10 अक्टूबर को विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य के महत्व को समझना और इसके प्रति जागरूकता बढ़ाना है। अगर भारत की बात करें तो मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति पर चिंताएँ लंबे समय से बनी हुई हैं, विशेष रूप से कोविड-19 महामारी के बाद से। मानसिक स्वास्थ्य बढ़ने के परिणामस्वरूप इससे संबधित सेवाओं की डिमांड भी बढ़ रही है।
इस आर्टिकल में हम भारत के मानसिक स्वास्थ्य इंडस्ट्री के वर्तमान परिदृश्य, चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं पर चर्चा करेंगे।
भारत में मानसिक स्वास्थ्य का वर्तमान परिदृश्य
WHO के अनुसार, 56 मिलियन भारतीय डिप्रेशन और एंग्जायटी डिसऑर्डर से गुजर रहे हैं, जबकि 8 प्रत्येक भारतीयों में से एक इंसान किसी न किसी मानसिक स्वस्थ संबधी समस्या से जूझ रहा है। सिर्फ इतना ही नहीं, भारत की 14% आबादी मानसिक विकारों से प्रभावित है, और देश ग्लोबल मानसिक स्वास्थ्य बोझ का 15% हिस्सा वहन करता है। मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं के कारण भारत को 2030 तक $2-3 बिलियन और पूरी दुनिया को $1 ट्रिलियन का आर्थिक नुकसान हो सकता है।
DALY (Disability-Adjusted Life Years), जो बीमारी से प्रभावित वर्षों का माप है, भारत में 2,400 प्रति 1,00,000 आबादी के रूप में दर्ज किया गया है, जो दर्शाता है कि मानसिक स्वास्थ्य का बोझ कितना गंभीर है।
मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी
हालाँकि इंडस्ट्री में वृद्धि हो रही है, लेकिन भारत में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और गुणवत्ता अभी भी गंभीर रूप से सीमित है। भारत में प्रति 1,00,000 आबादी के लिए केवल 0.75 मनोचिकित्सक और 0.07 मनोवैज्ञानिक/सोशल वर्कर उपलब्ध हैं। इसके विपरीत, अमेरिका में प्रति 100,000 आबादी पर 30 से अधिक मनोवैज्ञानिक उपलब्ध हैं। इस कारण मानसिक स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं की भारी कमी है, जो ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में विशेष रूप से महसूस की जाती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, भारत की 1.4 बिलियन जनसंख्या के लिए लगभग 20,000 क्लिनिकल मनोवैज्ञानिक और 35,000 मानसिक स्वास्थ्य सोशल वर्कर्स की आवश्यकता है। लेकिन वर्तमान में हमारे पास सिर्फ लगभग 1,000 विशेषज्ञ ही उपलब्ध हैं।
मानसिक स्वास्थ्य इंडस्ट्री के सामने चुनौतियाँ
- जागरूकता की कमी: मानसिक स्वास्थ्य के प्रति समाज में जागरूकता और शिक्षा की कमी है। कई लोग यह नहीं समझ पाते कि वे मानसिक समस्या से जूझ रहे हैं, इसलिए उन्हें मदद की जरूरत का एहसास ही नहीं होता।
- कलंक और भेदभाव: मानसिक विकारों के बारे में सामाजिक कलंक भी एक बड़ी समस्या है। 70% से अधिक लोग मानसिक विकारों से जुड़ी कलंकित धारणाएँ रखते हैं, और लगभग 40% लोग मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को अपने पड़ोस में नहीं चाहते।
- संसाधनों की कमी: मानसिक स्वास्थ्य प्रोफेशनल्स की भारी कमी और सरकारी फंडिंग की सीमित उपलब्धता इंडस्ट्री के विकास में सबसे बड़ी बाधा हैं।
- सामजिक डर: जो लोग अपने मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हैं, वह भी समाज और अपने साथियों द्वारा होने वाले भेदभाव और कलंक के डर से मदद मांगने से कतराते हैं। यह सामाजिक कलंक मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे व्यक्तियों के लिए एक बड़ी बाधा बन जाता है।
सरकार की मानसिक स्वास्थ्य पहल
नवंबर 2022 में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने ‘नेशनल सुसाइड प्रिवेंशन स्ट्रेटेजी’ शुरू की, जिसका लक्ष्य 2020 की तुलना में 2030 तक आत्महत्या से होने वाली मृत्यु दर को 10% तक कम करना है। इसके साथ ही, 2022-23 के बजट में ‘राष्ट्रीय टेली-मेंटल हेल्थ प्रोग्राम’ (NTMHP) की शुरुआत की गई और इसके लिए ₹120.98 करोड़ आवंटित किया गया था।
मानसिक स्वास्थ्य के लिए बजट एलोकेशन
23 जुलाई 2024 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किए गए बजट में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को ₹90,958.63 करोड़ का आवंटन किया गया है, जो 2023-24 के संशोधित अनुमान ₹80,517.62 करोड़ से 12.9% अधिक है। इसमें से ₹87,656.90 करोड़ स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग को और ₹3,301.73 करोड़ हेल्थ रिसर्च विभाग को दिए गए हैं।
बजट 2024 में, नेशनल टेली मेंटल हेल्थ प्रोग्राम के लिए बजट बढ़ाकर ₹90 करोड़ कर दिया गया है, जो पहले ₹65 करोड़ था।

FY 2019-20 से FY 2023-24 के बीच मेन्टल हेल्थ बजट सिर्फ ₹371.15 करोड़ बढ़ा है।
मानसिक स्वास्थ्य इंडस्ट्री का भविष्य
ग्लोबल मानसिक स्वास्थ्य मार्केट 2030 तक $540 बिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है, जो वर्तमान में $380 बिलियन है, जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ रिकॉर्ड्स का होगा।

भारतीय मेंटल हेल्थ सेक्टर में 36% के साथ सर्वाधिक योगदान इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ रिकॉर्ड सेगमेंट का है।
इसके साथ ही, UnivDatos मार्केट इनसाइट्स के अनुसार, मेंटल हेल्थ इंडस्ट्री 2028 तक 15% की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) से बढ़ने की संभावना है।
इसके अलावा, स्टेटिस्टा के अनुसार, भारतीय मेंटल हेल्थ इंडस्ट्री का रेवेन्यू 2016 के 80 US मिलियन डॉलर से 2029 तक 1.20 US बिलियन डॉलर पहुंच सकता है।
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*यह आर्टिकल केवल जानकारी के उद्देश्य के लिए है। यह कोई निवेश सलाह नहीं है।
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