भारत वर्तमान में एक चुनौतीपूर्ण एनर्जी परिदृश्य का सामना कर रहा है, जहाँ ग्लोबल जिओपॉलिटिकल तनाव सीधे आम आदमी की रसोई और देश की आर्थिक स्थिरता को प्रभावित कर रहे हैं। हाल ही में ईरान और इजरायल के बीच छिड़े युद्ध ने ग्लोबल ऑइल और गैस सप्लाई चेन को बुरी तरह बाधित कर दिया है। भारत, जो अपनी एनर्जी जरूरतों के लिए आयात पर अत्यधिक निर्भर है, इस संकट की सीधी चपेट में आ गया है। इस तनावपूर्ण स्थिति के परिणामस्वरूप, सरकार को घरेलू स्तर पर कुकिंग गैस की प्राइस में भारी बढ़ोतरी करने का कठिन निर्णय लेना पड़ा है।
आइए इस एनर्जी संकट के विभिन्न पहलुओं को समझें और जानें कि यह स्थिति निवेशकों और उपभोक्ताओं के लिए क्या मायने रखती है।
क्या है मामला?
भारत ने LPG सिलेंडर की प्राइस में बढ़ोतरी की है, जो लगभग एक साल बाद हुई है। दिल्ली में 14.2 किलोग्राम वाले घरेलू LPG सिलेंडर की प्राइस 60 रुपये बढ़कर 913 रुपये हो गई है, जो 7% की वृद्धि है। वहीं 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल सिलेंडर की प्राइस 114.5 रुपये बढ़कर 1,883 रुपये हो गई है। उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों को 300 रुपये की सब्सिडी मिलती रहती है, इसलिए उन्हें मात्र 613 रुपये ही चुकाने पड़ेंगे।
सरकार का कहना है कि यह बढ़ोतरी बहुत ज्यादा नहीं है। औसतन एक सिलेंडर तीन महीने चलता है, इसलिए एक परिवार के चार सदस्यों के लिए रोजाना का अतिरिक्त खर्च सिर्फ 80 पैसे यानी प्रति व्यक्ति 20 पैसे है। पिछले कुछ वर्षों में कुल बढ़ोतरी सिर्फ 110 रुपये रही है। इसके अलावा, भारत में LPG की प्राइसें पड़ोसी देशों से सस्ती हैं – काठमांडू में 1,207 रुपये, श्रीलंका में 1,241 रुपये और पाकिस्तान में 1,046 रुपये।
यह बढ़ोतरी सऊदी कॉन्ट्रैक्ट प्राइस (CP) में वृद्धि के कारण हुई है, जो नवंबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच 16% बढ़ गया। असली कारण ईरान पर अमेरिका-इजराइल युद्ध है, जिससे मध्य पूर्व की सप्लाई बाधित हुई। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा LPG आयातक है। पिछले साल देश में 33.15 मिलियन मीट्रिक टन LPG की खपत हुई, जिसमें आयात दो-तिहाई हिस्सा था।
2024-25 में खपत 31.3 मिलियन टन थी, जिसमें घरेलू उत्पादन सिर्फ 12.8 मिलियन टन था। आयात का 85 से 90% हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) से गुजरता है, जो युद्ध के कारण प्रभावित है। देश में कुल 33.3 करोड़ LPG उपभोक्ता हैं, जिनमें 10.5 करोड़ उज्ज्वला लाभार्थी शामिल हैं।
सरकार की त्वरित प्रतिक्रिया
संकट को देखते हुए सरकार ने तुरंत कदम उठाए। 5 मार्च 2026 को एसेंशियल कमोडिटीज एक्ट 1955 के तहत आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल कर सभी रिफाइनरियों को निर्देश दिया गया कि वे प्रोपेन और ब्यूटेन से LPG का उत्पादन अधिकतम करें। यह उत्पादन सिर्फ घरेलू उपयोग के लिए होगा और तीन पब्लिक सेक्टर की कंपनियों, इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम को ही सप्लाई किया जाएगा। पेट्रोकेमिकल या अन्य प्रोडक्ट्स के लिए इनका इस्तेमाल नहीं हो सकेगा।
सरकार ने रिफाइनरियों से अतिरिक्त उत्पादन बढ़ाने को कहा है ताकि कोई कमी न हो। साथ ही एनर्जी सुरक्षा के लिए अमेरिका के गल्फ कोस्ट से 2.2 मिलियन टन LPG का आयात कॉन्ट्रैक्ट किया गया है, जो देश के कुल आयात का करीब 10% है। ये कार्गो पहले ही आने शुरू हो गए हैं। रूस अभी भी भारत का सबसे बड़ा क्रूड आयल आपूर्तिकर्ता है और आयात जारी है। अमेरिका ने 30 दिन का वेवर भी दिया है। पेट्रोल और डीजल की रिटेल प्राइस में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है क्योंकि ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के पास पर्याप्त कुशन है।
