भारत का समृद्ध समुद्री इतिहास रहा है, और इसकी शिपबिल्डिंग इंडस्ट्री ने सदियों से ग्लोबल व्यापार और नौसेना रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अतीत से प्रेरणा लेते हुए, भारत एक मजबूत कमर्शियल और डिफेंस शिपबिल्डिंग इंडस्ट्री की दिशा में आगे बढ़ रहा है। सरकार एक जीवंत शिपबिल्डिंग सेक्टर के विकास के लिए नीतिगत और इंफ्रास्ट्रक्चर समर्थन प्रदान कर रही है।
आइए जानें शिपबिल्डिंग सेक्टर के प्रमुख इनोवेशन, इमर्जिंग टेक्नोलॉजी, अवसर और चुनौतियां, जो समुद्री परिदृश्य में तेजी से बदलाव के दौर से गुजर रही हैं।
वर्तमान मार्केट वैल्यू
भारत की शिपबिल्डिंग इंडस्ट्री बड़ी तेजी से बढ़ रही है। फिनएक्स्ट्रा रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार, 2022 में भारत की शिपबिल्डिंग मार्केट $90 मिलियन की थी, जो 2033 तक $8.1 बिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है, जो 60% की अप्रत्याशित CAGR दर दर्शाता है। इस वृद्धि के प्रमुख कारणों में सरकारी समर्थन, रणनीतिक स्थान, कम श्रम लागत और ऑफशोर सपोर्ट वेसल्स और फेरीज जैसे विशिष्ट सेक्टर्स पर ध्यान केंद्रित करना शामिल है।
पोर्ट मंत्रालय के अनुसार, यदि भारतीय शिपयार्ड डोमेस्टिक शिपिंग इंडस्ट्री की बढ़ती डिमांड को आकर्षित करने के लिए उचित रणनीति और दृष्टिकोण अपनाते हैं, तो शिपबिल्डिंग इंडस्ट्री 2047 तक $20 ट्रिलियन की वैल्यू तक पहुंच सकती है।
भारतीय शिपबिल्डिंग इंडस्ट्री की चुनौतियां
भारत के शिपबिल्डिंग सेक्टर को निम्नलिखित प्रमुख चुनौतियों का सामना करना पड़ता है:
वित्तीय समर्थन की कमी: शिपबिल्डिंग एक पूंजी-गहन सेक्टर है और इसमें बड़ी मात्रा में वर्किंग कैपिटल की आवश्यकता होती है। शिपबिल्डिंग कुल निर्माण लागत का 20-25% कवर करता है, और कंपनियों को अपने संचालन के लिए निरंतर लिक्विडिटी की आवश्यकता होती है। सस्ती फंडिंग स्त्रोत की कमी है, जहां लोन पर ब्याज दर 10-12% है, जबकि ग्लोबल हब में यह 4-8% है।
गुणवत्ता और कौशल: भारत में श्रम लागत कम है, लेकिन श्रम की गुणवत्ता और कौशल एक मुद्दा है। इस सेक्टर में फॉर्मल शिक्षा और प्रशिक्षण की कमी से कार्यबल की प्रोडक्टिविटी प्रभावित होती है।
टेक्नोलॉजिकल बाधाएं: भारत में आधुनिक शिपबिल्डिंग तकनीक की कमी है, जिससे यह सेक्टर पुराने तकनीकी उपकरणों पर निर्भर रहता है। इसके अलावा, भारत महत्वपूर्ण कच्चे माल के लिए विदेशी देशों पर निर्भर है, जिससे ग्लोबल सप्लाई चेन में कोई भी व्यवधान विनाशकारी साबित हो सकता है।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग
भारत सरकार शिपबिल्डिंग सेक्टर में देश को एक प्रमुख प्लेयर बनाने के लिए विशेष जोर दे रही है। इसके लिए जापान और दक्षिण कोरिया जैसे ग्लोबल शिपबिल्डिंग इंडस्ट्री के अग्रणी देशों के साथ सहयोग की शुरुआत की गई है। भारत सरकार जापान और कोरिया के साथ शिपबिल्डिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास के लिए वित्तीय सहायता और टेक्नोलॉजी हस्तांतरण पर बातचीत कर रही है।
