भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 7 फरवरी 2025 को अपनी मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की बैठक में 25 बेसिस पॉइंट्स की रेपो रेट में कटौती की घोषणा की। यह कटौती पिछले 5 वर्षों में पहली बार हुई है, जिसके बाद रेपो रेट 6.25% हो गया है। रेपो रेट वह ब्याज दर है जिस पर कमर्शियल बैंक्स RBI से उधार लेते हैं। यह निर्णय अर्थव्यवस्था को गति देने और उधारकर्ताओं को राहत प्रदान करने के लिए लिया गया है।
लेकिन इसका अर्थव्यवस्था, बैंकिंग सेक्टर और भारतीय स्टॉक मार्केट पर असर क्या होगा? आइए, समझते हैं।
उधारकर्ताओं के लिए क्या बदलाव आएंगे?
रेपो रेट में कटौती का सीधा असर उधारकर्ताओं की मासिक किस्त यानि EMI पर पड़ेगा। जिन उधारकर्ताओं ने फ्लोटिंग रेट वाले लोन लिए हैं, उनकी EMIs कम हो सकती हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि सितंबर 2024 तक, 59% फ्लोटिंग रेट लोन एक्सटर्नल बेंचमार्क (EBLR) से जुड़े हुए हैं, जो RBI के रेपो रेट से प्रभावित होते हैं। इसका मतलब है कि जैसे ही बैंक रेपो रेट में कटौती का लाभ ग्राहकों को देंगे, उधारकर्ताओं की मासिक किस्तें कम होंगी।
विकल्प के तौर पर, उधारकर्ता अपनी EMI को समान रखकर लोन की अवधि को कम भी कर सकते हैं। यह विशेष रूप से होम लोन और व्हीकल लोन जैसे बड़े लोन के मामले में काफी फायदेमंद साबित हो सकता है।
क्रेडिट ग्रोथ को कैसे मिलेगा बढ़ावा?
रेपो रेट में कटौती का उद्देश्य अर्थव्यवस्था में कैश की लिक्विडिटी बढ़ाना और क्रेडिट ग्रोथ को प्रोत्साहित करना है। RBI के आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2025 में नॉन-फूड क्रेडिट ग्रोथ 11.4% रही। नॉन-फूड क्रेडिट का मतलब है कि भारतीय खाद्य निगम (FCI) को दिए गए ऋण को छोड़कर बैंक्स द्वारा दिया गया कुल ऋण।
हालांकि, पिछले कुछ समय से बैंक्स ने अनसिक्योर्ड लोन पर रोक लगा दी है, जिसके कारण रिटेल लोन की ग्रोथ धीमी हुई है। दिसंबर 2024 में रिटेल लोन (होम लोन, क्रेडिट कार्ड, एजुकेशन लोन, व्हीकल लोन आदि) की वार्षिक वृद्धि दर घटकर 12% रह गई, जो दिसंबर 2023 में 28.4% थी। इसी तरह, अन्य पर्सनल लोन की वृद्धि दर दिसंबर 2024 में 9.2% रही, जो पिछले साल 23.2% थी। रेपो रेट में कटौती से इन क्षेत्रों में फिर से गति आने की उम्मीद है।
बैंक कब तक देंगे कटौती का लाभ?
