भारत का पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज यानी PMS मार्केट एक बड़े बदलाव की ओर बढ़ रहा है। SEBI ने पोर्टफोलियो मैनेजर्स के लिए नया रेगुलेटरी फ्रेमवर्क मंजूर किया है, जिसके बाद उनके निवेश का दायरा IPO, प्राइमरी मार्केट डेट इश्यू, विदेशी सिक्योरिटीज और डायरेक्ट म्यूचुअल फंड प्लान्स तक बढ़ जाएगा। इसके साथ कई कम्प्लायंस नियमों को भी आसान किया गया है।
यह बदलाव ऐसे समय आया है जब PMS इंडस्ट्री का साइज तेजी से बढ़ा है। SEBI के जुलाई प्रस्ताव के अनुसार, पोर्टफोलियो मैनेजर्स के तहत मैनेज होने वाले एसेट्स अप्रैल 2019 के ₹18.07 लाख करोड़ से बढ़कर मई 2026 तक ₹42.61 लाख करोड़ पहुंच गए थे।
आइए SEBI के नए PMS नियमों को विस्तार से समझें और जानें कि निवेश के बढ़ते विकल्प निवेशकों और पोर्टफोलियो मैनेजर्स के लिए क्या मायने रखते हैं।
क्या है मामला?
SEBI बोर्ड ने Securities and Exchange Board of India (Portfolio Managers) Regulations, 2026, को मंजूरी दी है, जो मौजूदा 2020 फ्रेमवर्क की जगह लेगा। नए नियमों का उद्देश्य पोर्टफोलियो मैनेजर्स के निवेश विकल्पों को बढ़ाने के साथ रेगुलेटरी और ऑपरेशनल प्रक्रिया को सरल बनाना है।
नए फ्रेमवर्क में पोर्टफोलियो मैनेजर्स को IPO और डेट मार्केट के प्राइमरी मार्केट इश्यू में निवेश करने की अनुमति दी गई है। साथ ही, क्लाइंट की सहमति के साथ उसके AUM का अधिकतम 10% इन्वेस्टमेंट-ग्रेड, अनलिस्टेड नॉन-कन्वर्टिबल डेट सिक्योरिटीज में निवेश किया जा सकेगा।
PMS निवेश के लिए न्यूनतम टिकट साइज ₹25 लाख ही रहेगा। इसके अलावा ETFs में निवेश क्लाइंट के AUM के 1.25 गुना तक किया जा सकेगा। इससे PMS मैनेजर्स के पास पोर्टफोलियो तैयार करने के लिए पहले की तुलना में अधिक विकल्प उपलब्ध होंगे।
IPO से विदेशी सिक्योरिटीज तक बढ़ा निवेश का दायरा
नए PMS नियमों से पोर्टफोलियो मैनेजर्स का इन्वेस्टमेंट यूनिवर्स बढ़ गया है। अब डिस्क्रिशनरी और नॉन-डिस्क्रिशनरी दोनों तरह की सर्विसेज देने वाले पोर्टफोलियो मैनेजर्स IPO और डेट मार्केट के प्राइमरी इश्यू में निवेश कर सकेंगे। इसके अलावा, उन्हें ओवरसीज लिस्टेड इक्विटी और डेट, REITs, विदेशी म्यूचुअल फंड्स, ETFs, इंडेक्स फंड्स और विदेशी सरकारी डेट में निवेश की अनुमति होगी।
हालांकि, ऐसे निवेश फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट और RBI की लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम के लागू नियमों के अधीन होंगे। SEBI ने भारतीय रजिस्टर्ड पोर्टफोलियो मैनेजर्स को विदेशी सिक्योरिटीज में निवेश करने वाले ओवरसीज फंड्स को मैनेज और एडवाइज करने की भी अनुमति दी है। इससे भारतीय PMS इंडस्ट्री के लिए डोमेस्टिक एसेट्स से आगे बढ़कर ग्लोबल इन्वेस्टमेंट मैनेजमेंट में अपनी भूमिका बढ़ाने का रास्ता खुल सकता है।
PRIM और कम्प्लायंस में बड़ा बदलाव
SEBI ने Portfolio Managers Route for Investing in Mutual Fund Units यानी PRIM भी पेश किया है। इसके तहत पोर्टफोलियो मैनेजर्स भारतीय AMC के डायरेक्ट म्यूचुअल फंड प्लान्स, ETFs, इंडेक्स फंड्स और स्पेशलाइज्ड इन्वेस्टमेंट फंड्स में क्लाइंट का पैसा निवेश कर सकेंगे।
PRIM के लिए न्यूनतम टिकट साइज ₹25 लाख और न्यूनतम नेटवर्थ ₹2 करोड़ तय की गई है। एफिलिएटेड, ग्रुप या एसोसिएट AMC की स्कीम्स में निवेश पर 25% की सीमा होगी। फिक्स्ड मैनेजमेंट फीस अधिकतम क्लाइंट AUM का 1% होगी, जबकि परफॉर्मेंस-बेस्ड फीस मॉडल की भी अनुमति दी गई है। PRIM में एग्जिट लोड से जुड़े प्रावधानों से भी राहत मिलेगी।