वर्तमान में, शिपबिल्डिंग क्षमता के मामले में भारत 22वें स्थान पर है, और सरकार का लक्ष्य 2030 तक इसे शीर्ष 10 में और 2047 तक शीर्ष 5 में लाना है। भारत का ग्लोबल टन भार में योगदान 1% से भी कम है, और डोमेस्टिक शिपिंग मार्केट पर पूर्ण नियंत्रण के साथ, भारतीय शिपबिल्डर्स ग्लोबल टन भार में 5% योगदान कर सकेंगे।
मेगा शिपबिल्डिंग पार्क्स
20वीं समुद्री राज्य विकास परिषद में सरकार ने 2030 तक दो अत्याधुनिक मेगा शिपबिल्डिंग पार्क स्थापित करने की योजना की घोषणा की। एक पार्क पूर्वी तट पर और दूसरा पश्चिमी तट पर होगा। सरकार का लॉन्गटर्म लक्ष्य दोनों तटों पर दो-दो ऐसे चार मेगा शिपबिल्डिंग पार्क बनाने का है। गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों ने इस प्रोजेक्ट में रुचि दिखाई है।
इन पार्कों को PPP आधार पर विकसित किया जाएगा, जहां सड़क, बिजली, रेलवे लाइन, आवासीय सुविधाएं और पानी जैसी बुनियादी संरचना राज्य सरकार द्वारा प्रदान की जाएगी। वहीं, प्राइवेट कंपनियां क्रेन, भारी मशीनें, ड्राई डॉकिन्ग उपकरण जैसी आधुनिक तकनीकें और उपकरण लाएंगी।

चीन कमर्शियल और यात्री जहाज निर्माण दोनों में वैल्यू के मामले में अग्रणी है।
निवेश ट्रेंड्स
ऐतिहासिक रूप से भारत के शिपबिल्डिंग परिदृश्य पर PSUs का प्रभुत्व रहा है, जिसमें मझगांव डॉक लिमिटेड और कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड ने कमर्शियल और डिफेंस शिपबिल्डिंग के सेक्टर में नेतृत्व किया है। अडानी ग्रुप भी शिपबिल्डिंग में प्रवेश कर रहा है और मुंद्रा पोर्ट में शिपयार्ड बनाने के लिए 45,000 करोड़ रुपये का निवेश करने की योजना बना रहा है। दुनिया के प्रमुख शिपबिल्डिंग यार्ड 2028 तक बुक हैं, इसलिए अडानी ग्रुप का लक्ष्य $62 बिलियन के पर्यावरण-अनुकूल जहाजों की बढ़ती डिमांड को पूरा करना है।
हिंदुस्तान शिपयार्ड, गार्डन रीच शिपबिल्डर्स & इंजीनियर्स लिमिटेड, और L&T शिपबिल्डिंग भारत के शिपबिल्डिंग सेक्टर में अन्य प्रमुख प्लेयर हैं।
भविष्य की बातें
पोर्ट मंत्रालय ने एक समुद्री विज़न दस्तावेज़ 2030 की घोषणा की है, जिसका उद्देश्य 2030 तक भारत के जहाज निर्माण और मरम्मत इंडस्ट्री को विश्व के शीर्ष 10 देशों में शामिल करना है। KPMG की रिपोर्ट के अनुसार, यदि भारत इस लक्ष्य को प्राप्त करना चाहता है, तो भारतीय शिपयार्ड्स का कुल उत्पादन वर्तमान स्तर 0.072 मिलियन GT से बढ़कर 0.33 मिलियन GT होना चाहिए।
खुद को एक ग्लोबल शिपबिल्डिंग हब के रूप में स्थापित करने के लिए, भारत को एक बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाना होगा। इंफ्रास्ट्रक्चर का आधुनिकीकरण और एडवांस तकनीकों को अपनाना महत्वपूर्ण होगा। इसके अलावा, एक इनोवेशन इकोसिस्टम का निर्माण, जहां शिपबिल्डर्स सरकार, रिसर्च संस्थान और ग्लोबल प्लेयर्स के साथ मिलकर काम करें, यह सुनिश्चित करेगा कि इंडस्ट्री प्रतिस्पर्धी बना रहे।
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*आर्टिकल में शामिल कंपनियों के नाम केवल सूचना के उद्देश्य के लिए है। यह निवेश सलाह नहीं है।
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