RBI के नियमों के अनुसार, बैंक्स को अपनी एक्सटर्नल बेंचमार्क लेंडिंग रेट (EBLR) को हर तीन महीने में कम से कम एक बार रीसेट करना होता है। इसका मतलब है कि उधारकर्ताओं को रेपो रेट में कटौती का लाभ अगले तीन महीनों के भीतर मिल सकता है। हालांकि, यह बैंक्स पर निर्भर करता है कि वह कितनी जल्दी यह लाभ ग्राहकों तक पहुंचाते हैं।
दर कटौती: बैंक्स के लिए चुनौती या राहत
बिज़नेस टुडे के अनुसार, एलारा सिक्योरिटीज का कहना है कि RBI द्वारा रेपो रेट में कटौती शॉर्टटर्म में बैंक्स की नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, कैश मैनेजमेंट को सक्रिय रूप से नियंत्रित करने और कुछ सख्त नियामकीय दिशानिर्देशों (जैसे ECL, LCR और प्रोजेक्ट फाइनेंस गाइडलाइंस) को फिलहाल टालने से बैंक्स को थोड़ी राहत मिलेगी।
इसके साथ ही, बड़ी प्राइवेट बैंक्स इस कटौती से सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकती हैं, जिनका NIM पर 15-17 bps तक असर हो सकता है। मिडकैप बैंक्स के लिए यह प्रभाव 3-5bps तक सीमित रहेगा, जबकि PSU बैंक्स पर 10-20 bps का असर दिख सकता है। वहीं, कुछ छोटे वित्तीय बैंक इस कटौती से लाभान्वित भी हो सकते हैं।
ब्याज दरों में गिरावट से किन बैंक्स को होगा सबसे ज्यादा फायदा?
जब ब्याज दरें गिरती हैं, तो फिक्स्ड-रेट लोन वाले बैंक्स को तुरंत फायदा होता है। कम दरों की वजह से ये बैंक सस्ती दरों पर लोन रिफाइनेंस कर सकते हैं, जिससे उनका नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) और मुनाफा बढ़ता है। आइए देखें कि कौन से बैंक इस स्थिति का सबसे ज्यादा लाभ उठा सकते हैं:

शेयर बाजार और सेक्टोरल प्रदर्शन पर प्रभाव
ब्याज दरों में कटौती के बावजूद भारतीय शेयर बाजार में गिरावट देखी गई। शुक्रवार यानि 7 फरवरी 2025 को सेंसेक्स 198 पॉइंट गिरकर 77,860 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 23,560 के स्तर पर बंद हुआ। बैंकिंग सेक्टर के शेयर्स में भारी गिरावट देखी गई, जहां महाराष्ट्र बैंक (-2.23%), SBI (-2.11%), ICICI बैंक (-1.21%), और अन्य प्रमुख बैंक्स के शेयर्स में गिरावट दर्ज की गई।
हालांकि, दूसरी ओर, मेटल और कंज्यूमर ड्युरेबल्स सेक्टर में तेजी देखी गई। जिसे आप नीचे दिए ग्राफ से समझते है।

ब्याज दरों में कटौती के बाद मेटल और कंज्यूमर ड्यूरेबल सेक्टर के शेयर्स में बढ़त देखने को मिली है। जहां मेटल स्टॉक्स जैसे वेलस्पुन कॉर्प, टाटा स्टील, जिंदल स्टील आदि स्टॉक्स में अच्छी बढ़त रही। JSW स्टील (3.35%) और डिक्सन टेक (3.29%) के शेयरों में भी उछाल दिखा।
इसके अलावा, कंज्यूमर ड्यूरेबल सेक्टर की कंपनियां जैसे कि वेदांता, ब्लू स्टार और वोल्टास आदि शेयर्स ने भी सकारात्मक रुझान दिखाया।
निष्कर्ष
द इकोनॉमिक टाइम्स के अनुसार, एक्सपर्ट्स ने लिक्विडिटी की स्थिति को लेकर चिंता जताई है। फरवरी 2025 में सुधार के संकेत दिखने के बावजूद, मार्च 2025 के अंत तक सिस्टम में ₹2.5 लाख करोड़ तक लिक्विडिटी की कमी हो सकती है, अगर RBI ने अतिरिक्त उपाय नहीं किए।
इस तरह की कमी बैंकिंग प्रणाली पर दबाव बढ़ा सकती है, जिससे ब्याज दरों में कटौती का पूरा लाभ अर्थव्यवस्था तक पहुंचने में देरी हो सकती है। यदि RBI समय पर लिक्विडिटी बढ़ाने के उपाय नहीं करता, तो कर्ज की उपलब्धता पर असर पड़ेगा और आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी हो सकती है।
*यह आर्टिकल केवल जानकारी के उद्देश्य के लिए है। यह कोई निवेश सलाह नहीं है।
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