SEBI ने इंडिपेंडेंट फंड मैनेजर्स यानी IFMs का कॉन्सेप्ट भी पेश किया है। IFMs रजिस्टर्ड पोर्टफोलियो मैनेजर के साथ मिलकर क्लाइंट पोर्टफोलियो मैनेज कर सकेंगे, लेकिन उनकी गतिविधियों की पूरी जिम्मेदारी संबंधित रजिस्टर्ड PMS की रहेगी।
कम्प्लायंस के मोर्चे पर भी नियम सरल किए गए हैं। SEBI के अनुसार, रेगुलेशंस का साइज 70 पेज से घटाकर 33 पेज कर दिया गया है, यानी लगभग 53% की कमी, जबकि कुल वर्ड काउंट करीब 42% कम किया गया है। ₹100 करोड़ से कम AUM वाले पोर्टफोलियो मैनेजर्स को पर्याप्त ऑडिट ट्रेल और इंटरनल कंट्रोल होने पर डीलिंग-रूम की आवश्यकता से छूट दी गई है।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
निवेशकों के नजरिए से सबसे बड़ा बदलाव पोर्टफोलियो मैनेजर्स को मिलने वाली अतिरिक्त फ्लेक्सिबिलिटी है। IPO, प्राइमरी डेट मार्केट, विदेशी इक्विटी, डेट, REITs, विदेशी फंड्स और भारतीय डायरेक्ट म्यूचुअल फंड प्लान्स तक पहुंच मिलने से पोर्टफोलियो को अलग-अलग एसेट क्लास में फैलाने की गुंजाइश बढ़ सकती है।
₹25 लाख का मौजूदा न्यूनतम PMS निवेश बनाए रखने का मतलब है कि इन नए विकल्पों का लाभ उसी मौजूदा PMS फ्रेमवर्क के भीतर दिया जा सकेगा। वहीं 10% तक इन्वेस्टमेंट-ग्रेड अनलिस्टेड नॉन-कन्वर्टिबल डेट में निवेश की अनुमति मैनेजर्स को एसेट एलोकेशन के लिए एक और विकल्प देती है।
हालांकि ज्यादा इन्वेस्टमेंट ऑप्शंस के साथ पोर्टफोलियो स्ट्रक्चर भी ज्यादा जटिल हो सकता है। इसलिए इन बदलावों का वास्तविक प्रभाव काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि PMS मैनेजर्स अलग-अलग एसेट क्लास का इस्तेमाल क्लाइंट की रिस्क प्रोफाइल और निवेश रणनीति के अनुसार कैसे करते हैं।
भविष्य की बातें
SEBI के निर्णय केवल PMS सेक्टर तक सीमित नहीं हैं। रेगुलेटर ने फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स यानी FPIs को फिजिकली सेटल्ड नॉन-एग्रीकल्चरल कमोडिटी डेरिवेटिव्स में भाग लेने की अनुमति भी दी है। हालांकि उन्हें कॉन्ट्रैक्ट एक्सपायरी से कम से कम 3 दिन पहले अपनी पोजीशन स्क्वायर-ऑफ या रोल-ओवर करनी होगी।
रॉयटर्स के अनुसार, इससे विदेशी निवेशकों की कमोडिटी डेरिवेटिव्स मार्केट तक पहुंच बढ़ेगी और विशेष रूप से बुलियन मार्केट में ट्रेडिंग वॉल्यूम बढ़ने की संभावना है। SEBI ने एक्रेडिटेड इन्वेस्टर्स का दायरा भी बढ़ाया है। अब सिक्योरिटीज मार्केट एसेट्स के आधार पर ₹5 करोड़ वाले व्यक्ति और ₹20 करोड़ वाले बॉडी कॉरपोरेट भी पात्र हो सकेंगे।
कुल मिलाकर, इन बदलावों से संकेत मिलता है कि SEBI भारतीय कैपिटल मार्केट में निवेश विकल्पों को बढ़ाने, रेगुलेटरी प्रक्रिया सरल करने और विदेशी निवेश तथा ग्लोबल फंड मैनेजमेंट के साथ मार्केट का जुड़ाव मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल एजुकेशनल और इंफॉर्मेशनल उद्देश्य के लिए है और यह इन्वेस्टमेंट एडवाइस या किसी भी सिक्योरिटीज को खरीदने या बेचने की रिकमेंडेशन नहीं है। यहाँ जिन कंपनियों का उल्लेख किया गया है, उन्हें मार्केट डेवलपमेंट्स के संदर्भ में केवल उदाहरण के रूप में बताया गया है। इन्वेस्टर्स को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी इन्वेस्टमेंट डिसीजन लेने से पहले अपनी खुद की रिसर्च करें और अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से परामर्श करें।
सिक्योरिटीज मार्केट में किए गए इन्वेस्टमेंट मार्केट जोखिम के अधीन होते हैं। इन्वेस्ट करने से पहले सभी संबंधित डॉक्यूमेंट्स को ध्यानपूर्वक से पढ़ें।