ग्लोबल व्यापार में चल रही उथल-पुथल और विशेष रूप से ट्रम्प प्रशासन द्वारा लगाए गए टैरिफ के कारण भारतीय निर्यातकों पर दबाव बढ़ गया है। इस अनिश्चितता के बीच, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने एक रक्षक की भूमिका निभाते हुए निर्यातकों के लिए राहत का पिटारा खोल दिया है। RBI ने बैंक्स और NBFCs को निर्देश दिया है कि वे प्रभावित निर्यातकों को टर्म लोन पर मोराटोरियम और क्रेडिट विस्तार जैसी सुविधाएं प्रदान करें। यह कदम उन निर्यातकों के लिए ऑक्सीजन का काम करेगा जो US मार्केट में टैरिफ और ऑर्डर में देरी के कारण कैशफ्लो संकट का सामना कर रहे हैं।
आइए समझते है कि RBI के इस कदम से किन सेक्टर्स में असर देखने को मिल सकता है और निवेशकों के लिए यह क्या मायने रखता है।
क्या है मामला?
हाल ही में अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ और ग्लोबल आर्थिक चुनौतियों ने भारतीय निर्यातकों के लिए भुगतान का संकट खड़ा कर दिया है। कई अमेरिकी खरीदार या तो ऑर्डर रोक रहे हैं या प्राइस पर दोबारा बातचीत कर रहे हैं, जिससे भारतीय निर्यातकों का कैश फ्लो बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इस स्थिति को देखते हुए, RBI ने 14 नवंबर 2025 को एक अहम घोषणा की। इसे मार्केट के जानकार ‘ट्रम्प रिलीफ’ भी कह रहे हैं।
RBI ने अपने निर्देश में स्पष्ट किया है कि इसका उद्देश्य निर्यातकों के सिर से कर्ज का बोझ कम करना है ताकि वे इस मुश्किल दौर में अपना कारोबार जारी रख सकें। यह राहत उन सभी रेगुलेटेड एंटिटीज के माध्यम से दी जाएगी, जिनमें कमर्शियल बैंक, सहकारी बैंक, और NBFCs शामिल हैं। शर्त यह है कि उधारकर्ता का खाता 31 अगस्त 2025 तक ‘स्टैंडर्ड’ श्रेणी में होना चाहिए।
क्यों ज़रूरी थीं ये राहतें?
ग्लोबल अनिश्चितताओं, खासकर अमेरिका की ओर से लगाए गए भारी टैरिफ के कारण भारत के निर्यातकों पर दबाव बढ़ गया है। 27 अगस्त से लागू 50% टैरिफ जो किसी भी देश पर लगाया गया सबसे हाई टैरिफ है, ने भारतीय निर्यात को सीधे प्रभावित किया है। रूसी ऑइल खरीद पर 25% पेनल्टी ड्यूटी के चलते द्विपक्षीय व्यापार कमजोर हुआ है, जिसका परिणाम यह है कि सितंबर में अमेरिका को भारत का निर्यात 12% गिर गया।
इन व्यवधानों के कारण निर्यातकों को भुगतान में देरी, ऑपरेशनल लागत में बढ़ोतरी और कैश की तंगी का सामना करना पड़ रहा है। कई निर्यातक अपने कर्ज की समय पर सर्विसिंग नहीं कर पा रहे, जिससे डिफ़ॉल्ट का जोखिम बढ़ गया है। ऐसे माहौल में, केवल सीधे निर्यातकों को ध्यान में रखते हुए RBI ने राहत उपाय लागू किए हैं, ताकि व्यावहारिक और सक्षम व्यवसाय बिना रुकावट जारी रह सकें।
राहत के मुख्य उपाय: मोराटोरियम और ब्याज छूट
RBI ने राहत के तौर पर दो सबसे महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं:
