकती है?
क्या है मामला?
पिछली दिवाली से इस दिवाली तक के प्रदर्शन पर नजर डालें, तो मार्केट की कमजोरी साफ दिखाई देती है। जी बिजनेस के आंकड़ों के मुताबिक, 20 अक्टूबर 2025 से 27 अक्टूबर 2026 के बीच सेंसेक्स 12.75% और निफ्टी 50 करीब 11.96% गिरा है। यह 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद सबसे कमजोर संवत वर्षों में से एक रहा है।
इससे पहले संवत 2078 में निफ्टी करीब 1.4% गिरा था। इसके विपरीत, संवत 2080 में 24.6% और संवत 2077 में 40.2% का रिटर्न मिला था। इससे पता चलता है कि मौजूदा गिरावट हाल के वर्षों के मजबूत प्रदर्शन से बिल्कुल अलग है।
मार्केट में कमजोरी के साथ निवेशकों का भरोसा भी प्रभावित हुआ है। क्रूड ऑइल की प्राइस में तेजी, महंगाई की आशंका और जिओपॉलिटिकल तनाव ने जोखिम लेने की क्षमता घटाई है। ऐसे माहौल में निवेशक हाई वैल्यूएशन शेयर्स से दूरी बना सकते हैं और सुरक्षित विकल्पों को प्राथमिकता दे सकते हैं।
गिरावट के पीछे कौन-से कारण हैं?
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों यानी FPI की बिकवाली मार्केट पर दबाव का प्रमुख कारण रही है। NDTV के अनुसार, अक्टूबर के शुरुआती 15 दिनों में FPI का नेट आउटफ्लो ₹47,955 करोड़ रहा है। जब विदेशी निवेशक बड़ी मात्रा में शेयर बेचते हैं, तो मार्केट में उपलब्ध खरीदारी का समर्थन कमजोर पड़ सकता है।
दूसरा दबाव क्रूड ऑइल की प्राइस से जुड़ा है। ऑइल महंगा होने पर भारत के आयात बिल और कंपनियों की लागत में बढ़ोतरी का जोखिम रहता है। इससे महंगाई, मुनाफे और आर्थिक विकास पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा, जुलाई 2024 में इक्विटी पर लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन टैक्स 10% से बढ़ाकर 12.5% और शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन टैक्स 15% से बढ़ाकर 20% किया गया था। यह भी निवेशकों के लिए टैक्स संबंधी बदलावों का हिस्सा रहा है, हालांकि मौजूदा गिरावट को केवल इसी वजह से जोड़ना सही नहीं होगा।
हर सेक्टर में एक जैसी गिरावट नहीं
मार्केट की कमजोरी के बावजूद सभी सेक्टर्स का प्रदर्शन समान नहीं रहा। जी बिजनेस के आंकड़ों के मुताबिक, 20 अक्टूबर 2025 से 27 अक्टूबर 2026 के बीच निफ्टी FMCG में 24.38%, रियल्टी में 15.38% और IT में 8.56% की गिरावट आई। ऑटो सेक्टर भी 8.15% नीचे रहा।
इसके विपरीत, निफ्टी मेटल 15.11% और फार्मा ने 14.86% पॉजिटिव रिटर्न दिया। साथ ही, डिफेंस सेक्टर में 6.37% और PSU बैंक में 3% की बढ़त रही। यह अंतर बताता है कि कमजोर मार्केट में भी कुछ सेक्टर बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं।
हालांकि, किसी सेक्टर का पिछला प्रदर्शन भविष्य के रिटर्न की गारंटी नहीं है। निवेशकों को कंपनी की अर्निंग्स, कर्ज, कारोबार की गुणवत्ता और मौजूदा वैल्यूएशन पर भी ध्यान देना चाहिए। केवल इसलिए किसी शेयर को खरीदना उचित नहीं कि उसकी प्राइस पहले काफी गिर चुकी है।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
गिरावट के दौरान निवेशकों के सामने सबसे बड़ा सवाल है कि अभी खरीदारी करें या मार्केट में स्थिरता आने का इंतजार करें। इसका जवाब हर निवेशक की जोखिम उठाने की क्षमता, निवेश की अवधि और वित्तीय जरूरतों पर निर्भर करता है। छोटी अवधि में पैसा लगाने वालों के लिए मार्केट की अस्थिरता अधिक जोखिम पैदा कर सकती है, जबकि लंबी अवधि के निवेशक मजबूत कंपनियों का मूल्यांकन कर सकते हैं।
दूसरी ओर, लाइवमिंट के अनुसार, लेवरेज यानी उधार लेकर निवेश करने के प्रति सावधानी बरतने का संकेत है। मार्केट में तेजी के छोटे दौर भी आ सकते हैं, लेकिन वे सस्टेनेबल हों, इसकी कोई गारंटी नहीं है। इसलिए एक साथ बड़ी रकम लगाने के बजाय निवेश को चरणों में बांटना और जोखिम के हिसाब से पोर्टफोलियो तैयार करना उपयोगी हो सकता है।
भविष्य की बातें
आने वाले महीनों में मार्केट की दिशा कॉरपोरेट नतीजों, क्रूड ऑइल की प्राइस, विदेशी निवेशकों की गतिविधियों और ग्लोबल आर्थिक हालात पर निर्भर करेगी। द टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, सितंबर तिमाही के लिए निफ्टी 50 कंपनियों के मुनाफे में करीब 20% वृद्धि की उम्मीद है। यदि कंपनियों की अर्निंग्स मजबूत रहती है, तो इससे मार्केट को सहारा मिल सकता है। हालांकि, जिओपॉलिटिकल तनाव और FIIs की गतिविधि मार्केट को प्रभावित कर सकती हैं।
द हिंदू बिजनेसलाइन के अनुसार, मार्केट में अभी स्पष्ट संकेत नहीं हैं कि गिरावट पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। इसलिए आगे भी उतार-चढ़ाव और अतिरिक्त कमजोरी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर, भारत की लॉन्गटर्म ग्रोथ क्षमता बनी हुई है, लेकिन इसका लाभ शेयर मार्केट में तुरंत या समान रूप से दिखे, यह जरूरी नहीं है।
कुल मिलाकर, 2026 भारतीय शेयर मार्केट के लिए बेहद कठिन वर्षों में शामिल हो सकता है। फिर भी, केवल इंडेक्स की गिरावट के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि हर शेयर निवेश के लिए आकर्षक हो गया है। निवेशकों के लिए कंपनी की गुणवत्ता, अर्निंग्स की संभावनाओं और वैल्यूएशन के बीच संतुलन समझना सबसे महत्वपूर्ण रहेगा।
डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल एजुकेशनल और इंफॉर्मेशनल उद्देश्य के लिए है और यह इन्वेस्टमेंट एडवाइस या किसी भी सिक्योरिटीज को खरीदने या बेचने की रिकमेंडेशन नहीं है। यहाँ जिन कंपनियों का उल्लेख किया गया है, उन्हें मार्केट डेवलपमेंट्स के संदर्भ में केवल उदाहरण के रूप में बताया गया है। इन्वेस्टर्स को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी इन्वेस्टमेंट डिसीजन लेने से पहले अपनी खुद की रिसर्च करें और अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से परामर्श करें।
सिक्योरिटीज मार्केट में किए गए इन्वेस्टमेंट मार्केट जोखिम के अधीन होते हैं। इन्वेस्ट करने से पहले सभी संबंधित डॉक्यूमेंट्स को ध्यानपूर्वक से पढ़ें।