संकट के व्यापक प्रभाव
इस संकट का असर सिर्फ प्राइस तक सीमित नहीं है। पुणे में गैस क्रेमेटोरियम्स को अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया है। वैकुंठ क्रेमेटोरियम में तीन गैस भट्टियां बंद हैं, जबकि पांच इलेक्ट्रिक भट्टियां चल रही हैं। यह फैसला 5 मार्च से लिया गया ताकि प्रोपेन और ब्यूटेन को घरेलू LPG के लिए प्राथमिकता दी जा सके।
नेचुरल गैस की सप्लाई भी प्रभावित हुई है। देश की रोजाना खपत 195 मिलियन मीट्रिक स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर है, जिसमें 50% से अधिक आयात पर निर्भर है। कतर की LNG फैसिलिटी बंद होने और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के ब्लॉक होने से करीब 60 मिलियन मीट्रिक स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर सप्लाई प्रभावित हुई। कंपनियां अब ऑटो फ्यूल, घरेलू किचन और फर्टिलाइजर इंडस्ट्री जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को प्राथमिकता दे रही हैं।
हालांकि, पेट्रोलियम और नेचुरल गैस मंत्री हरदीप पुरी ने कहा कि देश में एनर्जी की कोई कमी नहीं है और उपभोक्ताओं को चिंता करने की जरूरत नहीं। 2024-25 में ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने 39,000 करोड़ रुपये का घाटा उठाया, जिसके लिए सरकार ने 30,000 करोड़ रुपये की मुआवजा राशि दी। यह दिखाता है कि सरकार घरेलू उपभोक्ताओं की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
यह संकट ऑयल मार्केटिंग कंपनियों और रिफाइनरी सेक्टर के निवेशकों के लिए मिश्रित संकेत दे रहा है। एक ओर कंपनियों ने 2024-25 में 39,000 करोड़ रुपये का घाटा झेला, लेकिन सरकार की 30,000 करोड़ रुपये की मुआवजा राशि ने उन्हें सहारा दिया। अब सरकार के निर्देश से रिफाइनरियां अतिरिक्त LPG उत्पादन बढ़ा रही हैं, जो घरेलू उत्पादन को मजबूत करेगा और आयात पर निर्भरता कम करेगा।
अमेरिका से 2.2 मिलियन टन का नया आयात कॉन्ट्रैक्ट डाइवर्सिफिकेशन की दिशा में बड़ा कदम है, जो लंबे समय में सप्लाई चेन के जोखिम को कम करेगा। पेट्रोल और डीजल की प्राइसें स्थिर रखने से कंपनियों के पास कुशन बना हुआ है, जो उनके मार्जिन को स्थिर रख सकता है। कुल मिलाकर, यह सेक्टर निवेशकों को एनर्जी सुरक्षा और घरेलू उत्पादन बढ़ाने के अवसर प्रदान कर रहा है, जहां सरकारी समर्थन और अतिरिक्त उत्पादन क्षमता का फायदा मिल सकता है।
भविष्य की बातें
आने वाले दिनों में सरकार को आयात स्रोतों को और डायवर्सिफिकेशन प्रदान करने पर ध्यान देना होगा। अमेरिका से बढ़ता आयात और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा इस दिशा में सही कदम है। यदि युद्ध लंबा खिंचा तो ग्लोबल प्राइस में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है, लेकिन एसेंशियल कमोडिटीज एक्ट जैसे कदम कमी को रोकने में मदद करेंगे।
नेचुरल गैस के लिए भी वैकल्पिक स्रोतों की तलाश जारी रहेगी ताकि महत्वपूर्ण क्षेत्रों की सप्लाई बनी रहे। कुल मिलाकर, यह संकट भारत को एनर्जी सुरक्षा मजबूत करने का मौका दे रहा है। निवेशक और नीति निर्माता दोनों को इस बदलते परिदृश्य में लंबी अवधि की सोच के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
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