मोराटोरियम की अवधि: RBI ने बैंक्स, NBFC और अन्य वित्तीय संस्थानों से कहा है कि वे 1 सितंबर 2025 से 31 दिसंबर 2025 तक देय टर्म लोन की किस्तों और वर्किंग कैपिटल लोन के ब्याज पर मोरेटोरियम दें। इस अवधि में ब्याज सिंपल इंटरेस्ट पर लगेगा और जमा हुआ ब्याज फंडेड इंटरेस्ट टर्म लोन (FITL) बनकर 31 मार्च 2026 से 30 सितंबर 2026 के बीच चुकाया जा सकेगा। वर्किंग कैपिटल लोन में, बैंक ग्राहक को राहत देने के लिए ‘ड्रॉइंग पावर’ को मार्जिन घटाकर दोबारा तय कर सकेंगे।
निर्यात क्रेडिट रीपेमेंट में राहत: RBI ने निर्यातकों को राहत देते हुए प्री-शिपमेंट और पोस्ट-शिपमेंट एक्सपोर्ट क्रेडिट की अवधि 270 दिनों से बढ़ाकर 450 दिन कर दी है (31 मार्च 2026 तक स्वीकृत ऋणों पर लागू), निर्यात आय की वसूली की समयसीमा 9 महीने से बढ़ाकर 15 महीने कर दी गई है, और एडवांस भुगतान पर शिपमेंट की अंतिम तिथि 1 वर्ष से बढ़ाकर 3 वर्ष कर दी गई है। साथ ही, 31 अगस्त 2025 तक लिए गए पैकिंग क्रेडिट पर यदि शिपमेंट नहीं हो पाया हो, तो बैंक ऐसे लोन को घरेलू बिक्री या किसी अन्य निर्यात ऑर्डर की राशि से एडजस्ट करने की अनुमति देंगे।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
RBI द्वारा निर्यातकों को दी गई राहत से बैंक्स को थोड़ी एसेट क्वालिटी अनिश्चितता का सामना करना पड़ सकता है, खासकर अगर बड़ी संख्या में उधारकर्ता मोरेटोरियम या रीपेमेंट का लाभ लेते हैं। ऐसे मामलों में बैंक्स को इन लोन पर 5% अतिरिक्त प्रावधान करना होगा, जिससे उनकी प्रोविज़निंग बढ़ सकती है। हालांकि, ICRA जो कि रेटिंग एजेंसी है के अनिल गुप्ता का मानना है कि इसका निकट अवधि की प्रोफिटेबिलिटी पर बड़ा असर नहीं पड़ेगा।
इसके अलावा, RBI ने जिन 20 सेक्टर्स को राहत के लिए पात्र माना है, उनमें फिशरीज़, केमिकल्स, प्लास्टिक-रबर, लेदर-टेक्सटाइल्स, फुटवियर, प्रेशियस मेटल्स, आयरन-स्टील, एल्युमिनियम, इलेक्ट्रिकल और सर्जिकल उपकरण, व्हीकल्स, फर्नीचर और न्यूक्लियर रिएक्टर शामिल हैं।
भविष्य की बातें
RBI के राहत उपायों से निर्यातकों के लिए शॉर्ट-टर्म कैश दबाव कम होने की उम्मीद है, जिससे वे अपने भुगतान दायित्व समय पर पूरा कर सकेंगे। नियामक के अनुसार, ये कदम ग्लोबल व्यापार व्यवधानों से बढ़े कर्ज़-भुगतान बोझ को कम करने और सक्षम व्यवसायों को चालू रखने के लिए उठाए गए हैं। ICRA के अनिल गुप्ता का कहना है कि RBI के यह उपाय, सरकार की क्रेडिट गारंटी योजना के साथ मिलकर, निर्यातकों को पर्याप्त लिक्विडिटी राहत देंगे और ऑर्डर या पेमेंट में देरी से उत्पन्न कैशफ्लो दबाव को संभालने में मदद करेंगे।
यह कदम ऐसे समय पर आया है जब भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय ट्रेड समझौते पर बातचीत काफी तेज हो गयी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में संकेत दिया कि अमेरिका भारत पर टैरिफ घटाएगा और दोनों देश ‘फेयर ट्रेड डील’ के काफी करीब हैं।
*यह आर्टिकल केवल जानकारी के उद्देश्य के लिए है। यह कोई निवेश सलाह नहीं है।
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